“सत्ता के शिखर पर पहुंची भाजपा और संगठन के उस पुराने शिल्पी की याद”…?
भारतीय जनता पार्टी आज देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक मशीनरी में गिनी जाती है। चुनाव प्रबंधन, बूथ नेटवर्क, डिजिटल अभियान, संसाधन प्रबंधन और कार्यकर्ताओं की विशाल श्रृंखला—इन सबने भाजपा को एक ऐसी चुनावी ताकत में बदल दिया है, जिसका मुकाबला करना विपक्ष के लिए लगातार कठिन रहा है। लेकिन राजनीति में एक सवाल हमेशा जीवित रहता है—क्या किसी संगठन की ताकत केवल उसके वर्तमान नेतृत्व और संसाधनों से बनती है, या उन पुराने संगठनकर्ताओं की तपस्या भी उसमें शामिल होती है, जिन्होंने कभी जमीन पर ईंट-ईंट जोड़कर उसकी नींव तैयार की थी?
यहीं पर एक नाम बार-बार सामने आता है—”संजय विनायक जोशी।”
वह नेता जो मंचों की चमक से दूर रहा, जिसने सत्ता की राजनीति से ज्यादा संगठन को महत्व दिया, जिसने कार्यकर्ताओं के बीच रहकर राजनीतिक नेटवर्क खड़ा किया और जिसने भाजपा के उस दौर में काम किया जब पार्टी आज जैसी सर्वव्यापी ताकत नहीं थी।
आज प्रश्न यह नहीं है कि संजय जोशी भाजपा के लिए उपयोगी हैं या नहीं। बड़ा प्रश्न यह है कि अगर संगठन के पास ऐसा अनुभवी संगठनकर्ता उपलब्ध है, तो उसे सक्रिय संगठनात्मक भूमिका में वापस लाने की राह में कौन-सी राजनीतिक और व्यक्तिगत बाधाएं खड़ी हैं?
इंजीनियर से प्रचारक और फिर संगठन के रणनीतिकार तक
संजय विनायक जोशी का जन्म 6 अप्रैल 1962 को नागपुर में हुआ। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्यापन भी किया। लेकिन उन्होंने सुविधाजनक पेशेवर जीवन छोड़कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में काम करने का रास्ता चुना। बाद में 1988 में उन्हें गुजरात में भाजपा के संगठनात्मक काम में लगाया गया।
यही वह दौर था जब गुजरात भाजपा अभी वह राजनीतिक शक्ति नहीं बनी थी, जिसके बारे में आज पूरा देश जानता है।
जोशी ने गुजरात में संगठन को बूथ और कार्यकर्ता स्तर तक मजबूत करने में भूमिका निभाई। 1988 से 1995 के बीच उन्होंने नरेंद्र मोदी के साथ भी गुजरात भाजपा में काम किया। बाद में 1998 में उन्हें गुजरात भाजपा का प्रदेश महामंत्री संगठन बनाया गया और 2001 में वे भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन की जिम्मेदारी तक पहुंचे।
यह पद सामान्य राजनीतिक पद नहीं होता। महामंत्री संगठन का काम चुनाव लड़ना भर नहीं होता; वह पार्टी के कार्यकर्ताओं, प्रदेश इकाइयों, विचारधारा, चुनावी रणनीति और केंद्रीय नेतृत्व के बीच सेतु का काम करता है।
यानी संजय जोशी का असली परिचय सत्ता के नेता से अधिक संगठन के नेता का रहा।
वह दौर जब संगठन ही संजय जोशी की पहचान था
2001 से 2005 के बीच राष्ट्रीय महामंत्री संगठन के रूप में जोशी की भूमिका को भाजपा के विस्तार के दौर से जोड़कर देखा गया। उनके समर्थकों और उनके बारे में प्रकाशित प्रोफाइलों में उन्हें जमीनी कार्यकर्ताओं से मजबूत संपर्क रखने वाला संगठनकर्ता बताया गया है।
उनकी कार्यशैली में भाषणों से ज्यादा बैठकों का महत्व था।
वे टीवी कैमरों के नेता नहीं थे।
वे पोस्टर के नेता नहीं थे।
वे सत्ता की कुर्सी के लिए दौड़ने वाले नेता नहीं थे।
उनकी ताकत थी—कार्यकर्ता को पहचानना, उसे जोड़ना और उसे संगठन के लिए इस्तेमाल करना।
यही वजह है कि भाजपा के एक वर्ग में आज भी संजय जोशी का नाम संगठनात्मक क्षमता के प्रतीक के रूप में लिया जाता है।
फिर ऐसा क्या हुआ कि रास्ते अलग हो गए?
