Monday, August 17, 2026
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नितिन नबीन की नई टीम में अनुभव का दबदबा, दूसरी पंक्ति में युवा चेहरों को मौका; 2029 की तैयारी का साफ संकेत

“बीजेपी अध्यक्ष बनने के सात महीने बाद नितिन नबीन ने घोषित की नई राष्ट्रीय टीम | 65 पदाधिकारियों में अनुभवी नेताओं के साथ नई पीढ़ी को भी जगह | स्मृति ईरानी की वापसी, अमित मालवीय बाहर | संसदीय बोर्ड की औसत उम्र 69 साल, संगठन में युवाओं की बढ़ती हिस्सेदारी”

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की कमान संभालने के करीब सात महीने बाद नितिन नबीन ने सोमवार, 17 अगस्त 2026 को अपनी नई राष्ट्रीय टीम का ऐलान कर दिया। 65 सदस्यों वाली इस टीम में पार्टी ने अनुभव और युवा नेतृत्व के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। शीर्ष और निर्णायक पदों पर जहां पुराने और अनुभवी चेहरों पर भरोसा कायम रखा गया है, वहीं राष्ट्रीय सचिव, मोर्चा और राज्य संगठन जैसे स्तरों पर अपेक्षाकृत युवा नेताओं को आगे बढ़ाने का संकेत दिया गया है।

नई टीम में 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, 8 राष्ट्रीय महासचिव, एक राष्ट्रीय संगठन महासचिव, 14 राष्ट्रीय सचिव और एक कोषाध्यक्ष शामिल हैं। इसके अलावा सह-संगठन महासचिव और विभिन्न मोर्चों के अध्यक्षों को भी संगठन की जिम्मेदारियां दी गई हैं। खास बात यह है कि 45 वर्षीय नितिन नबीन की टीम में फैसले लेने वाले प्रमुख पदाधिकारियों की औसत उम्र करीब 59 साल है। हालांकि पूरी टीम की औसत उम्र करीब 50 साल के आसपास बैठती है। यानी पार्टी ने ऊपर अनुभव और नीचे नई पीढ़ी—दोनों को साधने की कोशिश की है।

स्मृति ईरानी की वापसी, अमित मालवीय की छुट्टी

नई टीम की सबसे चर्चित नियुक्तियों में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की संगठन में वापसी है। ईरानी इससे पहले राजनाथ सिंह के नेतृत्व वाली टीम में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल चुकी हैं। अब उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है। यह नियुक्ति संगठन में उनके राजनीतिक और जनसंपर्क अनुभव की वापसी के तौर पर देखी जा रही है।

दूसरी ओर बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय को नई राष्ट्रीय टीम में जगह नहीं मिली है। लंबे समय से सोशल मीडिया और डिजिटल नैरेटिव में पार्टी का प्रमुख चेहरा रहे मालवीय का बाहर होना संगठनात्मक बदलाव का एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

नई टीम में कई पुराने कद्दावर नेताओं की भी वापसी हुई है। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, राम माधव, तीरथ सिंह रावत और बैजयंत जय पांडा जैसे नामों को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं सुनील बंसल, विनोद तावड़े, बिप्लब देव और सतीश पूनिया जैसे नेताओं को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है।नितिन नबीन की नई टीम में अनुभव का दबदबा, दूसरी पंक्ति में युवा चेहरों को मौका; 2029 की तैयारी का साफ संकेत

13 उपाध्यक्षों में अनुभव की बड़ी हिस्सेदारी

राष्ट्रीय उपाध्यक्षों की टीम में वसुंधरा राजे सबसे उम्रदराज चेहरा हैं। उनकी उम्र 73 साल है, जबकि डॉ. भारती पवार 47 साल की उम्र के साथ इस टीम में सबसे युवा चेहरों में शामिल हैं।

राष्ट्रीय उपाध्यक्षों की सूची में वसुंधरा राजे, राम माधव, तीरथ सिंह रावत, बैजयंत जय पांडा, रेखा वर्मा, डी. पुरंदेश्वरी, भारती पवार, मनप्रीत बादल, वी. नरेंद्र भाई दोषी, लाल सिंह आर्या, एम. नागराज, तारिक मंसूर और मधुचंद्र कर शामिल हैं।

