कुछ महीने पहले तक अमेरिकी राष्ट्रपति नाटो देशों पर तीखे हमले कर रहे थे। वे बार-बार यह सवाल उठा रहे थे कि आखिर अमेरिका यूरोप की सुरक्षा का इतना बड़ा बोझ क्यों उठाए। उन्होंने यहां तक संकेत दिए थे कि यदि यूरोपीय देश अपनी रक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं बढ़ाते, तो अमेरिका नाटो से दूरी बना सकता है। लेकिन अब तस्वीर बदलती हुई दिखाई दे रही है।
तुर्किये की राजधानी अंकारा में हुई नाटो नेताओं की बैठक में ट्रंप का रुख पहले की तुलना में कहीं अधिक नरम और सहयोगी नजर आया। बैठक के दौरान उन्होंने सहयोगी देशों से कहा, “हम आपके साथ रहना चाहते हैं।” यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि हाल के महीनों में ट्रंप की नाटो को लेकर की गई टिप्पणियां अक्सर विवादों में रही थीं।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का मानना है कि यह बदलाव केवल भाषण का बदलाव नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई रणनीतिक, सैन्य और आर्थिक कारण भी हो सकते हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि ट्रंप के रुख में यह बदलाव क्यों आया और इसका नाटो, यूरोप तथा वैश्विक राजनीति पर क्या असर पड़ सकता है।
नाटो क्या है और अमेरिका की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
यानी नाटो दुनिया का सबसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन माना जाता है। इसकी स्थापना 1949 में हुई थी। इसका मूल सिद्धांत यह है कि यदि किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है, तो उसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा।
इस सिद्धांत को नाटो के प्रसिद्ध ‘आर्टिकल 5’ में शामिल किया गया है। यही प्रावधान इस संगठन की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है।
नाटो में अमेरिका की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि संगठन की सैन्य शक्ति, वित्तीय योगदान और रणनीतिक नेतृत्व का बड़ा हिस्सा अमेरिका के पास है। यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था भी काफी हद तक अमेरिकी सैन्य समर्थन पर निर्भर रही है। इसलिए जब भी कोई अमेरिकी राष्ट्रपति नाटो को लेकर सवाल उठाता है, उसका असर पूरे यूरोप में महसूस किया जाता है।
बंद कमरे की बैठक में क्या हुआ?
रिपोर्टों के अनुसार अंकारा में हुई बैठक के दौरान ट्रंप ने सहयोगी देशों को आश्वस्त करने की कोशिश की कि अमेरिका गठबंधन के साथ खड़ा है। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका न केवल नाटो में बना रहेगा, बल्कि सहयोगी देशों को हथियारों की आपूर्ति भी जारी रखेगा।
बैठक में मौजूद नेताओं के अनुसार ट्रंप का रवैया अपेक्षाकृत सकारात्मक और सहयोगी था। उन्होंने उन मुद्दों को नहीं उठाया जिन पर वे पहले खुलकर टकराव का रुख अपनाते रहे थे।
यूरोपीय नेताओं के लिए यह राहत की बात थी क्योंकि पिछले कुछ समय से यह आशंका बनी हुई थी कि अमेरिका नाटो के प्रति अपनी प्रतिबद्धता कमजोर कर सकता है।
आखिर क्यों बदले ट्रंप के सुर?
सबसे बड़ा कारण बदलता हुआ वैश्विक सुरक्षा माहौल माना जा रहा है।
रूस-यूक्रेन युद्ध अब भी यूरोप की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। दूसरी ओर मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव ने पश्चिमी देशों को अधिक एकजुट रहने के लिए प्रेरित किया है।
विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे समय में अमेरिका के लिए अपने सबसे बड़े सैन्य गठबंधन से दूरी बनाना रणनीतिक रूप से नुकसानदायक हो सकता है। ट्रंप भले ही नाटो देशों से अधिक रक्षा खर्च की मांग करते रहे हों, लेकिन वे यह भी जानते हैं कि वैश्विक नेतृत्व बनाए रखने के लिए अमेरिका को मजबूत गठबंधनों की जरूरत है।
इसी कारण उनके बयान में पहले की तुलना में अधिक संतुलन दिखाई दिया।
रक्षा खर्च का मुद्दा अब भी खत्म नहीं हुआ
हालांकि ट्रंप के सुर नरम हुए हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनकी पुरानी चिंताएं खत्म हो गई हैं।
ट्रंप लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा पर अधिक खर्च करना चाहिए। उनका तर्क है कि अमेरिकी करदाता यूरोप की सुरक्षा का अत्यधिक बोझ उठा रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि हाल के वर्षों में कई यूरोपीय देशों ने वास्तव में अपने रक्षा बजट में उल्लेखनीय वृद्धि की है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप में सैन्य खर्च लगातार बढ़ा है।
नाटो बैठक में भी कई सहयोगी देशों ने रक्षा खरीद और सैन्य आधुनिकीकरण में अरबों डॉलर के निवेश की घोषणा की। इससे ट्रंप को यह संदेश गया कि उनकी मांगों का असर पड़ रहा है और सहयोगी देश अधिक जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं।
यूक्रेन युद्ध का क्या असर पड़ा?
