“10-15 साल पुराने मकानों पर ‘लेबर सेस’ के नोटिस से सेक्टर-105 में उबाल”
नोएडा। सेक्टर-105 में 10 से 15 वर्ष पहले बने मकानों के मालिकों को भेजे जा रहे भारी-भरकम ‘निर्माण उपकर’ यानी लेबर सेस के नोटिसों को लेकर निवासियों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। उप श्रम आयुक्त कार्यालय की ओर से जारी किए जा रहे इन नोटिसों में मकानों की निर्माण लागत वास्तविक खर्च से कई गुना अधिक दर्शाए जाने का आरोप है। वहीं, नोटिसों में ब्याज और पेनल्टी जोड़कर रकम और बढ़ा दी गई है। मामले को लेकर सेक्टर-105 की आरडब्ल्यूए ने अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हस्तक्षेप की मांग की है।
आरडब्ल्यूए अध्यक्ष दिव्य कृष्णात्रेय का आरोप है कि वर्ष 2017-18 के कथित जीआईएस सैटेलाइट सर्वे के आधार पर मकानों की निर्माण लागत का आकलन किया गया, जबकि मौके पर वास्तविक निर्माण, उस समय की लागत और संबंधित दस्तावेजों की समुचित जांच नहीं की गई। आरडब्ल्यूए का कहना है कि कई ऐसे मकानों को भी भारी रकम के नोटिस भेजे गए हैं, जिनका निर्माण वर्षों पहले पूरा हो चुका है और जिनके मालिक नोएडा प्राधिकरण की निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत आवश्यक दस्तावेज और एनओसी प्राप्त कर चुके हैं।
चार-पांच लाख के निर्माण को 11 लाख या उससे अधिक दिखाने का आरोप
आरडब्ल्यूए के मुताबिक, सेक्टर में कुछ मकानों के निर्माण पर उस समय वास्तविक खर्च करीब चार से पांच लाख रुपये आया था, लेकिन विभागीय आकलन में उनकी निर्माण लागत 11 लाख रुपये या उससे अधिक दर्शाई गई है। इसके बाद निर्धारित उपकर के साथ ब्याज और पेनल्टी जोड़कर नोटिस जारी किए जा रहे हैं।
निवासियों का कहना है कि निर्माण लागत के आकलन में यदि वास्तविक परिस्थितियों और दस्तावेजों को आधार बनाया जाता तो देय राशि काफी अलग हो सकती थी। उनका सवाल है कि वर्षों पुराने निर्माण की लागत का निर्धारण केवल सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर कैसे किया जा सकता है।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आरडब्ल्यूए ने कुछ नोटिसों का उदाहरण भी सामने रखा है। सेक्टर निवासी कमलेश गुप्ता, मकान संख्या B-235, के मामले में 94.50 लाख रुपये की निर्माण लागत दर्शाते हुए 94,500 रुपये का नोटिस जारी किए जाने की बात कही गई है। इसी तरह जमील अहमद, मकान संख्या B-270, को 86,351 रुपये तथा जय चंद एस., मकान संख्या B-229, को 11,886 रुपये का नोटिस मिलने का दावा किया गया है।
‘वर्षों बाद नोटिस, ब्याज और पेनल्टी क्यों?’