संजय जोशी के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मोड़ नरेंद्र मोदी के साथ उनके संबंधों में आई दूरी रही।
2012 में उन्हें पार्टी के सभी पदों से अलग होना पड़ा। उस समय मीडिया रिपोर्टों में मोदी और जोशी के बीच मतभेदों को प्रमुख कारणों में गिना गया। 2013 की एक रिपोर्ट में उन्हें संगठन का महत्वपूर्ण चेहरा बताते हुए यह भी लिखा गया कि मोदी के साथ टकराव के बाद उन्हें लंबे समय तक राजनीतिक हाशिये पर रहना पड़ा।
यहां से संजय जोशी का राजनीतिक जीवन एक अजीब मोड़ पर पहुंच गया।
एक तरफ संगठन में उनकी क्षमता को लेकर सम्मान बना रहा, दूसरी तरफ शीर्ष राजनीतिक समीकरणों ने उनके लिए सक्रिय भूमिका का रास्ता संकरा कर दिया।
2012 में उत्तर प्रदेश में उनके समर्थकों की सक्रियता ने भी यह दिखाया कि कार्यकर्ताओं के एक हिस्से में उनके प्रति भावनात्मक जुड़ाव बना हुआ था। उस समय लखनऊ में उनके स्वागत और उनके समर्थन में कार्यक्रमों की खबरें आई थीं।
2015 में भी कार्यकर्ताओं ने उठाई थी वापसी की मांग
यह केवल किसी एक दौर की बात नहीं थी।
2015 में लखनऊ में ‘संजय जोशी फैंस क्लब’ बनाए जाने और उनके लिए संगठन में सम्मानजनक पद की मांग किए जाने की खबर सामने आई। कुछ भाजपा कार्यकर्ताओं ने सार्वजनिक रूप से उनकी वापसी की मांग की थी।
इसका अर्थ यह नहीं कि भाजपा का पूरा संगठन उनकी वापसी चाहता था। लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण राजनीतिक तथ्य सामने आता है—
संजय जोशी का संगठनात्मक प्रभाव उनके पद से खत्म नहीं हुआ था।
2015 में वे स्वच्छ भारत अभियान और सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में भी सक्रिय दिखाई दिए।
यानी संगठन से औपचारिक दूरी के बावजूद उनका संपर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
आज भाजपा को किस तरह के संगठनकर्ता की जरूरत है?
यहीं से संजय जोशी का वर्तमान महत्व समझ में आता है।
आज भाजपा पहले से कहीं बड़ी पार्टी है। लेकिन बड़ा संगठन हमेशा मजबूत संगठन हो—यह जरूरी नहीं।
जितनी बड़ी पार्टी, उतनी बड़ी चुनौतियां।
नई पीढ़ी के कार्यकर्ताओं को संगठन की विचारधारा से जोड़ना, पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करना, राज्यों में गुटबाजी को नियंत्रित करना, चुनाव के बाहर संगठन को सक्रिय रखना, बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखना और सत्ता तथा संगठन के बीच संतुलन कायम रखना—ये वे क्षेत्र हैं जहां एक अनुभवी संगठनकर्ता की जरूरत होती है।
संजय जोशी की सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि उनका राजनीतिक आधार संगठन था, न कि केवल चुनावी पद।
और शायद यही कारण है कि उनके नाम की चर्चा समय-समय पर फिर उठती रही है।
लेकिन असली सवाल—रास्ते में अड़चन क्या है?
