Saturday, October 3, 2026
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यूपी कांग्रेस में बड़ा फेरबदल, राजभर ने खोला सियासी मोåçर्चा

“आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष, इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी; ओपी राजभर बोले—कांग्रेस और सपा मुस्लिम चेहरे को घोषित करें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार”

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने अपने संगठन की तस्वीर बदल दी है। कांग्रेस हाईकमान ने आराधना मिश्रा ‘मोना’ को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नया अध्यक्ष नियुक्त किया है, जबकि सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद को प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। अजय राय की जगह आराधना मिश्रा की नियुक्ति और इमरान मसूद को संगठन में अहम जिम्मेदारी दिए जाने के बाद अब यूपी की राजनीति में इस बदलाव के राजनीतिक संदेश और उसके संभावित असर को लेकर बहस तेज हो गई है।

कांग्रेस के इस फेरबदल के बीच योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने ऐसा बयान दिया है, जिसने नई नियुक्तियों पर सियासी बहस को और तेज कर दिया है। शनिवार, 3 अक्टूबर को मीडिया से बातचीत में राजभर ने कहा कि आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष और इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। इसके साथ ही उन्होंने कांग्रेस को सलाह दी कि यदि पार्टी वास्तव में मुस्लिम समुदाय के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहती है तो उसे किसी मुस्लिम नेता को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करना चाहिए।

राजभर ने अपनी यही सलाह समाजवादी पार्टी के लिए भी दोहराई। उनका कहना था कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों को मुस्लिम समुदाय से पर्याप्त समर्थन मिला है और यदि दोनों पार्टियां मुस्लिम समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने का दावा करती हैं तो उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए मुस्लिम चेहरे को सामने लाने पर विचार करना चाहिए। यह राजभर का राजनीतिक बयान है; कांग्रेस या समाजवादी पार्टी की ओर से ऐसी किसी घोषणा का उल्लेख उनके इस बयान में नहीं है।

कांग्रेस का नया संगठन, चुनावी संदेश पर निगाह

कांग्रेस का ताजा संगठनात्मक बदलाव ऐसे समय हुआ है जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो रही हैं। आराधना मिश्रा ‘मोना’ प्रतापगढ़ की रामपुर खास सीट से तीन बार की विधायक हैं और उत्तर प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल की नेता रही हैं। उनके पिता कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी हैं। दूसरी ओर, इमरान मसूद सहारनपुर से लोकसभा सांसद हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक प्रमुख मुस्लिम चेहरा माने जाते हैं।

कांग्रेस ने इसी फेरबदल में देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी भी दी है। पार्टी के नए संगठन में अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश दिखाई देती है। कई राजनीतिक विश्लेषणों ने इसे ब्राह्मण, मुस्लिम, OBC और दलित प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा है। हालांकि इस बदलाव का वास्तविक चुनावी असर क्या होगा, इसका आकलन अभी भविष्य के चुनावी घटनाक्रम पर निर्भर करेगा।

यही वह बिंदु है जहां ओपी राजभर का बयान कांग्रेस के सामने एक सीधा राजनीतिक सवाल खड़ा करता है—क्या संगठन में प्रतिनिधित्व बढ़ाना और मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करना एक ही बात है?

राजभर ने अपने बयान में संगठनात्मक नियुक्तियों को पर्याप्त नहीं माना और मुख्यमंत्री पद के चेहरे का मुद्दा सामने रख दिया। उनकी टिप्पणी का राजनीतिक अर्थ यही है कि केवल किसी समुदाय के नेता को संगठन में महत्वपूर्ण पद देना और उस समुदाय को सत्ता के सर्वोच्च पद का आश्वासन देना दो अलग-अलग राजनीतिक संदेश हैं।

इमरान मसूद की नियुक्ति और पश्चिमी यूपी पर नजर

इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा है। सहारनपुर से सांसद मसूद की पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक मौजूदगी है। कांग्रेस की नई टीम में उनकी भूमिका ऐसे समय बढ़ाई गई है जब पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए संगठन को नए सिरे से तैयार कर रही है।

