HomePoliticsराज्यसभा के रण में ‘अब्बास कनेक्शन’ से गरमाई यूपी की सियासत!

राज्यसभा के रण में ‘अब्बास कनेक्शन’ से गरमाई यूपी की सियासत!

“अखिलेश यादव से अब्बास अंसारी की लंबी मुलाकात ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल—सपा के तीसरे उम्मीदवार के लिए नंबर जुटाने की कवायद के बीच बंद कमरे की बातचीत पर सियासी गलियारों में अटकलों का दौर”

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव से पहले अचानक मुलाकातों, दावों, नारों और सियासी संकेतों का तापमान बढ़ गया है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव एक तरफ राज्यसभा के तीसरे उम्मीदवार के लिए संख्या जुटाने की रणनीति पर काम करने का संकेत दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के विधायक अब्बास अंसारी की अखिलेश यादव से मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है।

लखनऊ स्थित समाजवादी पार्टी के प्रदेश मुख्यालय में हुई इस मुलाकात की अवधि को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में करीब एक घंटे से लेकर डेढ़ घंटे तक का उल्लेख है। मुलाकात के बाद अब्बास अंसारी मीडिया से बिना बातचीत किए बाहर निकल गए। बैठक में क्या चर्चा हुई, इस पर दोनों पक्षों की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। यही चुप्पी इस मुलाकात को लेकर राजनीतिक अटकलों को और हवा दे रही है।

तीसरे उम्मीदवार का गणित और अचानक हुई मुलाकात

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि समाजवादी पार्टी ने बुधवार को राम गोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी को राज्यसभा के लिए उम्मीदवार घोषित कर दिया है। दोनों ने नामांकन भी दाखिल किया। पार्टी ने तीसरे उम्मीदवार के नाम का औपचारिक ऐलान अभी नहीं किया है और अखिलेश यादव ने संकेत दिया है कि संख्या पूरी होने के बाद ही तीसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारा जाएगा।

यानी कहानी केवल एक मुलाकात की नहीं है। असली सवाल उस राजनीतिक गणित का है जिसमें एक-एक विधायक की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

उत्तर प्रदेश की दस राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान निर्धारित है। चुनाव कार्यक्रम के अनुसार नामांकन की अंतिम तारीख 6 अक्टूबर है और जरूरत पड़ने पर 16 अक्टूबर को मतदान होगा।

इसी समय अब्बास अंसारी का सपा अध्यक्ष से मिलना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।

अब्बास अंसारी: सुभासपा विधायक, लेकिन सपा से राजनीतिक रिश्तों की अलग कहानी

अब्बास अंसारी वर्तमान में सुभासपा के विधायक हैं। उनके परिवार के राजनीतिक रिश्ते समाजवादी पार्टी से भी जुड़े रहे हैं। उनके चाचा अफजाल अंसारी सपा से सांसद हैं, जबकि परिवार के अन्य सदस्य भी सपा की राजनीति से जुड़े रहे हैं।

ऐसे में अखिलेश यादव और अब्बास अंसारी की मुलाकात को केवल एक सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार मुलाकात मानना है या इसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक संवाद है—यह सवाल फिलहाल खुला हुआ है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि मुलाकात के एजेंडे की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि बैठक में राज्यसभा उम्मीदवार के समर्थन या किसी राजनीतिक समझौते पर निर्णय हुआ। लेकिन यह भी तथ्य है कि मुलाकात ऐसे समय हुई है जब सपा तीसरे उम्मीदवार के लिए आवश्यक समर्थन जुटाने की बात कर रही है। यही टाइमिंग राजनीतिक चर्चाओं को धार दे रही है।

37 वोट का गणित, हर विधायक की अहमियत

राज्यसभा चुनाव में राजनीतिक समीकरण सामान्य विधानसभा चुनाव से अलग होते हैं। रिपोर्टों के अनुसार उत्तर प्रदेश में एक उम्मीदवार को जीत के लिए 37 प्रथम वरीयता वोटों की आवश्यकता होगी। ऐसे में घोषित उम्मीदवारों के बाद अतिरिक्त उम्मीदवार उतारना सीधे संख्या बल से जुड़ा सवाल बन जाता है।