आरडब्ल्यूए अध्यक्ष दिव्य कृष्णात्रेय ने श्रम विभाग की प्रक्रिया पर कई सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि किसी निर्माण पर लेबर सेस की देयता बनती भी थी, तो संबंधित व्यक्ति को समय रहते इसकी जानकारी दी जानी चाहिए थी। आरडब्ल्यूए का दावा है कि निर्माण कार्य पूरा होने के 10 से 15 वर्ष बाद नोटिस जारी करना गंभीर सवाल खड़े करता है।
आरडब्ल्यूए ने यह भी सवाल उठाया है कि यदि विभाग के पास किसी निर्माण की जानकारी वर्षों पहले उपलब्ध थी, तो उसी समय संबंधित मकान मालिक को नोटिस क्यों नहीं दिया गया। इतने लंबे अंतराल के बाद अचानक मूल राशि के साथ ब्याज और 100 प्रतिशत तक पेनल्टी जोड़ने से नागरिकों पर आर्थिक बोझ कई गुना बढ़ गया है।
निवासियों का कहना है कि पुराने मामलों में देनदारी की जानकारी समय पर नहीं मिलने के कारण उन्हें अब ऐसी रकम का सामना करना पड़ रहा है, जिसे एकमुश्त चुकाना उनके लिए आसान नहीं है।
नए खरीदारों पर पुराने मालिकों की देनदारी का आरोप
मामले का एक अहम पहलू ऐसे मकानों से जुड़ा है जिन्हें मौजूदा निवासियों ने हाल के वर्षों में रीसेल के जरिए खरीदा है। आरडब्ल्यूए का कहना है कि कुछ नए खरीदारों को भी पुराने निर्माण से संबंधित लेबर सेस के नोटिस जारी किए गए हैं।
नए खरीदारों का सवाल है कि जिस समय उन्होंने मकान खरीदा, उस समय उन्होंने नोएडा प्राधिकरण की निर्धारित प्रक्रिया पूरी की। दस्तावेजों की जांच, लीज डीड और अन्य आवश्यक औपचारिकताओं के बाद ही संपत्ति का लेन-देन हुआ। ऐसे में पूर्व मालिक के समय की कथित देनदारी नए खरीदार पर डालना किस आधार पर उचित है, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए।
आरडब्ल्यूए ने मांग की है कि संपत्ति के स्वामित्व में बदलाव होने की स्थिति में पुराने निर्माण से संबंधित किसी भी कथित बकाया की जिम्मेदारी नए खरीदार पर डालने से पहले स्पष्ट कानूनी और दस्तावेजी आधार बताया जाए।
लीज डीड और कम्प्लीशन सर्टिफिकेट का भी हवाला
सेक्टर-105 आरडब्ल्यूए का कहना है कि यहां के निवासियों ने नोएडा प्राधिकरण से लीज डीड, जल विभाग, अकाउंट्स और कम्प्लीशन सर्टिफिकेट (CC) समेत आवश्यक दस्तावेज और एनओसी प्राप्त करने के बाद ही मकान बनाए या खरीदे हैं।
आरडब्ल्यूए के अनुसार, इन प्रक्रियाओं के दौरान निवासियों को लेबर सेस से संबंधित ऐसी देनदारी की जानकारी नहीं दी गई थी। यही वजह है कि वर्षों बाद अचानक नोटिस मिलने से लोगों में असमंजस और नाराजगी है।
आरडब्ल्यूए का कहना है कि यदि निर्माण के समय कोई वैधानिक देनदारी लागू थी, तो संबंधित विभागों और प्राधिकरण के बीच समन्वय के जरिए उसी समय उसकी जानकारी नागरिकों को दी जानी चाहिए थी। वर्षों बाद ब्याज और पेनल्टी के साथ नोटिस जारी करने से आम नागरिकों पर अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ रहा है।
‘बंद कमरों में सैटेलाइट सर्वे से तय हो रही लागत’
आरडब्ल्यूए ने कथित सैटेलाइट आधारित मूल्यांकन की प्रक्रिया पर भी आपत्ति जताई है। संगठन का आरोप है कि वास्तविक स्थल निरीक्षण के बजाय जीआईएस सैटेलाइट सर्वे के आधार पर निर्माण लागत निर्धारित की जा रही है।
आरडब्ल्यूए का कहना है कि सैटेलाइट तस्वीर से किसी मकान का क्षेत्रफल या बाहरी संरचना तो देखी जा सकती है, लेकिन उससे यह निर्धारित करना कि निर्माण में वास्तविक रूप से कितना पैसा खर्च हुआ, अपने आप में पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। निर्माण की गुणवत्ता, सामग्री, उस समय के बाजार भाव, निर्माण की वास्तविक अवधि और अन्य परिस्थितियों का भी आकलन जरूरी है।
