नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट, जिला एवं निचली अदालतों, ट्रिब्यूनल और विभिन्न अर्ध-न्यायिक मंचों पर भारत सरकार का पक्ष रखने वाले वकीलों की नियुक्ति को लेकर नई गाइडलाइन जारी की है। विधि मामलों के विभाग की ओर से 20 अगस्त को जारी ऑफिस मेमोरेंडम में पैनल काउंसिल के चयन, योग्यता, अनुभव, नियुक्ति की अवधि और अयोग्यता के मानदंड स्पष्ट किए गए हैं।
नई व्यवस्था का मकसद सरकार की ओर से अदालतों में पैरवी करने वाले अधिवक्ताओं के चयन में योग्यता, पेशेवर अनुभव और विशेषज्ञता को प्राथमिक आधार बनाना है। इसके तहत पैनल में शामिल होने के इच्छुक वकीलों के लिए कानून की डिग्री के साथ-साथ बार काउंसिल से पंजीकरण और प्रैक्टिस के वैध प्रमाण को जरूरी किया गया है।
लॉ डिग्री से लेकर AIBE तक, कई शर्तें अनिवार्य
गाइडलाइन के अनुसार, पैनल काउंसिल के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवार के पास बार काउंसिल ऑफ इंडिया से मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या कॉलेज से कानून में बैचलर डिग्री होना जरूरी है। इसके अलावा आवेदक का एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत संबंधित स्टेट बार काउंसिल में पंजीकृत होना भी अनिवार्य है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि उम्मीदवार के पास प्रैक्टिस का वैध सर्टिफिकेट होना चाहिए और उसे ऑल-इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) पास किया हुआ होना चाहिए। यानी केवल कानून की डिग्री हासिल कर लेना पैनल में शामिल होने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। उम्मीदवार को पेशेवर रूप से अदालत में प्रैक्टिस करने के लिए निर्धारित वैधानिक शर्तें भी पूरी करनी होंगी।
विशेष कानूनों के जानकार वकीलों को मिलेगा मौका
नई गाइडलाइन में विशेष कानूनों में विशेषज्ञता रखने वाले अधिवक्ताओं के लिए भी अलग रास्ता रखा गया है। इनकम टैक्स, कस्टम्स, जीएसटी, मनी लॉन्ड्रिंग निरोधक कानून (PMLA) जैसे विशेष कानूनों में अनुभव रखने वाले वकीलों पर विशेष पैनल के लिए विचार किया जा सकता है।
ऐसे अधिवक्ताओं की विशेषज्ञता अदालतों के अलावा ट्रिब्यूनल और अर्ध-न्यायिक मंचों पर सरकार के मामलों की प्रभावी पैरवी में उपयोगी मानी जाएगी। इसका अर्थ है कि सरकार केवल सामान्य कानूनी अनुभव के आधार पर ही पैनल तैयार नहीं करेगी, बल्कि जरूरत के मुताबिक विशेष कानूनों के विशेषज्ञों को भी जिम्मेदारी दी जा सकेगी।
सरकारी सेवा में कानूनी अनुभव भी बनेगा आधार
गाइडलाइन में सरकारी सेवा में रहकर कानूनी काम करने वाले वकीलों के लिए भी प्रावधान किया गया है। ऐसे अधिवक्ताओं के पास सरकारी सेवा के दौरान अधिकतम 10 साल तक का कानूनी काम का अनुभव रहा हो, तो उनकी विशेषज्ञता और उपयुक्तता के आधार पर उन्हें पैनल में शामिल करने पर विचार किया जा सकता है।
इस प्रावधान से ऐसे पेशेवरों को अवसर मिलने की संभावना बढ़ेगी, जिन्हें सरकारी मामलों, विभागीय कानूनों और प्रशासनिक प्रक्रिया की व्यावहारिक समझ हासिल है।
आवेदन के साथ देने होंगे जरूरी दस्तावेज
पैनल काउंसिल के लिए आवेदन निर्धारित प्रारूप में विधि मामलों के विभाग के उप सचिव के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। आवेदन के साथ उम्मीदवार को अपने शैक्षणिक प्रमाणपत्रों की सेल्फ-अटेस्टेड प्रतियां भी देनी होंगी।
