“डिजिटल अरेस्ट से फर्जी पुलिस कॉल तक—साइबर अपराधियों के हर हथकंडे पर पुलिस ने दी सीधी चेतावनी, 1930 और cybercrime.gov.in को बताया तत्काल सुरक्षा कवच”
नोएडा।
मोबाइल की स्क्रीन पर आने वाली एक कॉल, व्हाट्सऐप पर भेजा गया एक लिंक, सोशल मीडिया पर मिला एक संदेश या फिर पैसे भेजने के लिए दिखाया गया एक क्यूआर कोड—डिजिटल दुनिया में यही छोटी-सी चूक किसी परिवार की वर्षों की कमाई पर भारी पड़ सकती है। साइबर अपराध का चेहरा अब किसी सुनसान सड़क पर खड़े अपराधी जैसा नहीं रहा। अपराधी घर बैठे हैं, उनकी पहुंच मोबाइल तक है और निशाना सीधे आपकी जेब, आपकी पहचान और आपकी निजी जानकारी पर है।
इसी बढ़ते खतरे के बीच उत्तर प्रदेश पुलिस के “साइबर जागरूकता माह” के तहत नोएडा के सेक्टर-105 में साइबर अपराध के खिलाफ एक महत्वपूर्ण जनजागरूकता अभियान चलाया गया। सेक्टर-105 की आरडब्ल्यूए द्वारा सामुदायिक केंद्र में आयोजित विशेष साइबर जागरूकता कार्यशाला में पुलिस अधिकारियों और साइबर विशेषज्ञों ने स्थानीय निवासियों को उन तरीकों से अवगत कराया, जिनका इस्तेमाल साइबर ठगी के मामलों में किया जा सकता है।
कार्यक्रम का संदेश साफ था—साइबर अपराधियों से मुकाबला केवल तकनीक से नहीं, बल्कि जागरूकता से भी किया जा सकता है।
‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर—ठगी का सबसे खतरनाक हथियार?
कार्यशाला में साइबर अपराध के उन तरीकों पर विशेष चर्चा हुई, जिनमें कथित तौर पर पीड़ितों को डर, दबाव और भ्रम की स्थिति में लाकर उनसे आर्थिक लेनदेन कराने का प्रयास किया जाता है।
इनमें सबसे चर्चित तरीका है “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर डर पैदा करना। अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, कस्टम, अदालत या किसी अन्य सरकारी एजेंसी से जुड़ा बताकर व्यक्ति को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर सकते हैं कि वह किसी गंभीर कानूनी मामले में फंस गया है।
इसके बाद वीडियो कॉल, पूछताछ, गिरफ्तारी का भय और खाते की जांच जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर कथित तौर पर व्यक्ति पर मानसिक दबाव बनाया जाता है।
पुलिस की ओर से नागरिकों को स्पष्ट संदेश दिया गया कि किसी फोन कॉल पर डरकर अपनी बैंकिंग जानकारी, ओटीपी, पासवर्ड या धनराशि साझा करना बेहद जोखिमपूर्ण हो सकता है।
फर्जी पुलिस और CBI कॉल—वर्दी की आड़ में डिजिटल जाल
साइबर ठगी का एक बड़ा हथियार सरकारी संस्थाओं का नाम और प्रतिष्ठा भी बनता जा रहा है। कार्यशाला में निवासियों को कथित फर्जी पुलिस, सीबीआई या अन्य सरकारी अधिकारियों के नाम से आने वाली कॉल्स के प्रति सावधान किया गया।
साइबर अपराधी जब किसी व्यक्ति से बात करते हैं तो वे बातचीत को इतना विश्वसनीय बनाने की कोशिश कर सकते हैं कि सामने वाला कुछ समय के लिए यह भूल जाए कि फोन के दूसरी तरफ वास्तव में कौन है।
यही वह बिंदु है जहां जागरूकता सबसे बड़ा बचाव बनती है।
सरकारी संस्था का नाम सुनते ही घबराना नहीं, बल्कि सूचना की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना जरूरी है।
QR कोड दिखा तो आंख बंद कर भरोसा मत कीजिए
क्यूआर कोड को आम तौर पर भुगतान का आसान माध्यम माना जाता है। लेकिन यही सुविधा साइबर अपराधियों के लिए भी धोखाधड़ी का माध्यम बन सकती है।
कार्यशाला में नागरिकों को समझाया गया कि पैसे प्राप्त करने के नाम पर किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा भेजे गए क्यूआर कोड को स्कैन करना या संदिग्ध भुगतान अनुरोध स्वीकार करना जोखिम पैदा कर सकता है।
साइबर सुरक्षा का मूल मंत्र यही है कि कोई भी भुगतान करने से पहले सामने वाले व्यक्ति, खाते और लेनदेन के उद्देश्य की पुष्टि की जाए।
UPI की सुविधा के साथ सावधानी भी जरूरी
UPI ने भुगतान को बेहद आसान बना दिया है, लेकिन डिजिटल सुविधा के साथ जोखिमों को समझना भी उतना ही आवश्यक है।
कार्यशाला में साइबर टीम ने निवासियों को UPI से जुड़े संभावित फ्रॉड के प्रति सतर्क किया। खास तौर पर इस बात पर जोर दिया गया कि UPI PIN पैसे प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि भुगतान को अधिकृत करने के लिए इस्तेमाल होता है।
यानी अगर कोई व्यक्ति पैसे भेजने या वापस करने के नाम पर आपसे PIN डालने को कह रहा है, तो पहले रुकिए, सोचिए और पूरी प्रक्रिया को समझिए।
सोशल मीडिया: दोस्ती के पीछे डेटा का जाल?
