“एलिवेटेड रोड पर ‘खतरा’ देखकर प्राधिकरण ने खोज निकाला हरित समाधान, गड्ढे की मरम्मत की जगह लगा दिया पौधा; बेरिकेडिंग ने संभाली सुरक्षा की जिम्मेदारी
नोएडा वालों को बधाई। शहर विकास की एक ऐसी नई ऊंचाई पर पहुंच गया है, जहां सड़क पर बने गड्ढे अब समस्या नहीं, हरियाली का अवसर बन गए हैं। एलिवेटेड रोड पर अगर कहीं गहरा गड्ढा दिखाई दे तो घबराने की जरूरत नहीं है। न शिकायत करने की जरूरत, न सड़क विभाग के चक्कर लगाने की जरूरत और न ही यह पूछने की जरूरत कि सड़क आखिर टूटी कैसे।
बस थोड़ा इंतजार कीजिए।
संभव है अगली बार गड्ढे में सड़क भरने के बजाय पौधा लगा हुआ मिले।
नोएडा के एलिवेटेड रोड पर कुछ ऐसा ही नजारा सामने आया है। सड़क पर बने गहरे गड्ढे के चारों ओर बेरिकेड लगा दिए गए और उसके भीतर एक पौधा लगा दिया गया।
यानी सड़क टूटी तो सही, लेकिन व्यवस्था ने उसमें भी पर्यावरण संरक्षण की संभावना खोज निकाली।
अब यह तय करना मुश्किल है कि नोएडा में सड़कें वाहन चलाने के लिए बनाई जाती हैं या फिर पौधे लगाने के लिए।
गड्ढा था, साहब! प्राधिकरण ने उसे ‘ग्रीन जोन’ बना दिया
आम शहरों में सड़क पर गड्ढा हो जाए तो विभाग की पहली चिंता होती है—इसे जल्द से जल्द भरा जाए।
नोएडा शायद इस मामले में थोड़ा आगे निकल चुका है।
यहां गड्ढा दिखा तो शायद सोचा गया होगा कि सड़क तो कभी न कभी ठीक हो जाएगी, लेकिन पौधा लगाने का मौका हाथ से क्यों जाने दिया जाए?
नतीजा सामने है।
गड्ढे के चारों ओर बेरिकेडिंग और बीच में पौधा।
दृश्य ऐसा मानो एलिवेटेड रोड पर अचानक ‘मिनी ग्रीन पार्क’ विकसित करने की परियोजना शुरू हो गई हो।
बस एक बेंच की कमी है। अगर वह भी रख दी जाए तो वाहन चालकों के लिए यह स्पष्ट हो जाएगा कि यहां सड़क की मरम्मत नहीं, बल्कि सौंदर्यीकरण परियोजना चल रही है।
नोएडा का नया फॉर्मूला: गड्ढा + पौधा = विकास
शहर में विकास की परिभाषाएं बदल रही हैं।
पहले विकास का मतलब सड़क बनाना, उसे मजबूत रखना और समय पर मरम्मत करना माना जाता था।
अब शायद नया फॉर्मूला कुछ ऐसा है—
गड्ढा मिला → बेरिकेड लगाओ → पौधा लगाओ → फोटो खिंचाओ → समस्या पर चर्चा खत्म।
अगर यह मॉडल सफल रहा तो भविष्य में शहर के अन्य हिस्सों में भी इसका विस्तार किया जा सकता है।
जहां सड़क में बड़ा गड्ढा मिले, वहां पौधा।
जहां गड्ढा थोड़ा छोटा हो, वहां फूल।
और जहां सड़क पूरी तरह खराब हो, वहां शायद पूरा ग्रीन बेल्ट विकसित कर दिया जाए।
इससे एक साथ दो फायदे होंगे—सड़क की खराब हालत पर सवाल कम होंगे और शहर की हरियाली के आंकड़े बढ़ेंगे।
पहले कहीं गड्ढे पर रेड कार्पेट, अब यहां पौधा
व्यंग्य की विडंबना देखिए कि सड़क के गड्ढे के समाधान के लिए देश में भी शायद नए-नए प्रयोग हो रहे हैं।
कहीं गड्ढे के ऊपर रेड कार्पेट बिछाने की चर्चा सामने आती है और यहां गड्ढे में पौधा लगा दिया जाता है।
कल को कहीं गड्ढे पर फूलों की माला डाल दी जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
और अगर किसी दिन किसी बड़े गड्ढे पर फीता काटकर उसका उद्घाटन हो जाए तो भी शायद लोग यही कहेंगे—
“वाह! नोएडा ने फिर कुछ नया कर दिखाया।”
दरअसल समस्या गड्ढे से ज्यादा उस सोच की है, जिसमें समस्या के स्थायी समाधान से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका तत्काल प्रबंधन दिखाई देता है।
वाहन चालक सोच रहा—ब्रेक लगाऊं या पौधे को पानी दूं?
