नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनाव के बाद सबसे बड़ा राजनीतिक भूचाल देखने को मिल रहा है। कभी मजबूत संगठन और अटूट नेतृत्व का दावा करने वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) अब अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी परीक्षा से गुजर रही है। पार्टी के भीतर बगावत इस स्तर तक पहुंच गई है कि अब मामला केवल नेतृत्व परिवर्तन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि चुनाव चिन्ह, पार्टी फंड, संगठनात्मक संपत्तियों और कोलकाता स्थित पार्टी मुख्यालय ‘तृणमूल भवन’ पर अधिकार की लड़ाई में बदल गया है।
सोमवार को इस राजनीतिक संघर्ष का सबसे अहम पड़ाव आने वाला है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला ‘कालीघाट गुट’ और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी गुट दिल्ली स्थित चुनाव आयोग के समक्ष अपने-अपने दस्तावेज, संगठनात्मक रिकॉर्ड और बहुमत के समर्थन के सबूत पेश करेगा। चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों को शाम 5:30 बजे तक सभी आवश्यक दस्तावेज जमा करने का निर्देश दिया है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में आयोग के फैसले से यह तय होगा कि आखिर ‘असली तृणमूल कांग्रेस’ किसे माना जाएगा।
सिंबल से लेकर पार्टी मुख्यालय तक, हर चीज दांव पर
यह विवाद केवल राजनीतिक नेतृत्व का नहीं बल्कि पार्टी की पूरी विरासत का है। मशहूर ‘घास और फूल’ चुनाव चिन्ह, पार्टी का बैंक फंड, संगठनात्मक संपत्तियां, आधिकारिक रिकॉर्ड और कोलकाता का तृणमूल भवन—सब कुछ दोनों गुटों के दावे के केंद्र में है।
ममता बनर्जी का गुट दावा कर रहा है कि पार्टी की स्थापना, वैचारिक विरासत और संगठनात्मक निरंतरता उनके साथ है। वहीं बागी गुट का कहना है कि लोकतंत्र में बहुमत ही असली ताकत है और अधिकांश विधायक तथा कई सांसद अब उनके साथ हैं। ऐसे में पार्टी पर वैधानिक अधिकार भी उन्हें ही मिलना चाहिए।
विधायक दल में बगावत से शुरू हुआ संकट
तृणमूल कांग्रेस का संकट विधानसभा चुनाव में हार के बाद शुरू हुआ। पहले यह नाराज विधायकों की असंतुष्टि तक सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे यह पूर्ण राजनीतिक विद्रोह में बदल गया।
बागी नेताओं ने एक विशेष बैठक बुलाकर वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को चेयरपर्सन चुना और समानांतर राष्ट्रीय नेतृत्व संरचना की घोषणा कर दी। उनका आरोप है कि मौजूदा नेतृत्व ने पार्टी के अधिकांश निर्वाचित प्रतिनिधियों का विश्वास खो दिया है और अब संगठन में व्यापक बदलाव की जरूरत है।
58 विधायकों ने बदला समीकरण
बागी गुट ने पहली बार अपनी ताकत तब दिखाई जब टीएमसी के 80 विधायकों में से 58 ने पार्टी नेतृत्व के आधिकारिक उम्मीदवार को नकारते हुए विपक्ष के नेता के पद के लिए ऋतब्रत बनर्जी का समर्थन किया।
इसके बाद बागी गुट लगातार अपनी ताकत बढ़ाता गया। अब उनका दावा है कि करीब 65 विधायक उनके साथ हैं। यदि यह दावा सही साबित होता है तो यह ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका होगा।
21 सांसदों के अलग होने से संसद में भी कमजोर हुई टीएमसी
विधायकों की बगावत के बाद पार्टी को दूसरा बड़ा झटका लोकसभा में लगा। सांसद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में 21 सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) का साथ देने का ऐलान कर दिया।
इस घटनाक्रम से संसद में तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक ताकत कमजोर पड़ गई और यह संदेश गया कि असंतोष केवल विधानसभा तक सीमित नहीं है बल्कि पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व पर भी गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं।
तृणमूल भवन पर कब्जे ने बढ़ाया राजनीतिक तापमान
राजनीतिक लड़ाई शुक्रवार को और अधिक नाटकीय हो गई जब बागी गुट ने कोलकाता स्थित पार्टी मुख्यालय तृणमूल भवन पर कब्जा कर लिया।
