“5 लाख के जुर्माने से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची जंग: नोएडा डीएम मेधा रूपम की SLP के 24 घंटे में आकृति चौधरी का कैविएट, अब आमने-सामने होगी दोनों पक्षों की कानूनी लड़ाई”
नोएडा/नई दिल्ली: नोएडा की डीएम मेधा रूपम पर लगे 5 लाख रुपये के जुर्माने का मामला अब उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था से निकलकर देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के तल्ख फैसले के बाद अब इस मामले में मेधा रूपम और मूल याचिकाकर्ता आकृति चौधरी के बीच कानूनी शह-मात की लड़ाई शुरू हो गई है।
मामले में सबसे पहले नोएडा डीएम मेधा रूपम की ओर से सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन यानी SLP दाखिल की गई। इसके ठीक 24 घंटे के भीतर आकृति चौधरी की ओर से कैविएट दाखिल कर दी गई। इसका सीधा मतलब यह है कि यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कोई अंतरिम आदेश या अन्य महत्वपूर्ण आदेश पारित करने पर विचार करता है, तो आकृति चौधरी का पक्ष भी सुना जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने मेधा रूपम की SLP और आकृति चौधरी की कैविएट को एक साथ मर्ज कर दिया है। यानी अब दोनों पक्षों की दलीलें एक ही न्यायिक प्रक्रिया में सामने आएंगी। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या हाई कोर्ट के 5 लाख रुपये के जुर्माने और तल्ख टिप्पणियों पर सुप्रीम कोर्ट में रोक लगेगी, या आकृति चौधरी हाई कोर्ट के फैसले को बचाने में सफल होंगी?
हाई कोर्ट का फैसला बना पूरे विवाद की जड़
पूरा विवाद इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले से शुरू हुआ, जिसमें अदालत ने आकृति चौधरी के खिलाफ लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA को रद्द कर दिया था।
आकृति चौधरी को अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों से जुड़े आंदोलन के दौरान पुलिस ने गिरफ्तार किया था। बाद में उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की गई। मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा प्रशासन और पुलिस से लगातार सवाल किए और आकृति के खिलाफ कार्रवाई के आधारों तथा सबूतों को अदालत के सामने रखने को कहा।
अदालत के सामने जब पर्याप्त सबूत पेश नहीं किए जा सके तो हाई कोर्ट ने अपने फैसले में NSA की कार्रवाई को निरस्त कर दिया।
लेकिन इस फैसले का सबसे बड़ा और असामान्य हिस्सा नोएडा डीएम पर लगाया गया 5 लाख रुपये का जुर्माना था।
हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि यह रकम डीएम के वेतन से वसूली जाए। अदालत ने यह भी कहा कि NSA लगाने से पहले उपलब्ध सामग्री और पुलिस की रिपोर्ट का उचित सत्यापन किया जाना चाहिए था।
‘ऐसे अधिकारियों से राज्य दमनकारी राज्य बन जाता है’
हाई कोर्ट की नाराजगी सिर्फ जुर्माने तक सीमित नहीं रही। अदालत ने अपने फैसले में प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर बेहद गंभीर टिप्पणी की।
अदालत का कहना था कि यदि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने जैसे गंभीर मामले में अधिकारियों द्वारा उपलब्ध सामग्री का उचित परीक्षण नहीं किया जाता, तो इससे नागरिकों के मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं।
हाई कोर्ट ने मेधा रूपम के सर्विस रिकॉर्ड में भी इस कार्रवाई को दर्ज करने का निर्देश दिया। अदालत की टिप्पणी का सार यह था कि ऐसी प्रशासनिक कार्यप्रणाली राज्य को दमनकारी राज्य में बदलने की स्थिति पैदा कर सकती है।
यही फैसला अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का आधार बन गया है।
9 सितंबर को SG तुषार मेहता ने दे दिए थे संकेत
हाई कोर्ट के फैसले के बाद मामला यहीं नहीं रुका। 9 सितंबर को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान संकेत दिया था कि मेधा रूपम के मामले को चुनौती दी जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के सामने इस बात की जानकारी दी गई थी कि हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ चुनौती दी जाने वाली है। हालांकि उस समय यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि याचिका सीधे मेधा रूपम की ओर से होगी या सरकार की तरफ से।
इसके बाद 15 सितंबर को मेधा रूपम की ओर से वकील विभव मिश्रा के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में SLP दाखिल की गई।
SLP क्यों दाखिल की गई और इसका मतलब क्या है?
