“केली कुंज आश्रम पर खामोशी क्यों? अलग-अलग राज्यों से बच्चों की तलाश में पहुंच रहे परिजन, आश्रम की सुरक्षा और महाराज की मौजूदगी को लेकर बढ़ी जिज्ञासा”
वृंदावन/मथुरा: वृंदावन की धार्मिक और आध्यात्मिक पहचान के बीच एक संदिग्ध मौत ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब अब सिर्फ श्रद्धालु ही नहीं, बल्कि वे परिवार भी तलाश रहे हैं जो अपने बच्चों और अपनों की जानकारी के लिए मथुरा के आश्रमों का रुख कर रहे हैं। रसिक दुलारी शरण दीपक लोधी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के बाद मामला चर्चा में है और इसके साथ ही केली कुंज आश्रम की भूमिका, वहां की व्यवस्था तथा संत प्रेमानंद महाराज की मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—जब विवादित परिस्थितियों में आश्रम से जुड़े एक शिष्य की मौत हुई, तब संत प्रेमानंद महाराज कहां थे?
दूसरा सवाल—केली कुंज आश्रम से जुड़े इन गंभीर सवालों के बीच उनकी तरफ से सीधे तौर पर सार्वजनिक संवाद क्यों नहीं हुआ?
और तीसरा सवाल—अगर महाराज पिछले कई महीनों से केली कुंज में नहीं, बल्कि यमुना पार स्थित यमुना विहार कुंज में रह रहे थे, तो इस पूरे घटनाक्रम को लेकर वहां की व्यवस्थाओं और जिम्मेदार लोगों से जवाब कौन लेगा?
इन सवालों का जवाब जांच से ही सामने आएगा। लेकिन फिलहाल सवालों का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
सवालों के बीच बढ़ी आश्रम तक पहुंचने की कोशिश
रसिक दुलारी की मौत के बाद इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की गई। कई दिनों तक संत प्रेमानंद महाराज तक पहुंचने और यह जानने का प्रयास किया गया कि आखिर वह इस पूरे घटनाक्रम के समय कहां मौजूद थे।
इसी दौरान जानकारी सामने आई कि महाराज केली कुंज में मौजूद नहीं हैं।
स्थानीय स्तर पर यह दावा सामने आया कि संत प्रेमानंद महाराज पिछले कई महीनों से यमुना नदी के पार स्थित यमुना विहार कुंज, बेलवन में रह रहे हैं।
यानी एक तरफ केली कुंज आश्रम को लेकर सवाल उठ रहे थे और दूसरी तरफ महाराज की मौजूदगी किसी दूसरे आश्रम में बताए जाने की बात सामने आ रही थी।
यहीं से सवाल और गंभीर हो जाता है—क्या केली कुंज की मौजूदा व्यवस्था और वहां होने वाली गतिविधियों से महाराज की प्रत्यक्ष दूरी है? अगर हां, तो उस आश्रम की जिम्मेदारी किसके पास है?
इन सवालों का अंतिम उत्तर जांच और संबंधित पक्षों के आधिकारिक बयान से ही स्पष्ट हो सकता है।
प्रेमानंद महाराज के दो प्रमुख आश्रम, पुराना ठिकाना भी चर्चा में
संत प्रेमानंद महाराज से जुड़े प्रमुख ठिकानों की बात करें तो वृंदावन में उनका एक आश्रम केली कुंज है, जो मथुरा वारघाट और परिक्रमा मार्ग क्षेत्र में स्थित बताया जाता है।
दूसरा प्रमुख आश्रम यमुना पार, बेलवन क्षेत्र में स्थित यमुना विहार कुंज है।
इसके अलावा शुरुआती दौर में रमण रेती स्थित कृष्णम अपार्टमेंट के एक फ्लैट का भी उनके ठिकाने के रूप में उल्लेख किया जाता रहा है।
यही वह स्थान बताया जाता है जहां से कभी रात के समय ढोल-नगाड़ों के साथ उनकी यात्रा निकलने की चर्चा होती थी।
समय के साथ उनके आश्रम और गतिविधियों का दायरा बदला, लेकिन वर्तमान विवाद ने फिर उन पुराने ठिकानों और मौजूदा व्यवस्थाओं को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
जब केली कुंज पहुंचे तो सामने आया सख्त सुरक्षा घेरा
इसी दावे की वास्तविक स्थिति जानने के लिए केली कुंज से जुड़े स्थान पर पहुंचने की कोशिश की गई।
प्रसिद्ध महालक्ष्मी मंदिर के बराबर से एक कच्चा रास्ता आगे जाता दिखाई देता है। इसी रास्ते पर आश्रम से जुड़े कुछ शिष्य मौजूद मिले।
उनसे आश्रम और वहां की वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी लेने की कोशिश की गई।
शिष्यों की ओर से बताया गया कि फिलहाल आश्रम बंद है और आम लोगों को वहां प्रवेश की अनुमति नहीं है।