इसी आधार पर आरडब्ल्यूए ने मांग की है कि किसी भी उपकर निर्धारण से पहले संबंधित मकान मालिक को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाए और वास्तविक दस्तावेजों के आधार पर निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाए।
सेवानिवृत्त अधिकारियों और बुजुर्गों पर बढ़ा आर्थिक दबाव
सेक्टर-105 में बड़ी संख्या में सेवानिवृत्त अधिकारी और वरिष्ठ नागरिक रहते हैं। आरडब्ल्यूए के अनुसार, इनमें से कई लोगों ने अपनी जीवनभर की बचत से मकान बनवाए हैं। कुछ वरिष्ठ नागरिकों ने हाल के वर्षों में अपनी जरूरत के मुताबिक बने-बनाए मकान खरीदे हैं।
ऐसे में हजारों या लाखों रुपये के अचानक जारी नोटिसों ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। आरडब्ल्यूए का कहना है कि कई बुजुर्ग निवासी इस स्थिति को मानसिक और आर्थिक दबाव के रूप में देख रहे हैं।
दिव्य कृष्णात्रेय के मुताबिक, नागरिक विभागीय प्रक्रिया के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन किसी भी देनदारी का निर्धारण पारदर्शी, दस्तावेज-आधारित और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत होना चाहिए।
मुख्यमंत्री योगी से तत्काल हस्तक्षेप की मांग
मामले को लेकर आरडब्ल्यूए अध्यक्ष दिव्य कृष्णात्रेय ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र भेजकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। आरडब्ल्यूए ने मुख्यमंत्री से सेक्टर-105 के निवासियों और नए खरीदारों को जारी किए गए कथित अनुचित नोटिसों की समीक्षा कराने की मांग की है।
आरडब्ल्यूए की प्रमुख मांगों में पुराने मकानों पर जारी नोटिसों की निष्पक्ष जांच, कथित एकतरफा सैटेलाइट सर्वे आधारित मूल्यांकन पर रोक, पुराने मालिकों की कथित देनदारी नए खरीदारों पर नहीं डालना तथा नोएडा प्राधिकरण से कम्प्लीशन सर्टिफिकेट और आवश्यक एनओसी प्राप्त पुराने निर्माणों के मामलों की अलग से समीक्षा शामिल है।
आरडब्ल्यूए ने यह भी मांग की है कि जिन मामलों में नागरिकों को नोटिस जारी किए गए हैं, वहां पहले उन्हें संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने और अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया जाए। इसके बाद ही किसी देनदारी का अंतिम निर्धारण किया जाए।
अब जवाब का इंतजार
सेक्टर-105 में लेबर सेस के नोटिसों को लेकर विवाद अब स्थानीय स्तर से निकलकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंच गया है। एक तरफ आरडब्ल्यूए पुराने निर्माणों, सैटेलाइट आधारित लागत निर्धारण, ब्याज-पेनल्टी और नए खरीदारों पर कथित पुरानी देनदारी थोपे जाने को लेकर सवाल उठा रही है, वहीं दूसरी तरफ पूरे मामले में संबंधित विभाग का पक्ष सामने आना भी महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल सेक्टर के निवासी इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि शिकायत पर शासन और संबंधित विभाग क्या कदम उठाते हैं। आरडब्ल्यूए का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी वैधानिक प्रक्रिया को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि नागरिकों से किसी भी प्रकार की वसूली पारदर्शी प्रक्रिया, सही मूल्यांकन और उचित सुनवाई के बाद ही की जाए।
सेक्टर-105 के निवासियों की नजर अब मुख्यमंत्री से की गई इस गुहार पर है और उन्हें उम्मीद है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराकर वर्षों पुराने इन नोटिसों से जुड़ी स्थिति को स्पष्ट किया जाएगा।