आज सोशल मीडिया सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा। लोगों की व्यक्तिगत जानकारी, तस्वीरें, संपर्क, स्थान, पारिवारिक जानकारी और जीवनशैली से जुड़े कई संकेत यहां उपलब्ध हो सकते हैं।
कार्यशाला में नागरिकों को सोशल मीडिया पर निजी जानकारी साझा करने में सावधानी बरतने की सलाह दी गई।
विशेषज्ञों ने संकेत दिया कि साइबर अपराधी उपलब्ध डिजिटल जानकारी का इस्तेमाल व्यक्ति को अधिक विश्वसनीय तरीके से निशाना बनाने के लिए कर सकते हैं।
ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं कि “आप ऑनलाइन क्या पोस्ट कर रहे हैं?” बल्कि यह भी है कि “आपके बारे में ऑनलाइन कितना कुछ उपलब्ध है?”
बच्चे और बुजुर्ग सबसे आसान निशाना बन सकते हैं
कार्यक्रम में बच्चों और बुजुर्गों की डिजिटल सुरक्षा पर विशेष जोर दिया गया।
बुजुर्गों के पास अक्सर वर्षों की बचत होती है, जबकि डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन बैंकिंग की तकनीकी बारीकियों से वे हमेशा परिचित हों, यह जरूरी नहीं। दूसरी ओर बच्चे और युवा सोशल मीडिया, गेमिंग, ऑनलाइन चैट और डिजिटल प्लेटफॉर्म का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं।
ऐसे में परिवार की डिजिटल सुरक्षा केवल बैंक खाते की सुरक्षा तक सीमित नहीं रह सकती।
घर में साइबर सुरक्षा पर बातचीत उतनी ही जरूरी है जितनी सड़क पर यातायात सुरक्षा पर।
.@CP_Noida के निर्देशन में साइबर सेल #NoidaPolice टीम द्वारा विभिन्न कार्यस्थलो पर साइबर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित पुरूष/महिला कंपनी कर्मचारियों को वर्तमान में प्रचलित साइबर अपराधों एवं ऑनलाइन धोखाधड़ी के विभिन्न तरीकों, उनसे बचाव के प्रभावी उपायों, साइबर वर्ल्ड में सुरक्षित व्यवहार, सोशल मीडिया के जिम्मेदार एवं सुरक्षित उपयोग तथा साइबर हेल्पलाइन 1930 एवं राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के संबंध में विस्तृत जानकारी प्रदान कर जागरूक किया गया।
सतर्क रहें, सुरक्षित रहें — आपकी जागरूकता ही साइबर अपराधों से सबसे प्रभावी सुरक्षा है।
#NoidaPolice
#CyberSecurity
#CyberSafe
#CyberAwareness— POLICE COMMISSIONERATE GAUTAM BUDDH NAGAR (@noidapolice) October 4, 2026
पुलिस और RWA की साझेदारी बनी अहम कड़ी
यह कार्यक्रम केवल एक औपचारिक जागरूकता बैठक तक सीमित नहीं रहा। इसका उद्देश्य सेक्टर के निवासियों को साइबर अपराध के बदलते तरीकों की जानकारी देना और उन्हें तत्काल प्रतिक्रिया के लिए तैयार करना था।
सत्र एसीपी साइबर क्राइम श्री विवेक रंजन राय एवं इंस्पेक्टर विंध्याचल तिवारी के मार्गदर्शन में आयोजित हुआ। साइबर टीम में इंस्पेक्टर विंध्याचल तिवारी, इंस्पेक्टर राजकुमार चंदेल, सब-इंस्पेक्टर अभिषेक सिंह, हेड कांस्टेबल सचिन, हेड कांस्टेबल रवीश शर्मा, हेड कांस्टेबल विनय कुमार तथा हेड कांस्टेबल रवि कुमार शामिल रहे।
पुलिस टीम ने नागरिकों के सामने साइबर अपराध से जुड़े विभिन्न संभावित जोखिमों और उनसे बचने के व्यावहारिक तरीकों पर चर्चा की।
RWA अध्यक्ष बोले—डर नहीं, जानकारी बनेगी हथियार