यदि आवेदक पहले किसी सरकारी पैनल में शामिल रह चुका है तो उसे पूर्व पैनल में नियुक्ति से संबंधित आदेश भी प्रस्तुत करना होगा। इसके अलावा फीस स्ट्रक्चर और निर्धारित शर्तों का पालन करने का वचन देना होगा।
आवेदन में यह घोषणा भी करनी होगी कि उम्मीदवार को किसी आपराधिक मामले में दोषसिद्धि नहीं हुई है और वह किसी ऐसी पेशेवर अयोग्यता के अधीन नहीं है, जो उसे सरकारी पैनल में शामिल होने से रोकती हो।
तीन साल की होगी पैनल नियुक्ति
नई व्यवस्था के तहत पैनल में शामिल किए जाने की अवधि तीन साल या अगले आदेश तक होगी। दोनों में से जो पहले होगा, वही प्रभावी माना जाएगा। हालांकि, पैनल में शामिल होना स्थायी नियुक्ति नहीं माना जाएगा।
सरकार हर साल पैनल में शामिल वकीलों के प्रदर्शन की समीक्षा करेगी। इससे यह आकलन किया जा सकेगा कि संबंधित अधिवक्ता सरकार के मामलों की पैरवी कितनी प्रभावी तरीके से कर रहा है और उसकी पेशेवर भूमिका अपेक्षित मानकों के अनुरूप है या नहीं।
दागदार रिकॉर्ड वाले वकीलों पर सख्ती
गाइडलाइन में पैनल काउंसिल के लिए अयोग्यता के प्रावधान भी स्पष्ट किए गए हैं। एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 24ए के तहत प्रतिबंधित व्यक्ति को पैनल में शामिल नहीं किया जाएगा।
इसके अलावा यदि किसी अधिवक्ता के खिलाफ बार काउंसिल की ओर से पेशेवर अयोग्यता लगाई गई हो, तो भी वह पैनल के लिए अयोग्य हो सकता है। सरकार ने उन मामलों को भी गंभीरता से लिया है, जहां किसी वकील ने पहले भारत संघ के हितों के खिलाफ अपने पद या वकालत की स्थिति का दुरुपयोग किया हो।
ऐसे अधिवक्ताओं को भी पैनल में शामिल करने से बाहर रखा जा सकता है। इससे साफ है कि सरकार की ओर से पैरवी करने वाले वकीलों के लिए केवल कानूनी योग्यता ही नहीं, बल्कि पेशेवर आचरण और विश्वसनीयता को भी महत्वपूर्ण आधार बनाया गया है।
सरकारी मुकदमों की पैरवी में विशेषज्ञता पर जोर
केंद्र की नई गाइडलाइन ऐसे समय में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जब केंद्र सरकार से जुड़े मामले सुप्रीम कोर्ट से लेकर विभिन्न हाईकोर्ट, ट्रिब्यूनल और अर्ध-न्यायिक संस्थाओं तक बड़ी संख्या में लंबित रहते हैं।
नई प्रक्रिया में सामान्य कानूनी योग्यता के साथ विशेषज्ञता और अनुभव को महत्व दिए जाने से सरकार के अलग-अलग विभागों से जुड़े मामलों के लिए अधिक उपयुक्त वकीलों का चयन किया जा सकेगा। खासतौर पर टैक्स, कस्टम्स, जीएसटी और PMLA जैसे तकनीकी एवं विशेष कानूनों से जुड़े मामलों में संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ अधिवक्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
चयन प्रक्रिया में जवाबदेही का प्रयास
तीन साल की अवधि और सालाना प्रदर्शन समीक्षा का प्रावधान पैनल व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में अहम कदम माना जा सकता है। इससे सरकार को ऐसे अधिवक्ताओं को बनाए रखने का अवसर मिलेगा जिनका प्रदर्शन संतोषजनक हो, जबकि अपेक्षित परिणाम न देने वाले या पेशेवर मानकों पर खरे न उतरने वाले वकीलों के मामले में पुनर्विचार किया जा सकेगा।
कुल मिलाकर, नई गाइडलाइन ने केंद्र सरकार की ओर से अदालतों में पैरवी करने वाले पैनल काउंसिल के लिए योग्यता, पेशेवर वैधता, विशेषज्ञता, अनुभव और आचरण—इन सभी पहलुओं को चयन का आधार बनाया है। इससे आने वाले समय में केंद्र के कानूनी पैनल में शामिल होने वाले वकीलों के लिए पेशेवर मानकों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।