इसी वजह से राजभर का बयान सीधे इमरान मसूद की नियुक्ति के बाद आया है। उन्होंने नियुक्ति को कांग्रेस की ओर से बड़ा राजनीतिक परिवर्तन मानने के बजाय मुख्यमंत्री पद के चेहरे पर सवाल खड़ा किया। उनका संदेश कांग्रेस के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के लिए भी था।

राजभर ने कहा कि दोनों दलों को मुस्लिम समुदाय से काफी वोट मिले हैं और इसलिए उन्हें मुस्लिम नेता को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की सलाह दी जानी चाहिए। यह बयान फिलहाल राजभर की राजनीतिक राय और चुनौती के तौर पर देखा जाना चाहिए। कांग्रेस और सपा की मौजूदा आधिकारिक नेतृत्व व्यवस्था इससे अलग है।

क्या सिर्फ संगठन बदलने से बदलेगा यूपी का सियासी समीकरण?

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राजनीतिक राज्य में किसी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का बदलाव केवल संगठनात्मक फैसला नहीं माना जाता। चुनावी राजनीति में प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका संगठन, कार्यकर्ताओं, उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया, गठबंधन सहयोगियों के साथ तालमेल और चुनावी अभियान के संचालन से जुड़ती है।

कांग्रेस ने अजय राय की जगह आराधना मिश्रा ‘मोना’ को जिम्मेदारी देकर अपने प्रदेश संगठन में बदलाव किया है। वहीं इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर पश्चिमी यूपी के एक प्रमुख चेहरे को संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है।

लेकिन इस बदलाव के साथ कांग्रेस के सामने चुनौती भी कम नहीं है। उसे संगठनात्मक नियुक्तियों को जमीन पर सक्रिय कार्यकर्ता नेटवर्क, बूथ स्तर की तैयारी और मतदाताओं तक प्रभावी राजनीतिक संदेश में बदलना होगा। सिर्फ पदों के फेरबदल से चुनावी राजनीति की दिशा अपने आप तय नहीं होती।

इसी बिंदु पर राजभर की टिप्पणी को कांग्रेस के लिए राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा सकता है—हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि इस संगठनात्मक बदलाव का 2027 के चुनाव में क्या परिणाम निकलेगा।

राजभर ने सपा को भी क्यों घेरा?

ओपी राजभर ने कांग्रेस के साथ-साथ समाजवादी पार्टी को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि सपा को भी किसी मुस्लिम चेहरे को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना चाहिए।

यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर प्रदेश की विपक्षी राजनीति में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक सहयोग और सीटों को लेकर चर्चा लगातार होती रही है। कांग्रेस के नए संगठनात्मक बदलाव के बाद दोनों दलों के बीच सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक हिस्सेदारी का सवाल भी चर्चा में है।

कांग्रेस की नई टीम में आराधना मिश्रा ‘मोना’ के साथ इमरान मसूद, देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद को महत्वपूर्ण भूमिकाएं दी गई हैं। इस संरचना को कई रिपोर्टों ने व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व की कोशिश के रूप में देखा है।

राजभर इसी राजनीतिक समीकरण को मुख्यमंत्री पद के सवाल से जोड़ रहे हैं। हालांकि, किसी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष या कार्यकारी अध्यक्ष बनना अपने आप में मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी का संकेत नहीं होता।

महिला आरक्षण पर भी राजभर का हमला

ओपी राजभर ने आराधना मिश्रा को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपे जाने को महिला नेतृत्व से जोड़ते हुए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर महिला आरक्षण के मुद्दे को लेकर भी निशाना साधा।