यह सूची बताती है कि पार्टी ने इस पद पर राजनीतिक अनुभव, विभिन्न राज्यों में पकड़ और अलग-अलग सामाजिक समूहों में प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता दी है। हालांकि उम्र के लिहाज से यह टीम युवा नहीं कही जा सकती।

महासचिवों में स्मृति ईरानी सबसे युवा, तावड़े सबसे उम्रदराज

बीजेपी के संगठन में राष्ट्रीय महासचिवों का पद बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। आठ महासचिवों की नई टीम में सुनील बंसल, विनोद तावड़े, बिप्लब देव, स्मृति ईरानी, सतीश पूनिया, गजेंद्र पटेल, हरीश द्विवेदी और संजय भाटिया को जगह मिली है।

इन आठ महासचिवों की औसत उम्र करीब 55 साल है। 63 वर्षीय विनोद तावड़े इस समूह में सबसे उम्रदराज हैं, जबकि 50 वर्षीय स्मृति ईरानी सबसे युवा चेहरा हैं। इस पद पर ऐसे नेताओं को जगह दी गई है जिनके पास चुनाव प्रबंधन, संगठन विस्तार और अलग-अलग राज्यों में पार्टी को मजबूत करने का अनुभव है।

संगठन महासचिव की जिम्मेदारी एक बार फिर बीएल संतोष के पास है। वहीं सौदान सिंह और शिवप्रकाश को सह-संगठन महासचिव की जिम्मेदारी दी गई है। इससे साफ है कि पार्टी के केंद्रीय संगठन में निरंतरता बनाए रखने की कोशिश भी की गई है।

राष्ट्रीय सचिवों में दिखा युवा चेहरों पर भरोसा

अगर बीजेपी की नई टीम में किसी स्तर पर पीढ़ीगत बदलाव सबसे स्पष्ट दिखाई देता है तो वह राष्ट्रीय सचिवों का पद है। इस स्तर पर अपेक्षाकृत युवा नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां दी गई हैं।

नई टीम में कविता पाटीदार, के. सुरेंद्रन, भोला सिंह, प्रदीप वर्मा, जगदीश पटेल, संदीप पाठक, फेंगनोन कोनयाक, संगीता यादव, अनिल एंटनी, एम. वेंकटेशन, मनोज टिग्गा, सिद्धार्थ शंभु, स्वदेश सिंह, मृगांका देब वर्मन, रोहन गुप्ता और जय प्रकाश जैसे नाम शामिल हैं।

इनमें अनिल एंटनी 40 साल की उम्र के साथ सबसे युवा चेहरों में हैं। सचिवों की औसत उम्र करीब 50 साल है। यह आंकड़ा बताता है कि पार्टी ने संगठन की दूसरी पंक्ति में भविष्य के नेतृत्व को तैयार करने पर जोर दिया है।

यही वह स्तर है जहां से आने वाले वर्षों में कई नेता राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। 2029 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए यह बदलाव महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

63 साल के पीयूष गोयल को कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी

नितिन नबीन ने 83 वर्षीय राजेश अग्रवाल की जगह 63 वर्षीय पीयूष गोयल को राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष नियुक्त किया है। यह बदलाव भी पार्टी संगठन में जिम्मेदारियों के पुनर्वितरण की ओर इशारा करता है।

गोयल लंबे समय तक केंद्रीय राजनीति में सक्रिय रहे हैं और सरकार में कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। ऐसे में पार्टी संगठन में वित्तीय और प्रशासनिक भूमिका के लिए उनकी नियुक्ति को अनुभव के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मोर्चों में नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की कोशिश

बीजेपी ने अपने सात प्रमुख मोर्चों के अध्यक्षों की नियुक्ति में भी अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक समूहों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है।

युवा मोर्चा की जिम्मेदारी हेमांग जोशी, महिला मोर्चा की रूप चौधरी, ओबीसी मोर्चा की अमरपाल मौर्य, एससी मोर्चा की शिवेश राम, किसान मोर्चा की बंसीलाल गुर्जर, एसटी मोर्चा की मन्नालाल रावत और अल्पसंख्यक मोर्चा की कमान कुंवर बासित अली को दी गई है।