यूक्रेन युद्ध ने नाटो की प्रासंगिकता को पहले से अधिक मजबूत बना दिया है।
जब रूस ने यूक्रेन के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया, तब कई यूरोपीय देशों ने महसूस किया कि सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था कितनी महत्वपूर्ण है। इसके बाद नाटो के भीतर सहयोग बढ़ा और कई देशों ने अपने रक्षा बजट बढ़ाए।
अमेरिका ने भी यूक्रेन को सैन्य और आर्थिक सहायता देने में अग्रणी भूमिका निभाई। ऐसे में ट्रंप के लिए पूरी तरह अलगाववादी रुख अपनाना राजनीतिक और रणनीतिक दोनों दृष्टियों से कठिन हो सकता था।
यही वजह है कि उन्होंने इस बार गठबंधन की एकजुटता पर जोर दिया।
ग्रीनलैंड और स्पेन जैसे विवादित मुद्दों पर क्यों रहे शांत?
बैठक की एक और खास बात यह रही कि ट्रंप ने उन मुद्दों को नहीं उठाया जिन पर पहले काफी विवाद हुआ था।
ग्रीनलैंड को लेकर उनके पुराने बयान, स्पेन के रक्षा खर्च पर आलोचना और यूरोपीय देशों के प्रति उनकी तीखी टिप्पणियां इस बैठक में लगभग गायब रहीं।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है। किसी भी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में सहयोग का माहौल बनाने के लिए टकराव वाले विषयों से दूरी बनाना अक्सर प्रभावी माना जाता है।
इससे बैठक का फोकस सुरक्षा सहयोग और सामूहिक रणनीति पर बना रहा।
हथियारों की बिक्री का क्या महत्व है?
ट्रंप ने नाटो देशों को हथियारों की आपूर्ति जारी रखने का संकेत भी दिया। यह केवल सुरक्षा का मामला नहीं बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा उपकरण निर्यातक है। यूरोपीय देशों द्वारा रक्षा खर्च बढ़ाने का सीधा लाभ अमेरिकी रक्षा उद्योग को मिल सकता है।
यानी नाटो के भीतर मजबूत सहयोग से अमेरिका को रणनीतिक और आर्थिक दोनों फायदे मिलते हैं।
इसीलिए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप का नया संदेश केवल राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक हितों से भी जुड़ा हुआ है।
क्या यह स्थायी बदलाव है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ट्रंप का यह बदला हुआ रुख स्थायी है या केवल एक कूटनीतिक रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप की विदेश नीति अक्सर “अमेरिका फर्स्ट” सिद्धांत पर आधारित रही है। इसलिए वे भविष्य में भी सहयोगी देशों से अधिक योगदान की मांग करते रह सकते हैं।
हालांकि अंकारा बैठक ने यह संकेत जरूर दिया है कि ट्रंप नाटो को पूरी तरह छोड़ने के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं। बल्कि वे चाहते हैं कि गठबंधन बना रहे, लेकिन सदस्य देश अपनी जिम्मेदारियों को अधिक गंभीरता से निभाएं।
अंकारा में हुई नाटो बैठक ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। कुछ समय पहले तक नाटो की आलोचना करने वाले डोनाल्ड ट्रंप अब सहयोग और एकजुटता की बात करते दिखाई दिए। “हम आपके साथ रहना चाहते हैं” जैसे शब्द केवल कूटनीतिक बयान नहीं हैं, बल्कि बदलते वैश्विक सुरक्षा माहौल की झलक भी हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध, यूरोप की सुरक्षा चिंताएं, बढ़ता रक्षा निवेश और वैश्विक शक्ति संतुलन जैसे कारकों ने ट्रंप के रुख को अधिक व्यावहारिक बनाया है। हालांकि यह देखना अभी बाकी है कि यह बदलाव कितना स्थायी साबित होता है, लेकिन फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अमेरिका और नाटो के रिश्तों में तनाव की जगह सहयोग की भाषा लौटती दिखाई दे रही है।
आने वाले महीनों में यही तय करेगा कि यह बदलाव केवल एक सम्मेलन तक सीमित था या फिर ट्रंप की व्यापक विदेश नीति का नया संकेत।














