“आरडब्ल्यूए का कड़ा रुख, जिलाधिकारी मेधा रूपम से हस्तक्षेप की मांग; 7 से 10 साल पुराने मकानों पर नोटिस भेजने का दावा”
नोएडा: सेक्टर-105 में रहने वाले लोगों के बीच इन दिनों निर्माण उपकर यानी ‘लेबर सेस’ को लेकर जबरदस्त असंतोष देखने को मिल रहा है। उप श्रम आयुक्त कार्यालय की ओर से कथित तौर पर सेक्टर के कई मकान मालिकों को भेजे जा रहे भारी-भरकम नोटिसों ने निवासियों की चिंता बढ़ा दी है। आरडब्ल्यूए का आरोप है कि वर्षों पहले बन चुके मकानों के लिए अब काल्पनिक निर्माण लागत निर्धारित कर उस पर लेबर सेस, ब्याज और पेनल्टी की चेतावनी दी जा रही है।
मामला अब सिर्फ व्यक्तिगत नोटिसों तक सीमित नहीं रह गया है। सेक्टर-105 की आरडब्ल्यूए ने इसे जनहित और आम नागरिकों पर आर्थिक बोझ से जुड़ा मुद्दा बताते हुए गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। आरडब्ल्यूए अध्यक्ष दिव्य कृष्णात्रेय ने जिलाधिकारी को पत्र सौंपकर कथित तौर पर जारी किए गए नोटिसों को निरस्त करने और पूरी प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की है।
2017-18 के कथित GIS सर्वे पर सवाल
आरडब्ल्यूए अध्यक्ष दिव्य कृष्णात्रेय के मुताबिक, उपकर निर्धारण अधिकारी एवं उप श्रमायुक्त, सेक्टर-3, नोएडा के कार्यालय की ओर से वर्ष 2017-18 के कथित GIS सर्वे को आधार बनाकर मकानों की निर्माण लागत निर्धारित की गई है।
आरडब्ल्यूए का आरोप है कि इस प्रक्रिया में संबंधित मकानों की वास्तविक स्थिति, निर्माण की प्रकृति और मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन जैसे पहलुओं को पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखा गया। इसके बाद वर्षों पुराने मकानों के मालिकों को ऐसे नोटिस भेजे जा रहे हैं, जिनमें निर्माण लागत लाखों रुपये में दर्शाई गई है।
निवासियों का कहना है कि यदि किसी मकान का निर्माण कई वर्ष पहले पूरा हो चुका है तो इतने लंबे अंतराल के बाद अचानक भारी रकम के नोटिस मिलने से परिवारों के सामने आर्थिक और मानसिक परेशानी खड़ी हो रही है।
एक नोटिस में 94.50 लाख की ‘निर्माण लागत’, सेस ₹94,500 से ज्यादा
आरडब्ल्यूए ने अपने पत्र में नोटिसों की प्रकृति को समझाने के लिए कुछ उदाहरण भी सामने रखे हैं। प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, श्रीमती कमलेश गुप्ता, मकान संख्या B-235, को पत्रांक 12065/26 के तहत नोटिस भेजा गया है। इसमें कथित तौर पर निर्माण लागत ₹94.50 लाख दर्शाई गई और इसके आधार पर ₹94,500.03 का लेबर सेस निर्धारित किया गया।
इसी तरह श्री जमील अहमद, मकान संख्या B-270, को कथित तौर पर ₹86,351 तथा श्री जय चंद एस., मकान संख्या B-229, को ₹11,886 का नोटिस भेजे जाने की बात आरडब्ल्यूए ने कही है।
आरडब्ल्यूए का दावा है कि ये आंकड़े वास्तविक निर्माण लागत के बजाय सर्वे के आधार पर निर्धारित की गई अनुमानित या काल्पनिक लागत पर आधारित हैं। इसी वजह से संगठन ने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और वैधानिकता पर सवाल उठाए हैं।