कैमरा चलाने की अनुमति भी नहीं होने की बात कही गई।
आश्रम के आसपास सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद कड़ी नजर आई। बताया गया कि बिना अनुमति अंदर प्रवेश करना आसान नहीं है। परिसर की निगरानी के लिए हाई-डेफिनिशन कैमरों की मौजूदगी की बात भी सामने आई।
आश्रम महालक्ष्मी मंदिर से करीब 500 मीटर की दूरी पर बताया गया।
यह सुरक्षा व्यवस्था अपने आप में कोई अपराध सिद्ध नहीं करती, लेकिन संदिग्ध मौत के बाद जब आश्रम को लेकर सवाल उठ रहे हों, तब स्वाभाविक रूप से लोगों की जिज्ञासा बढ़ना भी असामान्य नहीं है।
आखिर आश्रम की सुरक्षा इतनी कड़ी क्यों है? वहां प्रवेश की व्यवस्था क्या है? वहां कौन रह सकता है और कौन नहीं?
इन सवालों के जवाब आश्रम प्रबंधन या संबंधित अधिकारियों से मिलना जरूरी है।
रसिक दुलारी की मौत के बाद संदेश: “सांसारिक लीला”
रसिक दुलारी की मौत के बाद संत प्रेमानंद महाराज की ओर से यमुना विहार कुंज आश्रम से एक संदेश जारी किए जाने की बात सामने आई।
इस संदेश में घटना को “सांसारिक लीला” बताते हुए लोगों से इसे छोड़कर अपने भजन में मन लगाने की बात कही गई।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह संदेश अपने स्थान पर हो सकता है, लेकिन घटना की परिस्थितियों को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब आध्यात्मिक संदेश से अलग है।
एक व्यक्ति की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई है और पुलिस मामले की जांच कर रही है। ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण है कि घटना के समय संबंधित व्यक्ति कहां था, उसके संपर्क में कौन लोग थे, आश्रम में उसकी स्थिति क्या थी और मौत की परिस्थितियां वास्तव में क्या थीं।
यही वह हिस्सा है जिसे पुलिस जांच के जरिए स्पष्ट किया जाना बाकी है।
“महाराज पांच महीने से यहीं हैं”—शिष्य का दावा
यमुना विहार कुंज में मौजूद संत प्रेमानंद महाराज के एक शिष्य से कैमरे के बिना बातचीत की गई।
शिष्य ने इस बात की पुष्टि की कि उनके अनुसार प्रेमानंद महाराज पिछले करीब पांच महीनों से बेलवन स्थित यमुना विहार कुंज में मौजूद हैं।
यदि यह दावा सही है तो एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—क्या इस अवधि में महाराज केली कुंज आश्रम में नियमित रूप से मौजूद रहे थे या उनकी भूमिका केवल आध्यात्मिक/प्रशासनिक स्तर तक सीमित थी?
इसका स्पष्ट उत्तर आश्रम प्रबंधन या महाराज की ओर से आधिकारिक तौर पर सामने आना बाकी है।
क्योंकि किसी व्यक्ति की मौजूदगी या अनुपस्थिति से अपने आप किसी घटना की जिम्मेदारी तय नहीं होती। जिम्मेदारी का निर्धारण तथ्य, दस्तावेज, प्रत्यक्षदर्शी बयान और पुलिस जांच के आधार पर ही किया जा सकता है।
बच्चों की तलाश में मथुरा पहुंच रहे परिजन, बढ़ी बेचैनी
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पहलू वे परिवार हैं जो अपने बच्चों या परिजनों की तलाश में मथुरा और वृंदावन के आश्रमों तक पहुंच रहे हैं।
अलग-अलग राज्यों से लोगों के आने की बात सामने आ रही है। ऐसे परिवारों के लिए आश्रम केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि उम्मीद का आखिरी ठिकाना हो सकता है।
अगर किसी परिवार को अपने बच्चे या परिजन की जानकारी नहीं मिल रही है, तो सवाल सिर्फ आश्रम का नहीं रह जाता। मामला पहचान, सुरक्षा, संपर्क, प्रवेश-निकास व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी से भी जुड़ जाता है।
इसलिए जरूरी है कि किसी भी व्यक्ति के संबंध में कोई अपुष्ट दावा फैलाने के बजाय संबंधित परिवारों की शिकायतों को पुलिस और प्रशासन रिकॉर्ड में लेकर उनकी निष्पक्ष जांच करे।
अब जांच के सामने कई अहम सवाल
रसिक दुलारी की संदिग्ध मौत के बाद पुलिस जांच में कई बिंदुओं की पड़ताल महत्वपूर्ण हो सकती है।
मौत से पहले रसिक दुलारी कहां थे?