मोर्चों के जरिए पार्टी सीधे युवाओं, महिलाओं, किसानों, पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक समुदायों तक राजनीतिक पहुंच मजबूत करती है। ऐसे में इन नियुक्तियों का असर सिर्फ संगठन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले चुनावों में पार्टी की रणनीति पर भी दिखाई दे सकता है।

मुख्यमंत्रियों में भी 50-60 साल की पीढ़ी पर भरोसा

बीजेपी की राष्ट्रीय टीम को पार्टी के मुख्यमंत्रियों और प्रदेश अध्यक्षों के साथ जोड़कर देखें तो एक व्यापक पैटर्न दिखाई देता है। बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की औसत उम्र करीब 55 साल है।

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा 72 साल की उम्र के साथ सबसे उम्रदराज बीजेपी मुख्यमंत्री हैं। वहीं अरुणाचल प्रदेश के पेमा खांडू 46 साल के साथ सबसे युवा मुख्यमंत्रियों में हैं।

छत्तीसगढ़ के विष्णुदेव साय 61 वर्ष, राजस्थान के भजनलाल शर्मा 59 वर्ष, ओडिशा के मोहन चरण माझी 54 वर्ष तथा हरियाणा के नायब सिंह सैनी और महाराष्ट्र के देवेंद्र फडणवीस 55-55 वर्ष के हैं।

इससे संकेत मिलता है कि मुख्यमंत्री स्तर पर भी बीजेपी पूरी तरह नई पीढ़ी या पूरी तरह पुराने चेहरों में से किसी एक को चुनने के बजाय मध्य आयु वर्ग के नेताओं पर भरोसा कर रही है।

नितिन नबीन की नई टीम में अनुभव का दबदबा, दूसरी पंक्ति में युवा चेहरों को मौका; 2029 की तैयारी का साफ संकेत

प्रदेश अध्यक्षों में भी 50-60 साल के नेताओं को प्राथमिकता

राज्यों के संगठन में भी बीजेपी की रणनीति कुछ ऐसी ही दिखाई देती है। हाल में नियुक्त किए गए कई प्रदेश अध्यक्ष 50 से 60 साल की उम्र के बीच हैं।

बिहार के संजय सरावगी 56 साल, आंध्र प्रदेश के पीवीएन माधव 52 साल, गुजरात के जगदीश विश्वकर्मा 52 साल, असम के दिलीप सैकिया 52 साल, गोवा के दामोदर नायक 54 साल, कर्नाटक के बीवाई विजयेंद्र 50 साल, मणिपुर की ए. शारदा देवी 54 साल, मेघालय के रिकमन एम. 55 साल, सिक्किम के डीआर थापा 55 साल, महाराष्ट्र के रवींद्र चव्हाण और उत्तराखंड के महेंद्र भट्ट 51 साल के हैं।

वहीं उत्तर प्रदेश के पंकज चौधरी, केरल के राजीव चंद्रशेखर और मध्य प्रदेश के हेमंत खंडेलवाल की उम्र 61 साल है। हरियाणा के मोहन लाल बड़ौली और पश्चिम बंगाल के शमिक भट्टाचार्य 62-62 साल के हैं।

यानी प्रदेश अध्यक्षों के स्तर पर भी पार्टी ने ऐसे नेताओं को तरजीह दी है जो अनुभवी होने के साथ लंबे समय तक संगठन की कमान संभाल सकें।

लेकिन असली हाईकमान अभी भी सबसे उम्रदराज

बीजेपी की सत्ता और संगठन की पूरी तस्वीर को समझने के लिए संसदीय बोर्ड पर नजर डालना जरूरी है। पार्टी के भीतर संसदीय बोर्ड को सबसे महत्वपूर्ण निर्णयकारी संस्था माना जाता है। बड़े राजनीतिक और संगठनात्मक फैसलों में इसकी भूमिका बेहद अहम होती है।

फिलहाल संसदीय बोर्ड में 11 सदस्य हैं। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हैं।

इस बोर्ड की औसत उम्र करीब 69 साल है। 82 वर्षीय बीएस येदियुरप्पा इसके सबसे उम्रदराज सदस्यों में हैं। यह आंकड़ा बीजेपी की राष्ट्रीय टीम के मुकाबले काफी ज्यादा है।

