“जंतर-मंतर के प्रदर्शन के बाद उठे गंभीर सवाल—पुलिस और RAF की हर कार्रवाई हो रिकॉर्ड, फुटेज की सुरक्षा से लेकर कोर्ट में सबूत बनने तक तय हो बाध्यकारी SOP”
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन, पुलिस कार्रवाई और भीड़ नियंत्रण को लेकर एक ऐसा कानूनी सवाल दिल्ली हाई कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच गया है, जिसका सीधा संबंध पुलिस की जवाबदेही, प्रदर्शनकारियों के अधिकार और कानून-व्यवस्था में तैनात जवानों की सुरक्षा से है। दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल एक जनहित याचिका (PIL) में केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के लिए भीड़ नियंत्रण और प्रोटेस्ट मैनेजमेंट ड्यूटी के दौरान Body-Worn Cameras (BWCs) को अनिवार्य और लगातार सक्रिय रखने वाला बाध्यकारी Standard Operating Procedure (SOP) बनाने की मांग की गई है।
वकील चाहत राघव की ओर से दाखिल याचिका में केवल कैमरा लगाने की मांग नहीं की गई है, बल्कि उसके साथ जुड़ी पूरी जवाबदेही व्यवस्था तैयार करने की मांग उठाई गई है। इसमें रिकॉर्ड किए गए वीडियो की स्टोरेज, डेटा की अखंडता (Integrity), Retention, Access, Chain of Custody और अदालत में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल तक के लिए स्पष्ट और लागू करने योग्य नियम तय करने की मांग शामिल है।
याचिका का मूल सवाल बेहद सीधा है—जब पुलिस और RAF भीड़ के बीच कानून-व्यवस्था संभाल रहे हों, तब उस कार्रवाई का आधिकारिक और प्रमाणिक रिकॉर्ड कहां है?
जंतर-मंतर के प्रदर्शन ने खोल दी रिकॉर्डिंग व्यवस्था की पोल?
याचिका में जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए विरोध-प्रदर्शनों को इसके पीछे की प्रमुख परिस्थितियों में से एक बताया गया है। इन प्रदर्शनों में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक से जुड़े प्रदर्शन का भी उल्लेख किया गया है।
याचिका के अनुसार, इन घटनाओं के दौरान पुलिस और RAF पर कथित रूप से अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगाए गए, जबकि दूसरी ओर पुलिसकर्मियों पर पथराव, तोड़फोड़ और हमले जैसे आरोप भी सामने आए।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—अगर एक ही घटना में पुलिस कार्रवाई पर भी सवाल हो और प्रदर्शनकारियों की हिंसा पर भी आरोप हों, तो निष्पक्ष सच सामने लाने के लिए सबसे भरोसेमंद रिकॉर्ड क्या होगा?
याचिकाकर्ता का तर्क है कि घटनाओं से संबंधित बड़ी मात्रा में वीडियो कथित तौर पर आसपास मौजूद नागरिकों के मोबाइल फोन से सामने आए। यानी किसी घटना का डिजिटल रिकॉर्ड मुख्य रूप से इत्तेफाक से रिकॉर्ड हुई नागरिक वीडियोग्राफी पर निर्भर रहा।
PIL में इसी स्थिति को संस्थागत जवाबदेही की कमजोरी के रूप में पेश किया गया है।
पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शनकारी—दोनों के लिए कैमरा क्यों जरूरी?
याचिका का तर्क है कि Body-Worn Camera को केवल पुलिस की निगरानी का उपकरण मानना गलत होगा। यह पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों—दोनों के लिए सुरक्षा कवच बन सकता है।
एक ओर कैमरा यह रिकॉर्ड कर सकता है कि पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए क्या कार्रवाई की, कब बल प्रयोग किया और उसके पहले परिस्थितियां क्या थीं। दूसरी ओर उसी रिकॉर्डिंग से उन लोगों की पहचान में मदद मिल सकती है जिन पर पथराव, तोड़फोड़ या पुलिसकर्मियों पर हमले का आरोप हो।
यानी कैमरे के समर्थक तर्क का आधार यह है कि रिकॉर्डिंग किसी एक पक्ष की नहीं, पूरी घटना की होनी चाहिए।
याचिका में कहा गया है कि पुलिस-पब्लिक इंटरैक्शन की निष्पक्ष रिकॉर्डिंग से बैरिकेड के दोनों ओर मौजूद लोगों की सुरक्षा और जवाबदेही मजबूत हो सकती है।
सिर्फ कैमरा खरीदना काफी नहीं, असली सवाल रिकॉर्डिंग के बाद का
PIL का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सिर्फ Body-Worn Camera पहनाने की मांग नहीं, बल्कि फुटेज के साथ क्या होगा, इस पर केंद्रित है।
याचिकाकर्ता का दावा है कि मौजूदा व्यवस्था में रिकॉर्डिंग के रखरखाव, उसकी अखंडता, अधिकृत पहुंच और Chain of Custody को लेकर पर्याप्त स्पष्टता नहीं है।
याचिका में मांग की गई है कि Body-Worn Camera से रिकॉर्ड हुई हर महत्वपूर्ण फुटेज को एक तय और सुरक्षित प्रक्रिया के तहत संरक्षित किया जाए।
इसके लिए याचिका में कई तकनीकी और कानूनी सुरक्षा उपायों का सुझाव दिया गया है, जिनमें—
- फुटेज की Hash Value तैयार करना,
- सुरक्षित सर्वर पर अपलोड की व्यवस्था,
- कैमरा पहनने वाले अधिकारी द्वारा फुटेज में बदलाव की संभावना को रोकना,
- हर एक्सेस और ट्रांसफर का ऑडिटेबल रिकॉर्ड रखना,
- स्पष्ट Chain of Custody बनाना,
- और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63 के अनुरूप आवश्यक प्रमाणन की व्यवस्था शामिल है।
अर्थात सवाल सिर्फ यह नहीं कि कैमरा ऑन था या नहीं, बल्कि यह भी कि जो वीडियो रिकॉर्ड हुआ, क्या अदालत तक पहुंचते-पहुंचते वह भरोसेमंद और प्रमाणिक बना रहा?