आखिरी बार उनसे किसने संपर्क किया था?
आश्रम परिसर में उस समय कौन-कौन मौजूद था?
क्या आश्रम के सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित हैं?
मौत से पहले और बाद की गतिविधियों का कोई रिकॉर्ड मौजूद है या नहीं?
परिवार को घटना की जानकारी कब और किस माध्यम से दी गई?
आश्रम में आने-जाने वाले लोगों का कोई रिकॉर्ड रखा जाता है या नहीं?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या इस मौत के पीछे आत्महत्या, दुर्घटना या किसी अन्य परिस्थिति की संभावना है?
इनमें से किसी भी सवाल का जवाब अनुमान के आधार पर नहीं दिया जा सकता। इसके लिए पोस्टमार्टम, फॉरेंसिक जांच, सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल और डिजिटल रिकॉर्ड, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान तथा पुलिस की केस डायरी जैसे प्रमाण महत्वपूर्ण होंगे।
केली कुंज पर खामोशी से बढ़ता सवालों का दबाव
वृंदावन में आध्यात्मिक आस्था रखने वाले हजारों लोगों के लिए प्रेमानंद महाराज एक महत्वपूर्ण धार्मिक व्यक्तित्व हैं। लेकिन किसी भी बड़े धार्मिक या सामाजिक संस्थान से जुड़े विवाद में पारदर्शिता का सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है।
रसिक दुलारी की मौत ने यही सवाल फिर सामने ला दिया है।
अगर घटना से आश्रम का कोई संबंध नहीं है, तो जांच के जरिए यह साफ होना चाहिए।
अगर किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
और अगर लगाए जा रहे सवाल तथ्यहीन हैं, तो संबंधित पक्षों को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
किसी व्यक्ति की धार्मिक प्रतिष्ठा या किसी संस्था की लोकप्रियता जांच का विकल्प नहीं हो सकती।
अब निगाह पुलिस जांच पर
फिलहाल मथुरा पुलिस मामले की जांच में जुटी है। इसलिए किसी व्यक्ति या आश्रम को दोषी ठहराना समय से पहले होगा।
लेकिन जांच के दौरान पारदर्शिता बेहद महत्वपूर्ण होगी।
क्योंकि सवाल सिर्फ रसिक दुलारी की मौत का नहीं है। सवाल यह भी है कि धार्मिक आश्रमों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा और निगरानी की व्यवस्था कैसी है? बाहर से आने वाले लोगों का रिकॉर्ड कैसे रखा जाता है? किसी व्यक्ति के लापता होने या संपर्क से बाहर होने पर आश्रम की जिम्मेदारी क्या होती है? और किसी संदिग्ध घटना के बाद परिवारों को सूचना देने की प्रक्रिया क्या है?
इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है।
वृंदावन की आध्यात्मिक छवि के बीच उठे ये सवाल किसी एक व्यक्ति या आश्रम के खिलाफ निष्कर्ष नहीं हैं—बल्कि एक ऐसी मौत की निष्पक्ष जांच की मांग हैं, जिसका सच सामने आना अभी बाकी है।
और फिलहाल सबसे बड़ा सवाल वहीं खड़ा है—
रसिक दुलारी की मौत का सच क्या है?
केली कुंज में उस समय क्या हो रहा था?
और प्रेमानंद महाराज की भूमिका और मौजूदगी को लेकर उठ रहे सवालों का आधिकारिक जवाब कब सामने आएगा?
इन सवालों का जवाब न आरोपों से मिलेगा, न अटकलों से—जवाब मिलेगा तो सिर्फ निष्पक्ष जांच और सामने आने वाले प्रमाणों से।