यही अंतर पार्टी की रणनीति को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी देता है। फैसले की अंतिम परत में पार्टी ने अनुभव को प्राथमिकता दी है, जबकि संगठन के विस्तार और भविष्य के नेतृत्व के लिए अपेक्षाकृत युवा चेहरों को आगे बढ़ाया है।

नबीन की टीम में दिख रही है ‘अनुभव ऊपर, युवा नीचे’ की रणनीति

नितिन नबीन की नई टीम को केवल पदों की सूची के तौर पर देखने से तस्वीर अधूरी रह जाएगी। असल कहानी उम्र और जिम्मेदारी के बीच के रिश्ते में छिपी है।

राष्ट्रीय अध्यक्ष 45 वर्ष के हैं, लेकिन उनके आसपास के सबसे शक्तिशाली संगठनात्मक पदों पर औसत उम्र करीब 59 साल है। महासचिवों में औसत उम्र 55 साल और उपाध्यक्षों में यह इससे भी अधिक है। दूसरी तरफ राष्ट्रीय सचिवों की औसत उम्र करीब 50 साल है और मोर्चों में भी अपेक्षाकृत नए चेहरों को मौका दिया गया है।

यानी पार्टी ने शीर्ष स्तर पर अचानक बड़े पैमाने पर पीढ़ी परिवर्तन करने के बजाय क्रमिक बदलाव का रास्ता चुना है। पुराने नेताओं का अनुभव संगठन के शीर्ष स्तर पर बना रहे और नई पीढ़ी को नीचे से ऊपर आने का रास्ता मिलता रहे—नई टीम की संरचना से यही संदेश निकलता है।

2029 के लिए बीजेपी ने अभी से बिछाई संगठन की बिसात?

2029 का लोकसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन बीजेपी जैसी कैडर आधारित पार्टी के लिए चुनावी तैयारी मतदान की तारीख घोषित होने के बाद शुरू नहीं होती। संगठन में नई नियुक्तियां, राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन और दूसरी पंक्ति के नेताओं को जिम्मेदारी देना लंबी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा होता है।

नितिन नबीन की नई टीम को भी इसी नजरिए से देखा जा सकता है। एक तरफ वसुंधरा राजे, राम माधव, विनोद तावड़े, बीएल संतोष जैसे अनुभवी चेहरों के जरिए संगठनात्मक निरंतरता बरकरार रखी गई है। दूसरी तरफ स्मृति ईरानी जैसे नेताओं की वापसी और अपेक्षाकृत युवा सचिवों तथा मोर्चा अध्यक्षों को जिम्मेदारी देकर भविष्य के नेतृत्व की जमीन तैयार की गई है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पार्टी ने अपनी शीर्ष निर्णयकारी संस्था को अभी भी वरिष्ठ नेताओं के हाथ में रखा है। संसदीय बोर्ड की करीब 69 साल की औसत उम्र इसकी पुष्टि करती है। लेकिन उसके नीचे संगठनात्मक ढांचे में उम्र धीरे-धीरे घटती दिखाई देती है।

यानी बीजेपी की नई टीम का संदेश साफ है—फैसले अनुभवी करेंगे, लेकिन भविष्य की लड़ाई के लिए मैदान युवा तैयार करेंगे।

नितिन नबीन की चुनौती अब इस संतुलन को जमीन पर उतारने की है। नई टीम के सामने संगठन विस्तार, राज्यों में चुनावी प्रबंधन, युवा और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं तक पहुंच तथा 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी जैसे कई मोर्चे होंगे। अगर यह टीम अपने उद्देश्य में सफल रहती है तो आने वाले वर्षों में यही दूसरी पंक्ति बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व का अगला चेहरा बन सकती है।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
VIKAS TRIPATHI भारत देश की सभी छोटी और बड़ी खबरों को सामने दिखाने के लिए "पर्दाफास न्यूज" चैनल को लेके आए हैं। जिसके लोगो के बीच में करप्शन को कम कर सके। हम देश में समान व्यवहार के साथ काम करेंगे। देश की प्रगति को बढ़ाएंगे।
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