एलिवेटेड रोड कोई पार्क नहीं है।
यहां वाहन चलते हैं। कई जगह वाहन तेज गति से चलते हैं। ऐसे मार्ग पर सड़क के बीच गहरा गड्ढा होना मामूली बात नहीं है।
अब वाहन चालक जब इस जगह से गुजरता होगा तो उसके सामने दो दृश्य होंगे—एक तरफ गड्ढा और दूसरी तरफ पौधा।
वह सोचता होगा कि सड़क बचानी है या पौधा?
ब्रेक लगाना है या पौधे को रास्ता देना है?
और अगर रात के समय यह गड्ढा अचानक सामने आ जाए तो फिर प्रकृति प्रेम से ज्यादा जरूरी होगा कि वाहन चालक किसी तरह खुद को और अपने वाहन को सुरक्षित रख सके।
बेरिकेडिंग निश्चित रूप से दुर्घटना रोकने के लिए जरूरी कदम है। लेकिन सवाल यह है कि बेरिकेड सड़क की मरम्मत का विकल्प कब से बन गया?
नोएडा में गड्ढा मिला तो प्राधिकरण ने कर दिया ‘ग्रीन डेवलपमेंट’! 🌱
एलिवेटेड रोड पर गहरे गड्ढे के चारों तरफ बैरिकेडिंग की गई और गड्ढे में ही पौधा लगा दिया गया।
हमारे यहां यही खूबसूरती है… कहीं गड्ढे पर रेड कार्पेट बिछता है, तो कहीं गड्ढे में पौधा उगाया जाता है!#Noida… pic.twitter.com/odlcZRA2a4
— PRIYA RANA (@priyarana3101) September 15, 2026
गड्ढे की गहराई से ज्यादा चर्चा पौधे की ऊंचाई की!
इस पूरी घटना में सबसे दिलचस्प बात यह है कि अब चर्चा इस बात की हो रही है कि गड्ढा कितना गहरा है, यह पूछने के बजाय उसमें लगाया गया पौधा कौन-सा है।
शहर में अगर सड़क टूटे तो जनता का सवाल होना चाहिए—
“सड़क कब ठीक होगी?”
लेकिन अगर व्यवस्था का जवाब हो—
“देखिए, हमने पौधा लगा दिया है।”
तो फिर नागरिक भी पूछ सकता है—
“सड़क कहां है?”
पौधा पर्यावरण के लिए शुभ है। हरियाली जरूरी है। लेकिन पौधे की जगह भी तो तय होनी चाहिए।
सड़क के गड्ढे में पौधा लगाकर यदि व्यवस्था यह संदेश दे रही है कि समस्या पर कार्रवाई हो रही है, तो यह कार्रवाई की परिभाषा पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
‘स्मार्ट सिटी’ में स्मार्ट गड्ढा प्रबंधन!
नोएडा को आधुनिक शहर कहा जाता है।
यहां बड़े-बड़े प्रोजेक्ट हैं। ऊंची इमारतें हैं। चौड़ी सड़कें हैं। एलिवेटेड रोड हैं। एक्सप्रेसवे हैं। स्मार्ट ट्रैफिक की योजनाएं हैं।
ऐसे में शहर के विकास का अगला अध्याय शायद यह है—
‘स्मार्ट पॉटहोल मैनेजमेंट।’
गड्ढा दिखाई दिया तो उसे तुरंत स्मार्ट तरीके से बेरिकेड कर दिया जाएगा।
फिर उसमें पौधा लगाया जाएगा।
फिर नागरिकों को बताया जाएगा कि पर्यावरण संरक्षण भी हो रहा है।
अगर इस मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेश किया जाए तो शायद दुनिया भी पूछे—
“सड़क के गड्ढे की ऐसी खूबसूरत देखभाल कहां होती है?”
नोएडा कह सकता है—
“हमारे यहां।”
सड़क की हालत पूछने पर हरियाली दिखा दी जाएगी?
व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन मामला गंभीर भी है।
एलिवेटेड रोड पर गहरा गड्ढा क्यों बना?
क्या सड़क की गुणवत्ता की जांच हुई?
क्या इसके नीचे कोई तकनीकी समस्या है?
क्या पानी के रिसाव या जल निकासी की वजह से सड़क प्रभावित हुई?
क्या नियमित निरीक्षण हो रहा था?
क्या जिम्मेदारी तय की जाएगी?