स्पेशल लीव पिटीशन संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की जाती है। इसके जरिए किसी हाई कोर्ट या ट्रिब्यूनल के फैसले को सुप्रीम कोर्ट के सामने चुनौती देने की अनुमति मांगी जाती है।
ऐसी याचिका का इस्तेमाल उन मामलों में किया जाता है, जहां याचिकाकर्ता को लगता है कि निचली अदालत या हाई कोर्ट के फैसले में गंभीर कानूनी त्रुटि या न्याय में गंभीर चूक हुई है।
मेधा रूपम की ओर से दाखिल SLP में केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार, आकृति चौधरी के साथ पुलिस कमिश्नर और गौतम बुद्ध नगर के डीएम को प्रतिवादी बनाया गया है।
अब सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ इस चुनौती को किस तरह सुना जाए और क्या हाई कोर्ट के आदेश पर तत्काल कोई अंतरिम राहत दी जानी चाहिए।
SLP के 24 घंटे बाद आकृति का ‘कैविएट अटैक’
मेधा रूपम की SLP दाखिल होने के अगले ही दिन आकृति चौधरी की ओर से कैविएट दाखिल कर दी गई।
कानूनी भाषा में कैविएट का उद्देश्य अदालत को यह सूचित करना होता है कि यदि संबंधित मामले में कोई आदेश पारित करने पर विचार किया जा रहा है तो कैविएटर यानी आकृति चौधरी को भी सुनवाई का अवसर दिया जाए।
आकृति की ओर से वकील पूजा शर्मा ने कैविएट दाखिल की है। इसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया गया है।
इस कदम को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे मेधा रूपम की ओर से मांगी गई किसी संभावित अंतरिम राहत पर आकृति का पक्ष सुने बिना आदेश पारित करना मुश्किल होगा।
यानी जिस मामले में हाई कोर्ट में आकृति चौधरी याचिकाकर्ता थीं, अब उसी मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने डीएम की चुनौती और आकृति की प्रतिरक्षा आमने-सामने होगी।
आखिर नोएडा डीएम पर आई जिम्मेदारी?
इस पूरे मामले की सबसे अहम कड़ी नोएडा मजदूर आंदोलन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई है।
आकृति चौधरी, जो दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा बताई गई हैं, को नोएडा पुलिस ने मजदूर आंदोलन के दौरान हिरासत में लिया था। बाद में उन्हें गिरफ्तार किया गया और उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की गई।
पुलिस की ओर से NSA लगाए जाने की सिफारिश की गई थी, जिसे नोएडा डीएम के स्तर पर मंजूरी दी गई।
यही वह बिंदु है जहां से डीएम की भूमिका सवालों के घेरे में आई।
हाई कोर्ट में आकृति की ओर से दलील दी गई कि उनके खिलाफ देशविरोधी गतिविधि या ऐसी किसी गंभीर गतिविधि का पर्याप्त प्रमाण नहीं था, जिसके आधार पर NSA जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल किया जा सके।
अदालत ने प्रशासन से इस संबंध में सामग्री और सबूत मांगे।
लेकिन सुनवाई के दौरान अदालत को ऐसा पर्याप्त आधार नहीं मिला, जिसके आधार पर NSA के तहत हिरासत को बरकरार रखा जा सके।
‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिक का अधिकार’—आकृति का पक्ष
आकृति चौधरी की ओर से अदालत में यह भी तर्क दिया गया कि शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है।
उनका कहना था कि मजदूरों से जुड़े मुद्दे पर प्रदर्शन के दौरान उनके खिलाफ ऐसी कोई गतिविधि साबित नहीं हुई, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा माना जा सके।
आकृति के वकील ने गिरफ्तारी की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप था कि उन्हें 11 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया था, जबकि रिकॉर्ड में गिरफ्तारी 12 अप्रैल को दिखाई गई।
इसके बाद NSA से जुड़ी प्रक्रिया आगे बढ़ी।
हाई कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम और प्रशासन द्वारा पेश की गई सामग्री की जांच के बाद NSA की कार्रवाई को रद्द कर दिया।
अब सुप्रीम कोर्ट में असली परीक्षा
अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है और यहां सबसे बड़ा सवाल सिर्फ 5 लाख रुपये के जुर्माने का नहीं है। सवाल यह भी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल करते समय प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी की सीमा क्या होगी?
क्या डीएम को पुलिस की रिपोर्ट पर भरोसा करके NSA की मंजूरी देने का अधिकार है, या उन्हें उपलब्ध सामग्री की स्वतंत्र और पर्याप्त जांच भी करनी होगी?
क्या हाई कोर्ट द्वारा व्यक्तिगत रूप से अधिकारी पर आर्थिक दंड लगाना कानूनी रूप से उचित है?
और क्या ऐसी टिप्पणियों को अधिकारी के सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज किया जा सकता है?
इन तमाम सवालों का असर सिर्फ मेधा रूपम के मामले तक सीमित नहीं रहेगा। सुप्रीम कोर्ट का रुख भविष्य में NSA जैसे मामलों में जिलाधिकारियों और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण मिसाल भी बन सकता है।
24 घंटे में बदल गया मुकदमे का समीकरण
एक तरफ मेधा रूपम ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर राहत की उम्मीद जताई है। दूसरी तरफ आकृति चौधरी ने कैविएट दाखिल करके यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि सुप्रीम कोर्ट में उनके पक्ष को सुने बिना कोई बड़ा आदेश न हो।
इस लिहाज से देखें तो 5 लाख रुपये के जुर्माने से शुरू हुई यह कानूनी लड़ाई अब प्रशासनिक अधिकार बनाम नागरिक स्वतंत्रता के बड़े सवाल में बदलती दिखाई दे रही है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्ष आमने-सामने हैं। हाई कोर्ट के फैसले पर आगे क्या होता है, क्या मेधा रूपम को अंतरिम राहत मिलती है, क्या 5 लाख रुपये के जुर्माने पर रोक लगती है और क्या हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां बरकरार रहती हैं—इन सवालों के जवाब अब देश की सर्वोच्च अदालत की सुनवाई में सामने आएंगे।
एक बात साफ है—SLP के बाद कैविएट ने इस मुकदमे की अगली चाल तय कर दी है। अब सुप्रीम कोर्ट में कोई भी बड़ी कानूनी चाल दोनों पक्षों की मौजूदगी में ही चलेगी।