‘दो प्रतिशत प्रतिमाह ब्याज और 100 प्रतिशत तक पेनल्टी’ की चेतावनी
मामले को लेकर आरडब्ल्यूए की सबसे बड़ी आपत्ति सिर्फ मूल सेस की रकम को लेकर नहीं है। संगठन का कहना है कि नोटिसों में 2 प्रतिशत प्रतिमाह ब्याज और 100 प्रतिशत तक पेनल्टी लगाए जाने की चेतावनी भी दी जा रही है।
यदि लंबे समय से लंबित किसी कथित देनदारी पर ब्याज और पेनल्टी जोड़ दी जाए तो मूल रकम की तुलना में देनदारी काफी बढ़ सकती है। ऐसे में आरडब्ल्यूए का कहना है कि जिन परिवारों को वर्षों बाद नोटिस मिल रहे हैं, उनके सामने अचानक बड़ा आर्थिक दायित्व खड़ा हो रहा है।
विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों और सेवानिवृत्त लोगों को लेकर आरडब्ल्यूए ने चिंता जताई है। संगठन का कहना है कि जिन लोगों ने वर्षों पहले अपने मकान का निर्माण कराया और अपने स्तर पर तमाम औपचारिकताएं पूरी कीं, उन्हें अब अचानक पुराने निर्माण से जुड़ी बड़ी रकम का नोटिस मिलना गंभीर विषय है।
आरडब्ल्यूए का सवाल—निर्माण के समय क्यों नहीं लिया गया उपकर?
आरडब्ल्यूए अध्यक्ष दिव्य कृष्णात्रेय ने अपने पत्र में मूल सवाल उठाया है कि यदि किसी मकान के निर्माण पर लेबर सेस देय था तो उसकी वसूली निर्माण के समय या कंप्लीशन सर्टिफिकेट (CC) जारी करते समय क्यों नहीं की गई?
आरडब्ल्यूए का तर्क है कि मकान के निर्माण को पूरा हुए कई वर्ष गुजर जाने के बाद अचानक नोटिस भेजे जाने से नागरिकों के लिए पुराने दस्तावेज, भुगतान संबंधी रिकॉर्ड और निर्माण से जुड़ी जानकारी जुटाना भी मुश्किल हो सकता है।
संगठन का यह भी दावा है कि नोएडा प्राधिकरण के नियमों और संबंधित लीज डीड में इस प्रकार के सेस का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। हालांकि इस कानूनी दावे की अंतिम पुष्टि सक्षम प्राधिकारी अथवा न्यायिक स्तर पर ही हो सकती है।
‘तीन साल की समयसीमा बीतने के बाद वसूली कैसे?’
आरडब्ल्यूए ने अपने पत्र में कथित तौर पर तीन वर्ष की कानूनी समयसीमा का भी मुद्दा उठाया है। संगठन का कहना है कि निर्माण पूरा होने के वर्षों बाद, कथित समयसीमा बीतने के बावजूद इस तरह की वसूली की प्रक्रिया शुरू करना कानूनी रूप से सवालों के घेरे में आता है।
यही वजह है कि आरडब्ल्यूए ने जिलाधिकारी से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और कानूनी स्थिति स्पष्ट कराने की मांग की है।
संगठन का कहना है कि यदि उपकर वास्तव में देय है तो उसकी गणना के लिए स्पष्ट नियम, वास्तविक निर्माण लागत और संबंधित मकान की वास्तविक स्थिति को आधार बनाया जाना चाहिए। केवल पुराने GIS सर्वे के आधार पर रकम तय करने से नागरिकों के हित प्रभावित हो सकते हैं।
‘पहले भौतिक सत्यापन हो, फिर हो कोई कार्रवाई’
आरडब्ल्यूए की ओर से जिलाधिकारी के समक्ष एक महत्वपूर्ण मांग यह रखी गई है कि सेक्टर-105 के सभी संबंधित मकानों का भौतिक सत्यापन कराया जाए।
संगठन का कहना है कि कागजी अथवा GIS रिकॉर्ड के आधार पर निर्माण लागत तय करने के बजाय मौके पर जाकर वास्तविक निर्माण, क्षेत्रफल और संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन किया जाना चाहिए। इसके बाद ही यदि कोई देनदारी बनती है तो उसे नियमों के अनुरूप निर्धारित किया जाए।
