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SIR पर संग्राम: सड़क पर उतरेगा ‘INDIA’, EC मुख्यालय तक विपक्ष का मार्च

“मतदाता सूची पर सवाल, CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग; 19 विपक्षी दलों का शक्ति प्रदर्शन, AAP और DMK ने बनाई दूरी”

नई दिल्ली। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) को लेकर देश की सियासत एक बार फिर बेहद गर्म हो गई है। विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ ने अब इस मुद्दे को संसद के भीतर की बहस से निकालकर सीधे सड़क पर ले जाने का फैसला किया है। मंगलवार, 6 अक्टूबर को विपक्षी दलों के नेता संसद भवन से चुनाव आयोग मुख्यालय तक पैदल मार्च निकालेंगे। विपक्ष ने इसे ‘सेव डेमोक्रेसी मार्च’ का नाम दिया है।

विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं और चुनाव आयोग को इन सवालों का स्पष्ट जवाब देना चाहिए। विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी कर रहे हैं। दूसरी ओर, इन आरोपों को लेकर अंतिम निष्कर्ष किसी स्वतंत्र न्यायिक या संवैधानिक प्रक्रिया से ही निकलेगा। ऐसे में आज का मार्च केवल एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और चुनावी प्रक्रिया को लेकर चल रही बड़ी राजनीतिक लड़ाई का अगला बड़ा अध्याय माना जा रहा है।

संसद से ECI तक करीब 3 किलोमीटर की पदयात्रा

विपक्षी सांसद मंगलवार सुबह करीब 10:30 बजे संसद भवन के मकर द्वार पर जुटेंगे। इसके बाद सुबह 11 बजे संसद से चुनाव आयोग मुख्यालय की ओर मार्च शुरू करने की योजना है। बताया गया है कि करीब 19 विपक्षी दल इस शक्ति प्रदर्शन में हिस्सा लेंगे।

मार्च में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी समेत कई प्रमुख विपक्षी नेता और सांसद शामिल हो सकते हैं।

करीब तीन किलोमीटर की यह पदयात्रा प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। संसद से चुनाव आयोग तक पहुंचने वाला यह मार्च सीधे तौर पर उस संवैधानिक संस्था की ओर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जिसकी जिम्मेदारी देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है।

विपक्ष का सीधा सवाल—मतदाता सूची में आखिर हो क्या रहा है?

विपक्षी दलों ने SIR को लेकर सबसे बड़ा सवाल मतदाता सूची की पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकार को लेकर उठाया है। उनका दावा है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम प्रभावित होने की आशंका है और ऐसे मतदाताओं की जानकारी सार्वजनिक तथा सत्यापन योग्य तरीके से सामने आनी चाहिए।

विपक्ष ने चुनाव आयोग पर मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी और ‘वोट चोरी’ जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि इन आरोपों को लेकर चुनाव आयोग का पक्ष और संबंधित प्रक्रियात्मक जवाब भी महत्वपूर्ण होगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी संस्था पर लगाए गए गंभीर आरोपों की पुष्टि दस्तावेजी और वैधानिक जांच के आधार पर ही हो सकती है।

यही वजह है कि आज का प्रदर्शन केवल राजनीतिक नारों तक सीमित नहीं रहने वाला। विपक्ष अब इसे मतदाता अधिकार, चुनावी पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही के बड़े सवाल से जोड़ रहा है।

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर अड़ा विपक्ष

विपक्षी गठबंधन की मांगों में सबसे प्रमुख नाम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का है। विपक्षी दल उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं।

विपक्ष का तर्क है कि जब चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हों, तब आयोग को राजनीतिक दलों और आम मतदाताओं के सामने हर संदेह का जवाब देना चाहिए। विपक्षी नेताओं का कहना है कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता लोकतंत्र की बुनियादी शर्तों में से एक है और इस पर उठ रहे सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से हटाने या इस्तीफे की मांग का अपना संवैधानिक और कानूनी ढांचा है। इसलिए राजनीतिक मंच से की जा रही मांग और उसके संवैधानिक परिणाम के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना जरूरी होगा।

2 अक्टूबर से जारी है प्रदर्शन, अब सड़क पर बड़ा शक्ति प्रदर्शन

विपक्षी दलों का कहना है कि SIR और चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों को लेकर उनका आंदोलन पहले से जारी है। लेफ्ट दलों से लेकर कांग्रेस तक विभिन्न विपक्षी दल 2 अक्टूबर से लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं।

अब मंगलवार का मार्च इस अभियान को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा राजनीतिक रूप देने की कोशिश है। विपक्ष ने साफ संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे को जल्द छोड़ने के मूड में नहीं है।

30 सितंबर को दिल्ली में हुई ‘INDIA’ गठबंधन की बैठक के बाद ही संसद से चुनाव आयोग तक मार्च का ऐलान किया गया था। यानी यह कार्यक्रम अचानक लिया गया फैसला नहीं, बल्कि विपक्षी रणनीति का हिस्सा है।

AAP और DMK ने बनाई दूरी, विपक्षी एकजुटता पर भी सवाल

हालांकि ‘INDIA’ ब्लॉक के भीतर सब कुछ एकजुट नजर नहीं आ रहा है। आम आदमी पार्टी (AAP) ने इस मार्च से दूरी बनाने का फैसला किया है। पार्टी का कहना है कि वह अपनी लड़ाई अलग तरीके से लड़ रही है।