यहां ईमानदार राजनीतिक विश्लेषण जरूरी है।
भाजपा ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा है कि संजय जोशी को संगठन में जिम्मेदारी क्यों नहीं दी जा रही। इसलिए किसी एक कारण को अंतिम सत्य बताना उचित नहीं होगा।
लेकिन भाजपा की राजनीति को समझने वाला व्यक्ति कुछ संभावित बाधाओं को जरूर देख सकता है।
पहली बाधा—पुराने राजनीतिक समीकरण
संजय जोशी और नरेंद्र मोदी के बीच पुराने मतभेद भारतीय राजनीति का दर्ज इतिहास हैं। 2012 के घटनाक्रम और उसके बाद की परिस्थितियों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि दोनों के बीच राजनीतिक दूरी का प्रभाव जोशी के संगठनात्मक भविष्य पर पड़ा।
भले ही समय बहुत बदल गया हो, लेकिन बड़े राजनीतिक संगठनों में पुराने समीकरण पूरी तरह समाप्त हो जाएं, यह हमेशा जरूरी नहीं।
दूसरी बाधा—किसी पुराने शक्ति-केंद्र का पुनर्जीवन
किसी बड़े नेता को वापस लाना केवल एक व्यक्ति की वापसी नहीं होता।
उसके साथ उसके पुराने संपर्क, पुराने कार्यकर्ता, समर्थक और राजनीतिक स्मृतियां भी लौटती हैं।
संजय जोशी की लोकप्रियता का एक पहलू यह भी रहा है कि कार्यकर्ताओं का एक वर्ग उन्हें ‘संगठन के आदमी’ के रूप में देखता रहा है। 2015 की उनकी वापसी की मांग से भी इसका संकेत मिलता है।
ऐसी स्थिति में शीर्ष नेतृत्व स्वाभाविक रूप से यह भी सोच सकता है कि किसी पुराने संगठनकर्ता की वापसी से संगठन में नए संतुलन कैसे बनेंगे।
यह एक राजनीतिक संभावना है, कोई घोषित भाजपा नीति नहीं।
तीसरी बाधा—भाजपा की नई पीढ़ी का नेतृत्व
भाजपा अब 2000 के दशक वाली पार्टी नहीं है।
संगठन में नई पीढ़ी के नेताओं और प्रबंधकों की एक बड़ी श्रृंखला तैयार हो चुकी है। हाल के वर्षों में पार्टी ने अलग-अलग राज्यों से संगठनात्मक क्षमता रखने वाले नेताओं को आगे बढ़ाया है। अगस्त 2026 में हरियाणा के राज्यसभा सांसद संजय भाटिया को भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्रियों में शामिल किया जाना भी संगठन में नए संगठनकर्ताओं को ऊपर लाने की प्रक्रिया का उदाहरण है।
ऐसे समय में संजय जोशी को वापस लाने का अर्थ होगा—पुराने अनुभव और नई पीढ़ी के बीच एक नया संतुलन बनाना।
लेकिन भाजपा के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या प्रतिभा को पुराने मतभेदों से बड़ा होना चाहिए?
यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।
राजनीति में मतभेद होना असामान्य नहीं है।
लेकिन संगठन का भविष्य केवल इस आधार पर तय नहीं होना चाहिए कि किसी नेता के किससे अच्छे या खराब संबंध रहे।
यदि कोई व्यक्ति संगठन को मजबूत करने की क्षमता रखता है, कार्यकर्ताओं में स्वीकार्यता रखता है और वर्षों तक पार्टी के लिए काम कर चुका है, तो उसके अनुभव का उपयोग करना किसी व्यक्ति विशेष की जीत नहीं, बल्कि संगठन की ताकत हो सकती है।
संजय जोशी की वापसी का अर्थ नरेंद्र मोदी के विरुद्ध किसी शक्ति-केंद्र को खड़ा करना नहीं होना चाहिए।
उसे संगठन के पक्ष में एक अनुभवी संसाधन की वापसी के रूप में देखा जाना चाहिए।
भाजपा के लिए संजय जोशी की वापसी क्यों महत्वपूर्ण हो सकती है?
आज जब राजनीति अत्यधिक व्यक्तिकेंद्रित और मीडिया-केंद्रित हो चुकी है, तब एक ऐसा संगठनकर्ता जिसकी पहचान कार्यकर्ताओं के बीच रही हो, पार्टी के लिए उपयोगी हो सकता है।
संजय जोशी की शैली का सबसे बड़ा संदेश यही था कि संगठन केवल चुनाव के समय सक्रिय होने वाली मशीन नहीं है।
संगठन रोज बनता है।
कार्यकर्ता रोज जुड़ता है।
विश्वास रोज पैदा होता है।
और नाराज कार्यकर्ता को भी रोज संभालना पड़ता है।
यही वह जगह है जहां पुराने संगठनकर्ताओं का अनुभव नई पीढ़ी के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।
संजय जोशी को पद नहीं, भूमिका चाहिए
शायद आज इस बहस को एक अलग तरीके से देखने की जरूरत है।
जरूरी नहीं कि संजय जोशी को वही पद दिया जाए जो उन्होंने दो दशक पहले संभाला था।
जरूरी यह है कि उनकी संगठनात्मक क्षमता का इस्तेमाल किया जाए।
उन्हें प्रशिक्षण, कार्यकर्ता विकास, संगठनात्मक पुनर्गठन, राज्यों में समन्वय, वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से संवाद या चुनावी संगठन की किसी विशेष जिम्मेदारी में लगाया जा सकता है।
अर्थात सवाल यह नहीं होना चाहिए कि—
“संजय जोशी को कौन-सा पद मिलेगा?”