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आरडब्ल्यूए अध्यक्ष दिव्य कृष्णात्रेय (दीपक शर्मा) ने कहा कि साइबर अपराधियों के लिए लोगों का डर और अज्ञानता सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। उन्होंने कहा कि बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक प्रत्येक व्यक्ति को डिजिटल सुरक्षा की बुनियादी जानकारी होना जरूरी है।
उनका कहना था कि आरडब्ल्यूए सेक्टर-105 अपने निवासियों की सुरक्षा और सम्मान को लेकर प्रतिबद्ध है तथा पुलिस के साथ मिलकर जागरूकता की ऐसी पहल नागरिकों को अधिक सतर्क और सक्षम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
कौन-कौन रहे मौजूद?
कार्यक्रम में आरडब्ल्यूए कार्यकारिणी और सेक्टर के बड़ी संख्या में निवासियों ने भाग लिया।
आरडब्ल्यूए अध्यक्ष दिव्य कृष्णात्रेय (दीपक शर्मा), महासचिव राजीव दुबलिश, उपाध्यक्ष श्रीमती रानी गौतम, कार्यकारिणी सदस्य उमेश माथुर तथा कार्यकारिणी सदस्य महेश चौहान सहित अनेक निवासी मौजूद रहे।
कार्यक्रम के बाद आरडब्ल्यूए की ओर से जलपान की व्यवस्था भी की गई।
ठगी हो जाए तो सबसे पहले क्या करें?
साइबर अपराध में समय बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि किसी व्यक्ति के साथ ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी होती है या उसे साइबर ठगी का शिकार बनाया जाता है, तो घबराकर चुप बैठना स्थिति को और मुश्किल बना सकता है।
कार्यशाला में नागरिकों को तत्काल शिकायत दर्ज कराने के लिए राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 और आधिकारिक वेबसाइट cybercrime.gov.in का इस्तेमाल करने की सलाह दी गई।
साइबर सुरक्षा का सीधा संदेश है—
रुकिए। सोचिए। सत्यापित कीजिए। फिर ही क्लिक या भुगतान कीजिए।
अब सवाल साइबर अपराधियों से बड़ा है—क्या हम खुद तैयार हैं?
साइबर अपराध का सबसे खतरनाक पहलू यही है कि इसमें अपराधी और पीड़ित के बीच हजारों किलोमीटर की दूरी हो सकती है, लेकिन नुकसान कुछ ही सेकंड में हो सकता है।
एक OTP, एक PIN, एक लिंक, एक स्क्रीन शेयरिंग अनुरोध या डर पैदा करने वाली एक कॉल—इतना काफी हो सकता है कि व्यक्ति जल्दबाजी में ऐसा फैसला कर बैठे जिसका आर्थिक और मानसिक असर लंबे समय तक बना रहे।
ऐसे माहौल में सेक्टर-105 की यह पहल सिर्फ एक जागरूकता कार्यक्रम नहीं, बल्कि नागरिकों को “पहले सावधानी, फिर कार्रवाई” का मंत्र देने की कोशिश है।
नोएडा जैसे तेजी से डिजिटल होते शहर में साइबर सुरक्षा अब केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। पुलिस कार्रवाई करेगी, जांच करेगी और अपराधियों तक पहुंचने का प्रयास करेगी, लेकिन नागरिकों की सतर्कता अपराध की पहली कड़ी को वहीं तोड़ सकती है।
पर्दाफाश न्यूज़ का सवाल सीधा है—जब ठग तकनीक के साथ हर दिन अपना तरीका बदल रहे हैं, तो क्या हम भी अपनी डिजिटल सावधानी का स्तर उतनी ही तेजी से बढ़ा रहे हैं?
क्योंकि डिजिटल दुनिया में सुरक्षा की पहली दीवार कोई ऐप, बैंक या पुलिस स्टेशन नहीं—आपकी अपनी सतर्कता है।















