“मेघालय नंबर वाले वाहनों की एंट्री रोकी, हजारों यात्री और पर्यटक प्रभावित; एंबुलेंस व जरूरी सेवाओं को नाकेबंदी से रखा बाहर”
जोराबाट/शिलांग: असम और मेघालय के बीच सीमा पर एक बार फिर तनाव गहराता नजर आ रहा है। दोनों राज्यों को जोड़ने वाले प्रमुख पारगमन बिंदु जोराबाट में शिलांग की हालिया हिंसा के विरोध में असम के परिवहन कर्मचारियों और कैब संचालकों ने मेघालय में पंजीकृत वाहनों के प्रवेश पर रोक लगा दी है। इस नाकेबंदी के कारण अंतरराज्यीय यातायात प्रभावित हुआ है और बड़ी संख्या में यात्री तथा पर्यटक रास्ते में फंस गए हैं।
असम के परिवहन कर्मचारियों और कैब चालकों का आरोप है कि 19 अगस्त को शिलांग में हुई हिंसा के दौरान असम नंबर वाले वाहनों, चालकों और पर्यटकों को निशाना बनाया गया। उनका कहना है कि जब तक इस घटना के जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक विरोध जारी रहेगा।
हालांकि प्रदर्शनकारियों ने मानवीय पहलू को ध्यान में रखते हुए एम्बुलेंस और अन्य जरूरी सेवाओं को नाकेबंदी से बाहर रखा है। तनाव की स्थिति को देखते हुए असम पुलिस ने जोराबाट और आसपास के इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है।
जोराबाट बना दोनों राज्यों के बीच तनाव का केंद्र
जोराबाट लंबे समय से असम और मेघालय के बीच आवाजाही का महत्वपूर्ण मार्ग रहा है। रोजाना बड़ी संख्या में लोग नौकरी, व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा और पर्यटन के सिलसिले में इस रास्ते से दोनों राज्यों के बीच यात्रा करते हैं। ऐसे में वाहनों की आवाजाही प्रभावित होने का सीधा असर आम लोगों पर पड़ रहा है।
सीमा पर बने इस गतिरोध ने यह चिंता भी बढ़ा दी है कि अगर विरोध लंबा खिंचा तो इसका असर केवल यातायात तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दोनों राज्यों के व्यापार, पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
19 अगस्त की रैली कैसे बनी हिंसा की वजह?
पूरे विवाद की जड़ 19 अगस्त को शिलांग में हुई खासी स्टूडेंट्स यूनियन (KSU) की मोटरसाइकिल रैली को माना जा रहा है। KSU ने मेघालय सरकार के सामने अपनी पांच सूत्रीय मांगों को लेकर 15 दिन का अल्टीमेटम दिया था। इसकी अवधि पूरी होने के बाद संगठन ने ‘काले झंडे’ के साथ मोटरसाइकिल रैली निकाली।
शुरुआत में रैली को शांतिपूर्ण बताया गया था, लेकिन बाद में हालात बिगड़ गए और प्रदर्शन हिंसा में बदल गया। रिपोर्टों के मुताबिक, उपद्रवियों ने असम में पंजीकृत वाहनों और सरकारी गाड़ियों समेत करीब 31 वाहनों में तोड़फोड़ की। इनमें कम से कम एक वाहन को आग के हवाले किए जाने की भी बात सामने आई।
हिंसा के दौरान शिलांग में सार्वजनिक संपत्तियों को भी नुकसान पहुंचाए जाने की खबर है। स्वामी विवेकानंद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचाने की बात ने विवाद को और गंभीर बना दिया।
KSU नेताओं की गिरफ्तारी से बढ़ी सियासी गर्मी
रैली के दौरान हिंसा और तय शर्तों के उल्लंघन के आरोपों के बाद मेघालय पुलिस ने KSU के तीन वरिष्ठ नेताओं को गिरफ्तार किया है। पुलिस की कार्रवाई को जहां कानून-व्यवस्था बनाए रखने की दिशा में कदम माना जा रहा है, वहीं संगठन से जुड़े लोग अपनी मांगों को लेकर दबाव बनाए हुए हैं।
असम में इस घटना के बाद नाराजगी और बढ़ गई। परिवहन कर्मचारियों और कैब संचालकों ने आरोप लगाया कि शिलांग में असम के लोगों और उनके वाहनों को जानबूझकर निशाना बनाया गया। इसी के विरोध में जोराबाट में मेघालय नंबर वाले वाहनों को रोकने का फैसला लिया गया।
KSU की पांच सूत्रीय मांगें क्या हैं?