आरडब्ल्यूए का दावा है कि पारदर्शी भौतिक सत्यापन से न केवल नागरिकों की आपत्तियों का समाधान हो सकता है, बल्कि विभाग के रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति के बीच किसी भी अंतर को भी दूर किया जा सकता है।
जिलाधिकारी से उम्मीद, ‘जनहित में तत्काल नोटिस निरस्त हों’
सेक्टर-105 आरडब्ल्यूए ने जिलाधिकारी मेधा रूपम से मांग की है कि निवासियों को भेजे गए कथित नियमविरुद्ध नोटिसों की समीक्षा कर उन्हें जनहित में तत्काल निरस्त किया जाए।
साथ ही संगठन ने मांग की है कि जब तक पूरे मामले की जांच और सत्यापन न हो जाए, तब तक संबंधित वसूली प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए। आरडब्ल्यूए का कहना है कि नागरिकों को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए और किसी भी प्रकार की एकतरफा कार्रवाई से बचा जाना चाहिए।
आरडब्ल्यूए अध्यक्ष ने भरोसा जताया है कि जिलाधिकारी के हस्तक्षेप से इस मामले का समाधान निकल सकता है और सेक्टर के निवासियों को आर्थिक तथा मानसिक तनाव से राहत मिल सकती है।
सिर्फ कुछ मकानों का मामला नहीं, पूरे सेक्टर में चिंता
लेबर सेस के नोटिसों को लेकर उठे विवाद का असर अब सेक्टर के व्यापक माहौल पर भी दिखाई दे रहा है। जिन लोगों को नोटिस मिले हैं, वे अपनी देनदारी, निर्माण लागत और पुराने रिकॉर्ड को लेकर चिंतित हैं। वहीं अन्य निवासी भी इस बात को लेकर आशंकित हैं कि भविष्य में उनके मकानों को लेकर भी इसी प्रकार की मांग सामने आ सकती है या नहीं।
यही कारण है कि आरडब्ल्यूए इसे केवल कुछ व्यक्तिगत नोटिसों का मामला न मानकर पूरे सेक्टर के निवासियों के अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बता रही है।
आरडब्ल्यूए का कहना है कि नागरिक कानून और नियमों का सम्मान करते हैं, लेकिन सरकारी विभागों की ओर से की जाने वाली किसी भी वसूली में पारदर्शिता, उचित प्रक्रिया और वास्तविक तथ्यों का ध्यान रखा जाना जरूरी है।
अब निगाह प्रशासन के अगले कदम पर
सेक्टर-105 के इस विवाद में अब सबसे महत्वपूर्ण भूमिका प्रशासन की हो सकती है। आरडब्ल्यूए ने जिलाधिकारी मेधा रूपम से सीधे हस्तक्षेप की मांग की है। ऐसे में देखना होगा कि प्रशासन इन नोटिसों की प्रक्रिया, GIS सर्वे के आधार, निर्माण लागत के आकलन, ब्याज और पेनल्टी की गणना तथा कथित समयसीमा जैसे सवालों पर क्या रुख अपनाता है।
फिलहाल सेक्टर-105 में एक ही सवाल चर्चा में है—क्या वर्षों पुराने मकानों पर अब अचानक भेजे जा रहे लेबर सेस नोटिस वास्तव में नियमों और वास्तविक निर्माण स्थिति के अनुरूप हैं?
आरडब्ल्यूए ने स्पष्ट किया है कि वह सेक्टर के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए इस मामले को मजबूती से उठाती रहेगी। अब निवासियों की नजर प्रशासनिक कार्रवाई और इस पूरे मामले पर आने वाले आधिकारिक स्पष्टीकरण पर टिकी है।