यही वजह है कि सपा की तीसरे उम्मीदवार को लेकर रणनीति पर लगातार नजर बनी हुई है।

सपा के सामने सवाल सिर्फ उम्मीदवार घोषित करने का नहीं, बल्कि उसे जीत दिलाने के लिए पर्याप्त प्रथम वरीयता वोट जुटाने का है। इसके लिए सहयोगी दलों, छोटे दलों और स्वतंत्र या अलग रुख रखने वाले विधायकों की भूमिका चर्चा में आ सकती है।

ऐसे माहौल में अब्बास अंसारी की अखिलेश यादव से मुलाकात ने राजनीतिक गणित को लेकर सवाल जरूर खड़े किए हैं, लेकिन उनके जवाब अभी बैठक के बंद दरवाजों के भीतर ही हैं।

अखिलेश का संकेत—‘नंबर पूरे होंगे, तभी तीसरा उम्मीदवार’

अखिलेश यादव ने तीसरे उम्मीदवार के सवाल पर जिस तरह संख्या पूरी करने की बात कही है, उससे साफ है कि सपा इस बार बिना पर्याप्त समर्थन के जोखिम उठाने से बचना चाहती है।

अखिलेश ने यह भी संकेत दिया है कि कुछ लोग वापस आना चाहते हैं और कुछ स्थानों पर असंतोष है। इन बयानों ने भी सियासी चर्चाओं को तेज किया है।

लेकिन यहां भी फर्क समझना जरूरी है—राजनीतिक बयान एक बात है और किसी विधायक का औपचारिक समर्थन दूसरी। जब तक संबंधित विधायक या पार्टी आधिकारिक तौर पर अपना रुख स्पष्ट नहीं करती, तब तक किसी भी मुलाकात को समर्थन या पाला बदलने का प्रमाण मानना राजनीतिक अटकल ही रहेगा।

राजभर की सियासत में ‘तलाक’ वाला तंज फिर सुर्खियों में

उधर अब्बास अंसारी की मुलाकात के बीच सुभासपा अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर का अखिलेश यादव पर हमला भी चर्चा में है।

अखिलेश यादव के उस बयान के संदर्भ में कि यदि कोई ओम प्रकाश राजभर को वापस ले आए तो वह उन्हें स्वीकार कर लेंगे, राजभर ने अपने पुराने ‘राजनीतिक तलाक’ वाले तंज को फिर सामने रखा।

राजभर का कहना है कि जब अखिलेश यादव ने उन्हें राजनीतिक रूप से ‘तलाक’ दे दिया और उन्होंने भी उसे स्वीकार कर लिया, तो वापस जाने का सवाल ही नहीं उठता। इस तरह राजभर ने अखिलेश के बयान को राजनीतिक व्यंग्य में बदलते हुए पलटवार किया।

यह ‘तलाक’ वाली राजनीतिक भाषा नई नहीं है। सपा और सुभासपा के बीच रिश्तों में आई दूरी के दौरान राजभर पहले भी इसी शब्दावली का इस्तेमाल कर चुके हैं।

एक तरफ राजभर, दूसरी तरफ अब्बास—क्या बदल रहा है सियासी समीकरण?

यहीं से उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनीति का दिलचस्प पहलू सामने आता है।

एक ही राजनीतिक परिवार से जुड़े अब्बास अंसारी की अखिलेश यादव से मुलाकात और दूसरी ओर सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर का अखिलेश पर हमला—दोनों घटनाएं एक ही समय में सामने आई हैं।

लेकिन इनके बीच सीधा राजनीतिक संबंध स्थापित करने के लिए फिलहाल पर्याप्त आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

फिर भी राज्यसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सपा को तीसरे उम्मीदवार के लिए अतिरिक्त समर्थन की जरूरत होगी और सुभासपा विधायक के रूप में अब्बास अंसारी की राजनीतिक स्थिति अलग महत्व रखती है।

अंसारी परिवार के पुराने रिश्ते फिर चर्चा के केंद्र में

अखिलेश और अब्बास की मुलाकात ने अंसारी परिवार और समाजवादी पार्टी के पुराने राजनीतिक संबंधों को भी फिर चर्चा में ला दिया है।