इन सवालों का जवाब पौधा नहीं दे सकता।
इनका जवाब संबंधित विभाग को देना होगा।
सार्वजनिक धन से बनी सड़क पर खराबी आती है तो सिर्फ गड्ढा भरना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। यह भी पता लगना चाहिए कि खराबी आई क्यों और दोबारा न आए इसके लिए क्या किया गया।
वरना कुछ दिन बाद पौधा तो बढ़ता रहेगा और सड़क का गड्ढा भी अपना आकार बढ़ाता रहेगा।
फिर एक दिन स्थिति यह हो सकती है कि पौधा छोटा पड़ जाए और गड्ढा बड़ा।
गड्ढे में पौधा, लेकिन जनता के सवालों पर बेरिकेड क्यों?
नोएडा के नागरिकों का सवाल सीधा है।
अगर प्राधिकरण इतनी तेजी से गड्ढे तक पहुंच सकता है कि वहां बेरिकेड और पौधा लगाया जा सकता है, तो फिर उसी तेजी से गड्ढे की मरम्मत क्यों नहीं हो सकती?
अगर सड़क की समस्या दिखाई दे गई, तो उसका समाधान भी दिखाई देना चाहिए।
नागरिकों को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें शिकायत के बाद सिर्फ बेरिकेड न लगे, बल्कि कुछ समय बाद वहां ठीक सड़क भी दिखाई दे।
हाईटेक सिटी नोएडा में सड़क धंसी, एलिवेटेड रोड पर बड़ा गड्ढा! 🚨
सेक्टर-61 से सेक्टर-18 को जोड़ने वाली एलिवेटेड रोड पर गहरे गड्ढे ने खोली प्राधिकरण की ‘हाईटेक’ कार्यशैली की पोल।
गनीमत रही कि कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ। गड्ढे के चारों ओर बैरिकेडिंग कर पौधा लगा दिया गया।
कहीं गड्ढे… pic.twitter.com/hjj2T4RUy0
— PRIYA RANA (@priyarana3101) September 15, 2026
अब ‘पौधा’ नहीं, सड़क चाहिए
पर्यावरण के नाम पर पौधा लगाना अच्छी बात है।
लेकिन एलिवेटेड रोड पर वाहन चालकों को हरियाली से पहले सुरक्षा चाहिए।
उन्हें गड्ढे के चारों ओर बेरिकेड से ज्यादा भरोसा उस सड़क पर चाहिए, जिस पर कोई गड्ढा ही न हो।
नोएडा के विकास का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि खराब सड़क को खूबसूरत तरीके से घेर दिया जाए।
विकास का अर्थ है—सड़क सुरक्षित हो, उसकी गुणवत्ता बनी रहे और खराबी आने पर तत्काल तथा स्थायी समाधान हो।
गड्ढे में पौधा लगाना पर्यावरण के लिए प्रतीक हो सकता है, लेकिन सड़क की मरम्मत का प्रमाण नहीं।
व्यंग्य का आखिरी सवाल: अगला गड्ढा किस चीज से सजेगा?
अब शहर के लोग मजाक में पूछ सकते हैं—
अगर अगली बार एलिवेटेड रोड पर बड़ा गड्ढा मिला तो क्या वहां फूलों की क्यारी बनेगी?
और उससे भी बड़ा गड्ढा हुआ तो क्या उसमें फव्वारा लगाया जाएगा?
क्या सड़क की मरम्मत की जगह सेल्फी प्वाइंट बनाया जाएगा?
और अगर गड्ढा बहुत बड़ा हुआ तो क्या उसके उद्घाटन के लिए कोई कार्यक्रम भी रखा जाएगा?
सवाल मजाकिया हैं, लेकिन मुद्दा गंभीर है।
गड्ढे को पौधे से सजाया जा सकता है, खत्म नहीं किया जा सकता।
बेरिकेड लगाकर खतरा कुछ समय के लिए कम किया जा सकता है, लेकिन सड़क को सुरक्षित बनाने के लिए उसकी मरम्मत करनी ही होगी।
नोएडा को हरियाली भी चाहिए, विकास भी चाहिए और खूबसूरत सड़कें भी।
लेकिन सबसे पहले चाहिए—सड़क।
क्योंकि अगर सड़क ही गड्ढे में बदलती चली गई तो आने वाले समय में नोएडा की पहचान एलिवेटेड रोड से कम और उसके गड्ढों की ‘रचनात्मक सजावट’ से ज्यादा होने लगेगी।
फिलहाल तस्वीर साफ है—सड़क पर गड्ढा है, गड्ढे में पौधा है, चारों ओर बेरिकेड है और जनता के हाथ में वही पुराना सवाल—














