“घाटकोपर के विधायक पराग शाह ने बदला हुलिया, आम आदमी की जिंदगी को करीब से समझने के लिए बिताया पूरा दिन—किसी ने नहीं पहचाना, किसी ने दया दिखाई तो किसी ने मुंह फेर लिया”
मुंबई: फिल्म नायक में अनिल कपूर एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनते हैं। कुर्सी संभालते ही उन्हें सत्ता के गलियारों से निकलकर उस दुनिया का सामना करना पड़ता है, जहां आम आदमी रोजाना अपनी परेशानियों से जूझता है। सड़क, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और व्यवस्था की खामियां उनके सामने धीरे-धीरे खुलती जाती हैं। वह तो थी रील लाइफ में एक दिन के मुख्यमंत्री की कहानी।
लेकिन क्या आपने कभी किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सुना है, जो करोड़ों की संपत्ति का मालिक हो, विधायक हो और फिर एक दिन के लिए भिखारी बनकर सड़क पर उतर जाए? वह भी किसी फिल्म की कहानी में नहीं, बल्कि असल जिंदगी में।
महाराष्ट्र के घाटकोपर से भाजपा विधायक पराग शाह का एक वीडियो इन दिनों इसी वजह से चर्चा में है। देश के सबसे अमीर विधायकों में गिने जाने वाले पराग शाह ने अपना हुलिया बदला और घाटकोपर की सड़कों पर एक आम भिखारी की तरह पूरा दिन बिताया। वह लोगों के सामने मदद मांगते नजर आए और सड़क पर झाड़ू भी लगाई। खास बात यह रही कि उनके आसपास से गुजरने वाले अधिकांश लोग यह पहचान ही नहीं पाए कि जिस शख्स को वे भिखारी समझ रहे हैं, वह उनके इलाके का विधायक है।
करोड़ों की संपत्ति, लेकिन सड़क पर एक भिखारी की जिंदगी
पराग शाह की पहचान किसी सामान्य राजनेता की नहीं है। घाटकोपर से विधायक पराग शाह को देश के सबसे संपन्न विधायकों में गिना जाता है। उनकी संपत्ति हजारों करोड़ रुपये बताई जाती है। ऐसे में उनके लिए सड़क किनारे बैठकर लोगों से मदद मांगना अपने आप में असाधारण दृश्य था।
लेकिन इस पूरे प्रयोग का मकसद पैसा या लोकप्रियता हासिल करना नहीं बताया गया। यह उनके गुरु के निर्देश पर किया गया एक ऐसा अनुभव था, जिसमें वह कुछ समय के लिए अपनी राजनीतिक पहचान और सामाजिक हैसियत से बाहर निकलकर आम आदमी की नजर से दुनिया को देखना चाहते थे।
उन्होंने सामान्य कपड़े पहने, अपना रूप बदला और इस तरह खुद को तैयार किया कि सामने वाला उन्हें विधायक के तौर पर पहचान न सके। इसके बाद वह घाटकोपर की व्यस्त सड़कों पर निकल पड़े।
जहां आम दिनों में लोग उन्हें विधायक के रूप में देखते हैं, उसी इलाके में उस दिन वह एक ऐसे व्यक्ति के रूप में बैठे थे, जिसे लोग या तो नजरअंदाज कर रहे थे या फिर अपनी क्षमता के अनुसार कुछ मदद दे रहे थे।
किसी ने पैसे दिए, किसी ने नजरें फेर लीं
इस प्रयोग का सबसे अहम हिस्सा शायद यही था कि सड़क पर बैठे व्यक्ति के सामने समाज का वह चेहरा आया, जिसे हम रोज देखते तो हैं, लेकिन अक्सर उसके पीछे की कहानी को समझने की कोशिश नहीं करते।
कुछ लोगों ने उनकी ओर देखा और मदद की। कुछ ने आगे बढ़कर पैसे दिए। वहीं कुछ लोग बिना ध्यान दिए निकल गए। कुछ की प्रतिक्रिया उदासीन रही। यही वह अनुभव था, जिसे पराग शाह शायद अपनी सामान्य राजनीतिक भूमिका में रहते हुए कभी उस तरह महसूस नहीं कर सकते थे।
एक विधायक के रूप में उनके सामने आने वाला व्यक्ति अपनी समस्या लेकर आता है। लेकिन भिखारी के रूप में सड़क पर बैठने के बाद उन्हें यह देखने का मौका मिला कि जब कोई व्यक्ति मदद मांगता है तो सामने वाला उसे किस नजर से देखता है।