DMK के भी मार्च में शामिल नहीं होने की जानकारी सामने आई है।

यह दूरी विपक्षी गठबंधन के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। एक तरफ कांग्रेस और उसके सहयोगी दल चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे पर एक बड़ा संयुक्त मोर्चा दिखाना चाहते हैं, वहीं दूसरी तरफ गठबंधन के भीतर ही सभी दल एक मंच पर दिखाई नहीं दे रहे।

ऐसे में आज का मार्च विपक्ष के लिए दोहरी परीक्षा होगा—एक ओर चुनाव आयोग के खिलाफ अपना संदेश मजबूत करना और दूसरी ओर यह दिखाना कि ‘INDIA’ गठबंधन अब भी एक प्रभावी राजनीतिक मंच के रूप में एकजुट है।

जयराम रमेश ने बताया आगे का पूरा प्लान

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने 5 अक्टूबर को बताया कि मंगलवार का मार्च शांतिपूर्ण तरीके से निकाला जाएगा। उन्होंने कहा कि विपक्षी सांसद सुबह 10:30 बजे मकर द्वार पर एकत्र होंगे और सुबह 11 बजे चुनाव आयोग की ओर मार्च करेंगे।

रमेश के मुताबिक यह अभियान केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगा। 8 अक्टूबर तक ‘INDIA’ गठबंधन से जुड़े दल जिला स्तर पर पदयात्राएं आयोजित करेंगे। इसके बाद 10 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक ब्लॉक स्तर पर बैठकें आयोजित करने की योजना है।

इसके बाद 25 अक्टूबर से 25 नवंबर तक राज्य स्तर और जिला स्तर पर कार्यक्रमों के साथ गांवों में चौपाल आयोजित करने की योजना बताई गई है। इस अभियान का राजनीतिक नारा ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रखा गया है।

कांग्रेस का दावा है कि इस अभियान के जरिए ऐसे मतदाताओं की जानकारी जुटाई जाएगी, जिनके नाम मतदाता सूची में नहीं हैं। जयराम रमेश ने ऐसे मतदाताओं की संख्या 13.5 करोड़ बताई है। इस संख्या और इसके आधार को लेकर भी सार्वजनिक स्तर पर स्पष्ट, सत्यापन योग्य आंकड़ों की बहस महत्वपूर्ण होगी।

सवाल सिर्फ SIR का नहीं, भरोसे का है

पूरे विवाद का सबसे बड़ा पहलू यही है कि मामला केवल मतदाता सूची के तकनीकी पुनरीक्षण तक सीमित नहीं रह गया है। यह अब चुनाव प्रक्रिया पर जनता के भरोसे का सवाल बन चुका है।

लोकतंत्र में मतदाता सूची महज सरकारी दस्तावेज नहीं होती। वही सूची तय करती है कि कौन नागरिक अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर पाएगा। इसलिए अगर किसी मतदाता का नाम सूची से हटता है, गलत दर्ज होता है या उसका सत्यापन विवादित होता है, तो उसका सीधा असर उसके संवैधानिक अधिकार पर पड़ सकता है।

लेकिन दूसरी तरफ, मतदाता सूची का पुनरीक्षण भी चुनावी व्यवस्था का स्थापित प्रशासनिक और कानूनी हिस्सा है। इसलिए किसी भी बदलाव को स्वतः ‘वोट चोरी’ या चुनावी धांधली मान लेना भी उचित नहीं होगा। असली कसौटी होगी—प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, आपत्तियों का निपटारा कैसे होता है और प्रभावित मतदाताओं को अपना पक्ष रखने का कितना अवसर मिलता है।

दिल्ली में सुरक्षा कड़ी, कई जगह बैरिकेडिंग

विपक्ष के प्रस्तावित मार्च को देखते हुए दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। संसद मार्ग, चुनाव आयोग कार्यालय और जंतर-मंतर के आसपास पुलिस की तैनाती बढ़ाई गई है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई स्तर की बैरिकेडिंग की गई है।

अब निगाह इस बात पर होगी कि संसद से निकलने वाला यह मार्च चुनाव आयोग तक किस तरह पहुंचता है और क्या विपक्षी नेताओं को आयोग के अधिकारियों से मुलाकात का अवसर मिलता है।

आज की लड़ाई का असली मुद्दा क्या?

मंगलवार का ‘सेव डेमोक्रेसी मार्च’ आने वाले दिनों की विपक्षी राजनीति की दिशा तय कर सकता है। विपक्ष इसे मतदाता अधिकार और लोकतंत्र बचाने की लड़ाई के रूप में पेश कर रहा है। वहीं चुनाव आयोग की ओर से SIR और मतदाता सूची की प्रक्रिया को लेकर दिए जाने वाले जवाब इस पूरे विवाद की अगली दिशा तय करेंगे।

फिलहाल दिल्ली में सियासी तापमान बढ़ चुका है। संसद से चुनाव आयोग तक करीब तीन किलोमीटर की यह पदयात्रा भले ही दूरी में छोटी हो, लेकिन इसके राजनीतिक मायने काफी बड़े हैं।

सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि मतदाता सूची में कितने नाम जुड़े या हटे। बड़ा सवाल यह है कि इस पूरी प्रक्रिया पर देश का मतदाता कितना भरोसा करता है—और उस भरोसे को बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग और राजनीतिक दल, दोनों कितनी पारदर्शिता दिखाते हैं।

आज सड़क पर विपक्ष होगा, सामने चुनाव आयोग होगा और पूरे देश की नजर इस टकराव पर होगी।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल सत्ता का नहीं—मतदाता के वोट के भरोसे का होता है।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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