एक तरफ अब्बास अंसारी सुभासपा के विधायक हैं, दूसरी तरफ उनके परिवार के सदस्य सपा के साथ राजनीतिक रूप से जुड़े हुए हैं। ऐसे में परिवार के भीतर अलग-अलग राजनीतिक रास्तों की मौजूदगी अपने आप में उत्तर प्रदेश की गठबंधन राजनीति की जटिलता को दिखाती है।

अब सवाल यह है कि यह मुलाकात केवल राजनीतिक संवाद तक सीमित रहेगी या आने वाले दिनों में इसका कोई औपचारिक राजनीतिक असर दिखाई देगा।

इसका जवाब फिलहाल किसी नेता ने सार्वजनिक रूप से नहीं दिया है।

सपा के सामने असली चुनौती—घोषणा नहीं, संख्या

राज्यसभा चुनाव में सपा के लिए सबसे बड़ा सवाल तीसरे उम्मीदवार के नाम का नहीं, बल्कि उसके पीछे खड़े होने वाले विधायकों की संख्या का है।

दो उम्मीदवारों—राम गोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी—के नाम घोषित हो चुके हैं। अब तीसरे उम्मीदवार के लिए पार्टी को अतिरिक्त संख्या की जरूरत होगी। 30 सितंबर को दोनों उम्मीदवारों के नामांकन के बाद भी तीसरे उम्मीदवार का नाम सामने नहीं आया।

इससे संकेत मिलता है कि पार्टी नेतृत्व अभी राजनीतिक गणित को अंतिम रूप देने की कोशिश में है।

क्या ‘मुलाकात’ से आगे बढ़ेगी कहानी?

अब्बास अंसारी और अखिलेश यादव की मुलाकात के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह सिर्फ संवाद था या इसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक गणित भी है?

फिलहाल इसका उत्तर किसी आधिकारिक बयान में नहीं है।

अब्बास अंसारी ने मुलाकात के बाद मीडिया से बात नहीं की। सपा ने भी बैठक के एजेंडे को सार्वजनिक नहीं किया। इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय घटनाक्रम पर नजर रखना ही तथ्यात्मक स्थिति है।

लेकिन राजनीति में टाइमिंग भी अपने आप में एक संदेश होती है। राज्यसभा चुनाव की तारीख घोषित है, नामांकन की प्रक्रिया चल रही है, सपा दो उम्मीदवार घोषित कर चुकी है और तीसरे के लिए संख्या जुटाने की बात कर रही है। इसी बीच सुभासपा विधायक अब्बास अंसारी का सपा अध्यक्ष से लंबी बैठक करना निश्चित तौर पर राजनीतिक चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक है।

अब निगाह 6 अक्टूबर और 16 अक्टूबर पर

अब आने वाले दिनों में तस्वीर ज्यादा स्पष्ट हो सकती है। 6 अक्टूबर नामांकन की अंतिम तारीख है। इसके बाद 7 अक्टूबर को नामांकन पत्रों की जांच होगी और 9 अक्टूबर तक नाम वापस लिए जा सकेंगे। जरूरत पड़ने पर 16 अक्टूबर को मतदान होगा।

यानी सपा के पास तीसरे उम्मीदवार को लेकर फैसला करने के लिए सीमित समय है।

लखनऊ में बंद कमरे की मुलाकात ने सवाल खड़े कर दिए हैं। राजभर के बयान ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है। सपा तीसरे उम्मीदवार के लिए संख्या जुटाने की बात कर रही है।

अब असली परीक्षा यही है कि क्या मुलाकातें वोटों में बदलती हैं, या यह पूरी कवायद सिर्फ राजनीतिक संवाद और दबाव की रणनीति तक सीमित रहती है?

फिलहाल जवाब सामने नहीं है।

इतना जरूर साफ है कि राज्यसभा चुनाव ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ही शक्ति-संतुलन, असंतोष, संभावित पुनर्संयोजन और विधायकों की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

पर्दाफाश न्यूज़ की नजर में इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल यही है—लखनऊ में बंद दरवाजे के पीछे हुई मुलाकात का असर सदन के खुले मतदान में कितना दिखाई देगा?

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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