किसी के लिए वह जरूरतमंद था, किसी के लिए सड़क का एक अनजान चेहरा और किसी के लिए शायद ऐसा व्यक्ति, जिसकी ओर देखने की भी जरूरत नहीं।
जब विधायक ने सड़क पर उठाई झाड़ू
पराग शाह के इस प्रयोग का एक और पहलू भी सामने आया। वीडियो में वह सड़क पर झाड़ू लगाते हुए दिखाई देते हैं।
राजनीति में अक्सर जनप्रतिनिधियों के लिए जनता के बीच जाना एक कार्यक्रम होता है। कैमरे होते हैं, समर्थक होते हैं और आसपास पार्टी कार्यकर्ता दिखाई देते हैं। लेकिन यहां तस्वीर बिल्कुल अलग थी।
न कोई राजनीतिक मंच था, न भाषण और न ही विधायक के स्वागत के लिए भीड़।
वह एक आम व्यक्ति की तरह सड़क पर थे और वही काम कर रहे थे, जिन्हें समाज अक्सर नजरअंदाज कर देता है। सड़क पर झाड़ू लगाने और लोगों के बीच भिखारी के रूप में रहने के दौरान उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र को एक अलग नजरिए से देखने का अवसर मिला।
जिसे लोग विधायक नहीं, भिखारी समझ रहे थे
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यही था कि पराग शाह को किसी ने उनके राजनीतिक पद से नहीं पहचाना।
घाटकोपर में उनके समर्थक हैं, मतदाता हैं और रोज उनसे मिलने वाले लोग भी हैं। लेकिन जब उन्होंने अपना हुलिया बदल लिया तो उनकी पहचान भी बदल गई।
यही प्रयोग का असली अर्थ था।
आमतौर पर किसी व्यक्ति के प्रति हमारा व्यवहार उसकी पहचान, कपड़े, सामाजिक स्थिति और आर्थिक हैसियत से प्रभावित होता है। जब सामने वाला व्यक्ति महंगे कपड़े पहने, प्रभावशाली दिखाई दे या उसके साथ सुरक्षा और समर्थकों का घेरा हो तो लोग उसे अलग नजर से देखते हैं। लेकिन वही व्यक्ति साधारण कपड़ों में सड़क पर बैठ जाए तो उसके प्रति समाज का व्यवहार भी बदल सकता है।
पराग शाह ने इसी फर्क को खुद महसूस करने की कोशिश की।
गुरु के आदेश पर लिया कठिन अनुभव
बताया गया है कि यह प्रयोग उनके गुरु के निर्देश पर किया गया। इसे महज राजनीतिक स्टंट के तौर पर देखने के बजाय आध्यात्मिक और सामाजिक अनुभव के रूप में पेश किया गया है।
एक ऐसा व्यक्ति, जिसके पास जीवन में सुविधाओं की कमी नहीं है, अगर जानबूझकर खुद को ऐसी स्थिति में रखता है जहां उसे लोगों से मदद मांगनी पड़े, तो वह अनुभव निश्चित रूप से सामान्य राजनीतिक जीवन से बिल्कुल अलग होगा।
यह अनुभव केवल भीख मांगने तक सीमित नहीं था। इसके जरिए उन्होंने लोगों के व्यवहार को महसूस किया—दया, उपेक्षा, मदद, असहजता और उदासीनता।
सड़क पर बैठे किसी जरूरतमंद के लिए कुछ रुपये केवल रुपये नहीं होते। कई बार वही उसके लिए भोजन का साधन बनते हैं। वहीं कई बार उसे लगातार ऐसे लोगों के बीच रहना पड़ता है, जो उसकी तरफ देखते तक नहीं।
एक दिन ने दिखाया समाज का आईना
पराग शाह के इस प्रयोग की सबसे बड़ी सीख शायद यही है कि किसी समस्या को फाइल में पढ़ना और उसे खुद महसूस करना दो अलग-अलग बातें हैं।
एक जनप्रतिनिधि के रूप में वह गरीबी, बेरोजगारी, सड़क किनारे रहने वाले लोगों और जरूरतमंदों से जुड़ी समस्याओं के बारे में सुनते होंगे। लेकिन जब वह खुद उसी स्थिति में सड़क पर बैठे, तब उन समस्याओं का मानवीय पक्ष उनके सामने आया।
किसी व्यक्ति के पास पैसा क्यों नहीं है? वह सड़क पर क्यों बैठा है? लोग उसकी मदद क्यों करते हैं या क्यों नहीं करते? समाज उसे किस नजर से देखता है? इन सवालों के जवाब आंकड़ों में मिल सकते हैं, लेकिन उनका वास्तविक अनुभव अलग होता है।
घाटकोपर चे कोट्याधीश आमदार पराग शहा जेव्हा वेषांतर करून घाटकोपर च्या रस्त्यावर भिकारी बनून फिरतात…!!!