सवाल होना चाहिए—
“भाजपा उनके अनुभव का उपयोग किस तरह करेगी?”
एक ‘हीरे’ को शोकेस में रखने से संगठन मजबूत नहीं होता
संजय जोशी की कहानी भाजपा की राजनीति का एक बड़ा विरोधाभास भी सामने रखती है।
जिस संगठन ने उन्हें तैयार किया, उसी संगठन के विस्तार में उन्होंने योगदान दिया; लेकिन बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों में वे सक्रिय सत्ता-संगठन की मुख्यधारा से बाहर हो गए।
राजनीति में यह स्वाभाविक है। सत्ता बदलती है, समीकरण बदलते हैं, प्राथमिकताएं बदलती हैं।
लेकिन संगठन के पास यदि कोई अनुभवी व्यक्ति मौजूद है, तो उसे केवल इसलिए अप्रयुक्त छोड़ देना कि वह किसी पुराने राजनीतिक अध्याय से जुड़ा हुआ है—इस पर विचार होना चाहिए।
हीरा चाहे पुराना हो जाए, उसकी चमक खत्म नहीं होती; जरूरत केवल उसे सही जगह जड़ने की होती है।
अंतिम सवाल भाजपा से नहीं, भाजपा के भविष्य से है
संजय जोशी की वापसी की मांग को किसी गुट की मांग बनाना इस मुद्दे को छोटा कर देगा।
इसे भाजपा के संगठनात्मक भविष्य के प्रश्न के रूप में देखना चाहिए।
क्या भाजपा आने वाले वर्षों में केवल चुनाव जीतने वाली मशीन बनना चाहती है?
या वह ऐसा संगठन भी बनना चाहती है जिसमें पुराने तपस्वी कार्यकर्ताओं का अनुभव और नई पीढ़ी की ऊर्जा साथ-साथ चल सके?
यदि दूसरा विकल्प है, तो संजय जोशी जैसे नेताओं के अनुभव को उपयोग में लाने पर विचार करना चाहिए।
क्योंकि राजनीतिक दल केवल बड़े नेताओं से नहीं चलते।
वे उन हजारों-लाखों कार्यकर्ताओं से चलते हैं जो बिना पद, बिना प्रचार और बिना कैमरे के वर्षों तक संगठन के लिए काम करते हैं।
संजय जोशी इसी राजनीतिक संस्कृति के प्रतिनिधि माने जाते हैं।
आज भाजपा के सामने चुनौती पहले से अलग है। पार्टी को अब केवल विस्तार नहीं करना; उसे अपने विशाल संगठन को लगातार जीवंत, अनुशासित और कार्यकर्ता-केंद्रित बनाए रखना है।
ऐसे समय में सवाल यह नहीं कि “संजय जोशी की जरूरत भाजपा को है या नहीं?”
सवाल यह है कि—
“क्या भाजपा अपने पुराने संगठनात्मक अनुभव को वर्तमान की जरूरतों से जोड़ने का साहस करेगी?”
और यदि पुराने मतभेद आज भी किसी स्तर पर रास्ते में हैं, तो समय का तकाजा यही कहता है कि संगठनात्मक हित को व्यक्तिगत इतिहास से ऊपर रखा जाए।
क्योंकि अंततः किसी भी बड़े राजनीतिक संगठन की असली ताकत उसके नेताओं की संख्या नहीं होती।
उसकी असली ताकत यह होती है कि वह अपने सबसे सक्षम लोगों की क्षमता का कितना ईमानदारी से उपयोग करता है।
संजय जोशी की कहानी भाजपा के लिए इसी सवाल का आईना है।
और शायद यही वह समय है जब भाजपा को अपने इस पुराने संगठन-शिल्पी की ओर फिर से देखना चाहिए—पद देने के लिए नहीं, बल्कि उस अनुभव को संगठन की नई यात्रा में लगाने के लिए, जिसने कभी पार्टी की नींव को मजबूत करने में अपनी पूरी जिंदगी लगा दी थी।