राजभर ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने महिला आरक्षण विधेयक का विरोध किया था और सवाल उठाया कि ऐसी स्थिति में दोनों पार्टियां महिलाओं के बीच जाकर किस आधार पर वोट मांगेंगी। उन्होंने कहा कि महिलाएं अब राजनीतिक मुद्दों को लेकर जागरूक हैं और वे पार्टियों से सवाल कर सकती हैं कि महिला आरक्षण के समय उनका रुख क्या था।

हालांकि यहां राजनीतिक बयान और संसदीय रिकॉर्ड के बीच अंतर स्पष्ट करना जरूरी है। 2023 में पारित संविधान (106वां संशोधन) यानी नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लोकसभा और राज्यसभा दोनों ने पारित किया था। समाजवादी पार्टी ने उस समय विधेयक के मौजूदा स्वरूप पर आपत्ति जताई थी और OBC तथा अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए प्रतिनिधित्व की मांग की थी, लेकिन अंततः लोकसभा में विधेयक के पक्ष में मतदान किया।

कांग्रेस की ओर से भी विधेयक का समर्थन सार्वजनिक रूप से दर्ज है। कांग्रेस के तत्कालीन लोकसभा भाषण में राहुल गांधी ने 20 सितंबर 2023 को महिला आरक्षण विधेयक के समर्थन की बात कही थी।

इसलिए राजभर के आरोप को राजनीतिक बयान के रूप में प्रस्तुत करना अधिक सटीक है; यह कहना कि कांग्रेस ने महिला आरक्षण विधेयक का सीधा विरोध किया था, उपलब्ध संसदीय रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता।

असली सवाल—चेहरा, संगठन या सामाजिक समीकरण?

उत्तर प्रदेश कांग्रेस में हुए ताजा फेरबदल ने तीन बड़े सवाल सामने ला दिए हैं।

पहला—क्या आराधना मिश्रा ‘मोना’ के नेतृत्व में कांग्रेस अपने संगठन को विधानसभा चुनाव के लिए सक्रिय और मजबूत कर पाएगी?

दूसरा—क्या इमरान मसूद की नई जिम्मेदारी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की राजनीतिक पहुंच को मजबूत करने में मदद करेगी?

और तीसरा—क्या कांग्रेस और उसके संभावित सहयोगी दल मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर चुनाव से पहले कोई स्पष्ट राजनीतिक रणनीति सामने रखेंगे?

इन सवालों के जवाब फिलहाल भविष्य के राजनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर हैं।

एक तरफ कांग्रेस ने संगठन में बदलाव करके सामाजिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का संदेश देने की कोशिश की है। दूसरी तरफ ओपी राजभर ने इसी बदलाव को आधार बनाकर कांग्रेस और सपा के सामने मुख्यमंत्री पद के चेहरे का सवाल रख दिया है।

यानी उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में अब बहस सिर्फ इस बात पर नहीं है कि किसे प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, बल्कि इस पर भी है कि चुनावी मैदान में कौन-सा राजनीतिक चेहरा किस सामाजिक समूह को क्या प्रतिनिधित्व देने का दावा करेगा।

आराधना मिश्रा ‘मोना’ की ताजपोशी और इमरान मसूद की नई जिम्मेदारी के बाद कांग्रेस ने अपना संगठन जरूर बदल दिया है, लेकिन इस बदलाव को मतदाताओं के बीच किस तरह का राजनीतिक संदेश मिलता है, यह आने वाले महीनों में ही स्पष्ट होगा।

फिलहाल इतना जरूर है कि कांग्रेस के संगठनात्मक फेरबदल ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है—और इस बहस में ओपी राजभर ने मुख्यमंत्री पद के चेहरे का सवाल जोड़कर सियासी तापमान बढ़ा दिया है।

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VIKAS TRIPATHI भारत देश की सभी छोटी और बड़ी खबरों को सामने दिखाने के लिए "पर्दाफास न्यूज" चैनल को लेके आए हैं। जिसके लोगो के बीच में करप्शन को कम कर सके। हम देश में समान व्यवहार के साथ काम करेंगे। देश की प्रगति को बढ़ाएंगे।
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