आपल्या गुरूने दिलेली आज्ञा पाळून पाच हजार कोटी चे मालक असलेले आमदार पराग शहा यांनी एक दिवस त्यांच्या मतदार संघ घाटकोपर पूर्व मध्ये भिकारी बनून दिवस काढला..!!
तेव्हा काय घडले पहा pic.twitter.com/eEXw9I1joo— Siyadivinelybeautyful 🇮🇳 (@Siya83377032) September 13, 2026
रील लाइफ के एक दिन के सीएम से रीयल लाइफ के एक दिन के भिखारी तक
नायक की कहानी में एक दिन का मुख्यमंत्री व्यवस्था बदलने निकलता है। यहां एक दिन का भिखारी बनकर एक विधायक व्यवस्था से ज्यादा समाज को समझने की कोशिश करता दिखाई देता है।
दोनों कहानियों में फर्क जरूर है, लेकिन एक समानता भी है—अपनी सामान्य भूमिका से बाहर निकलकर उस दुनिया को देखना, जिसे आम तौर पर दूर से देखा जाता है।
पराग शाह के लिए यह सिर्फ एक दिन था। अगले दिन वह फिर अपने सामान्य जीवन और राजनीतिक भूमिका में लौट आए। लेकिन जिस सड़क पर वह बैठे, जिन लोगों ने उन्हें देखा, जिन्होंने उन्हें कुछ दिया और जिन्होंने बिना देखे आगे बढ़ गए—उन सबके व्यवहार ने शायद उन्हें एक ऐसा अनुभव दिया, जिसे किसी रिपोर्ट या बैठक में महसूस करना संभव नहीं।
सवाल सिर्फ पराग शाह के प्रयोग का नहीं
इस घटना को सिर्फ एक विधायक के अनोखे प्रयोग के तौर पर देखकर आगे बढ़ जाना आसान है। लेकिन इसके भीतर समाज के लिए भी एक बड़ा सवाल छिपा है।
सड़क पर भीख मांगने वाला हर व्यक्ति कौन है? क्या वह वास्तव में मजबूर है? क्या वह बीमारी, बेरोजगारी या किसी सामाजिक परिस्थिति का शिकार है? क्या हम उसकी मदद करते हैं या केवल कुछ सिक्के देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या हम किसी इंसान की आर्थिक स्थिति देखकर उसके प्रति अपना व्यवहार तय करते हैं?
पराग शाह का एक दिन इन सवालों का अंतिम जवाब नहीं देता, लेकिन यह जरूर है कि इस प्रयोग ने उन सवालों को सामने ला दिया है।
घाटकोपर की उन्हीं सड़कों पर, जहां लोग उन्हें विधायक के रूप में जानते हैं, एक दिन उन्होंने अपनी पहचान छिपाकर लोगों को करीब से देखने की कोशिश की। किसी ने मदद की, किसी ने नजरअंदाज किया और किसी ने शायद यह सोचकर आगे कदम बढ़ा दिया कि सामने बैठा व्यक्ति उसकी जिम्मेदारी नहीं है।
अगले दिन विधायक फिर विधायक थे, लेकिन वह एक दिन उन्हें उस दुनिया के करीब ले गया, जिसे हम रोज अपनी आंखों के सामने देखते हैं और फिर भी अक्सर अनदेखा कर देते हैं।
शायद इस पूरे प्रयोग का सबसे बड़ा संदेश यही है—किसी की हालत को समझने के लिए कभी-कभी उसके सामने खड़े होने से ज्यादा जरूरी होता है, कुछ देर उसके स्थान पर बैठकर दुनिया को देखना।