KSU की रैली के पीछे कई स्थानीय और राजनीतिक मुद्दे बताए जा रहे हैं। संगठन की प्रमुख मांगों में राज्य में इनर लाइन परमिट (ILP) लागू किए जाने तक मेघालय निवासी सुरक्षा अधिनियम यानी MRSSA, 2016 को पूरी तरह लागू करना शामिल है।
इसके अलावा संगठन स्थानीय लोगों के रोजगार की सुरक्षा के लिए मेघालय प्रवासी कामगार अधिनियम, 2020 को सख्ती से लागू करने की मांग कर रहा है। सरकारी भर्तियों में कथित भाई-भतीजावाद खत्म करने और मेघालय लोक सेवा आयोग के माध्यम से अधिक पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया अपनाने की मांग भी इसमें शामिल है।
इन मांगों को लेकर KSU और सरकार के बीच पहले से ही मतभेद रहे हैं। लेकिन रैली के हिंसक रूप लेने के बाद मामला अब कानून-व्यवस्था और अंतरराज्यीय तनाव से भी जुड़ गया है।
नाकेबंदी से थमा सफर, सीमा पर बढ़ी मुश्किलें
जोराबाट में वाहनों की आवाजाही प्रभावित होने का सबसे बड़ा असर आम यात्रियों पर पड़ा है। कई लोग अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशने को मजबूर हैं। पर्यटकों के लिए भी स्थिति परेशानी वाली हो गई है।
असम और मेघालय का पर्यटन कारोबार एक-दूसरे से काफी जुड़ा हुआ है। खासकर शिलांग, चेरापूंजी और आसपास के पर्यटन स्थलों पर जाने वाले यात्रियों के लिए असम से आने-जाने वाला मार्ग बेहद महत्वपूर्ण है।
अगर सीमा पर तनाव जारी रहता है तो होटल, टैक्सी, ट्रैवल एजेंसी, रेस्तरां और स्थानीय कारोबार से जुड़े हजारों लोगों पर इसका असर पड़ सकता है।
पर्यटन कारोबार को सबसे बड़ा झटका लगने की आशंका
मेघालय की पहचान देश के प्रमुख प्राकृतिक पर्यटन स्थलों में होती है। पहाड़, झरने, हरियाली और शिलांग जैसे लोकप्रिय गंतव्य हर साल बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। ऐसे में हिंसा और सीमा पर तनाव की खबरें राज्य की ‘सुरक्षित पर्यटन स्थल’ वाली छवि के लिए चुनौती बन सकती हैं।
पर्यटन संगठनों ने हिंसा की निंदा करते हुए चिंता जताई है कि यदि स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई तो पर्यटकों की बुकिंग रद्द हो सकती हैं। वहीं असम के टैक्सी और परिवहन क्षेत्र पर भी इसका असर पड़ना तय माना जा रहा है।
कानून-व्यवस्था के साथ अब रिश्तों की भी परीक्षा
असम और मेघालय के बीच सीमा से जुड़े विवाद नए नहीं हैं। दोनों राज्यों के बीच सीमा को लेकर लंबे समय से मतभेद रहे हैं और कई इलाकों में विवादित क्षेत्र मौजूद हैं। हालांकि वर्तमान तनाव की तत्काल वजह सीमा विवाद नहीं, बल्कि शिलांग की हिंसा और उसके बाद हुई जवाबी नाकेबंदी है।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि स्थानीय स्तर पर शुरू हुआ विरोध कहीं अंतरराज्यीय टकराव का रूप न ले ले। एक राज्य में किसी घटना के विरोध में दूसरे राज्य के लोगों या वाहनों को रोकना स्थिति को और संवेदनशील बना सकता है।
प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती
असम पुलिस ने जोराबाट में सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती कर स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की है। प्रशासन की प्राथमिकता फिलहाल किसी भी अप्रिय घटना को रोकना और जरूरी सेवाओं की आवाजाही बनाए रखना है।
दूसरी ओर, मेघालय प्रशासन के सामने शिलांग हिंसा के दोषियों पर कार्रवाई करने के साथ-साथ यह भरोसा कायम करने की चुनौती है कि दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।
क्या बातचीत से निकलेगा रास्ता?
मौजूदा हालात में सबसे जरूरी है कि दोनों राज्यों के प्रशासन और परिवहन संगठनों के बीच संवाद शुरू हो। हिंसा के आरोपों की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई के साथ-साथ आम यात्रियों तथा कारोबारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
जोराबाट की नाकेबंदी अगर लंबी चली तो इसका असर केवल असम और मेघालय तक सीमित नहीं रहेगा। पूर्वोत्तर के अंतरराज्यीय परिवहन नेटवर्क पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
फिलहाल जोराबाट में सड़क पर खड़े वाहन सिर्फ यातायात रुकने की तस्वीर नहीं दिखा रहे, बल्कि दो राज्यों के बीच बढ़ती अविश्वास की उस चुनौती को भी सामने ला रहे हैं, जिसे समय रहते बातचीत और प्रशासनिक हस्तक्षेप से सुलझाना जरूरी है।
अब नजर इस बात पर है कि शिलांग हिंसा के आरोपियों पर कार्रवाई और जोराबाट की नाकेबंदी के बीच प्रशासन किस तरह संतुलन कायम करता है—क्योंकि सड़क बंद होने से सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी, मरीज, यात्री, पर्यटक और छोटे कारोबारियों को ही उठाना पड़ता है।