बताया गया कि मुख्यालय के ताले बदल दिए गए, नए पोस्टर लगाए गए और घोषणा की गई कि अब पार्टी का संचालन यहीं से होगा। इस कदम ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी क्योंकि पार्टी मुख्यालय पर नियंत्रण किसी भी संगठन की वैधता का बड़ा प्रतीक माना जाता है।
यह कार्रवाई उस समय हुई जब बागी गुट चुनाव आयोग में पार्टी के नेतृत्व, चुनाव चिन्ह और संगठनात्मक अधिकारों पर दावा पेश कर चुका था।
ममता गुट का पलटवार—निकाले गए नेता दावा नहीं कर सकते
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने बागी नेताओं के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
पार्टी नेताओं का कहना है कि जिन्हें संगठन से निष्कासित किया जा चुका है, वे चुनाव आयोग के सामने पार्टी का प्रतिनिधित्व करने या उस पर अधिकार जताने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं रखते। ममता गुट सोमवार को आयोग के सामने अपने संगठनात्मक दस्तावेज और वैधानिक रिकॉर्ड पेश करेगा।
‘सिंबल छिन भी गया तो जनता के बीच लेकर जाऊंगी’
शनिवार को ममता बनर्जी ने बागी नेताओं पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि उन्हें पार्टी के चुनाव चिन्ह की चिंता नहीं है क्योंकि जनता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
उन्होंने कहा कि कई नेताओं ने विश्वासघात किया है और वे केवल इसलिए चुनाव जीत पाए क्योंकि उनके नामांकन पत्र पर उन्होंने हस्ताक्षर किए थे। ममता ने आरोप लगाया कि कुछ नेता राजनीतिक विरोधियों के इशारे पर पार्टी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि चुनाव चिन्ह छीनने की कोशिश भी की गई तो वे उसी चिन्ह को अपने गले में लटकाकर जनता के बीच जाएंगी और अपनी लड़ाई जारी रखेंगी। उनके अनुसार, व्यक्ति बदल सकते हैं लेकिन संस्था समाप्त नहीं होती।
बागी गुट का दावा—बहुमत ही तय करेगा असली पार्टी
दूसरी ओर, ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रहा है।
बागी नेताओं का कहना है कि चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ा आधार बहुमत होगा। यदि अधिकांश विधायक, सांसद और संगठनात्मक प्रतिनिधि उनके साथ हैं तो पार्टी पर अधिकार भी उन्हें मिलना चाहिए। उनका विश्वास है कि अंततः ‘मैजॉरिटी टेस्ट’ ही तय करेगा कि असली तृणमूल कांग्रेस कौन है।
चुनाव आयोग की भूमिका होगी बेहद अहम
अब सभी की नजर चुनाव आयोग पर टिकी है। आयोग दोनों गुटों के संगठनात्मक दस्तावेज, संविधान, निर्वाचित प्रतिनिधियों का समर्थन, पार्टी संरचना और कानूनी दावों की जांच करेगा। इसके बाद ही यह फैसला होगा कि पार्टी का चुनाव चिन्ह, आधिकारिक नाम और संगठनात्मक नियंत्रण किसे मिलेगा।
भारतीय राजनीति में इससे पहले भी कई दलों में ऐसी स्थिति बन चुकी है, जहां चुनाव आयोग ने बहुमत, संगठनात्मक संरचना और संवैधानिक प्रक्रिया के आधार पर फैसला सुनाया है। तृणमूल कांग्रेस का यह मामला भी उसी श्रेणी का एक बड़ा राजनीतिक विवाद माना जा रहा है।
राजनीतिक भविष्य पर टिकी देशभर की नजर
तृणमूल कांग्रेस की यह लड़ाई अब केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रह गई है। यह देश की सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों में से एक के भविष्य का सवाल बन चुकी है। यदि पार्टी का विभाजन औपचारिक रूप लेता है तो इसका असर पश्चिम बंगाल की राजनीति, विपक्षी गठबंधन और राष्ट्रीय राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।
सोमवार को चुनाव आयोग के समक्ष दोनों गुटों की पेशी इस संघर्ष का पहला निर्णायक चरण होगी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बहुमत, संगठन और कानून की कसौटी पर आखिर किसे ‘असली तृणमूल कांग्रेस’ का दर्जा मिलता है और किसके हाथ में पार्टी का चुनाव चिन्ह, संगठन और राजनीतिक विरासत जाती है।