2020 की एडवाइजरी पर भी उठे सवाल
याचिका में 2020 की Body-Worn Camera संबंधी एडवाइजरी का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह व्यवस्था मुख्य रूप से सलाहकारी प्रकृति की थी और इसमें कथित तौर पर कई महत्वपूर्ण बाध्यकारी सुरक्षा प्रावधानों का अभाव था।
PIL के अनुसार, केवल कैमरा उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। यह भी तय होना चाहिए कि—
कैमरा कब ऑन होगा?
कौन उसे बंद कर सकता है?
रिकॉर्डिंग कब सुरक्षित की जाएगी?
फुटेज कितने समय तक रखी जाएगी?
कौन उसे देख सकता है?
किस स्थिति में उसे डिलीट किया जा सकता है?
और अगर अधिकारी नियमों के विपरीत कैमरा बंद कर दे तो उसकी जवाबदेही कैसे तय होगी?
याचिका का दावा है कि इन सवालों के स्पष्ट और बाध्यकारी जवाब के बिना Body-Worn Camera व्यवस्था का उद्देश्य अधूरा रह सकता है।
22 जुलाई के आदेश ने भी बढ़ाई अहमियत
PIL में 22 जुलाई के एक आदेश का हवाला दिया गया है, जिसमें CCTV फुटेज और वीडियोग्राफी सहित उपलब्ध आवश्यक रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने का निर्देश दिए जाने का उल्लेख है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि अदालत द्वारा रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की जरूरत पर जोर दिए जाने से यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं का आधिकारिक, व्यवस्थित और प्रमाणिक रिकॉर्ड पहले से ही क्यों न तैयार किया जाए।
अगर किसी गंभीर घटना के बाद अदालत को रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश देना पड़े, तो क्या कानून-व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों के पास पहले से ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए, जिससे महत्वपूर्ण वीडियो साक्ष्य स्वतः संरक्षित हो जाएं?
यही वह बिंदु है जहां PIL एक व्यापक संस्थागत सुधार की मांग में बदल जाती है।
PIL में उठाया गया संवैधानिक सवाल
याचिका में Body-Worn Camera व्यवस्था की कमी को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b) और 21 के तहत नागरिकों को प्राप्त मौलिक अधिकारों के संदर्भ में भी उठाया गया है।
अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण और बिना हथियार सभा करने के अधिकार से संबंधित है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस और नागरिकों के बीच होने वाली कार्रवाई का प्रमाणिक रिकॉर्ड होना जरूरी है, ताकि विरोध के अधिकार की रक्षा भी हो और कानून तोड़ने वालों पर कार्रवाई के लिए ठोस साक्ष्य भी उपलब्ध हो।
यानी प्रस्तावित व्यवस्था का दावा यह नहीं है कि पुलिस को भीड़ नियंत्रण से रोका जाए। इसके उलट तर्क यह है कि कानून लागू करने की कार्रवाई भी उतनी ही पारदर्शी होनी चाहिए जितना नागरिकों का आचरण जांच के दायरे में आता है।
दिल्ली पुलिस ने कैमरे खरीदे, लेकिन सवाल SOP का
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि दिल्ली पुलिस द्वारा Body-Worn Cameras की खरीद या खरीद के प्रयास किए गए थे, लेकिन भीड़ नियंत्रण और प्रदर्शन प्रबंधन के दौरान इनके इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाला विशिष्ट और बाध्यकारी नियामक ढांचा पर्याप्त रूप से मौजूद नहीं था।
यदि कैमरे उपलब्ध हैं लेकिन उनके इस्तेमाल के नियम स्पष्ट नहीं हैं, तो व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ही कमजोर हो सकता है।
क्योंकि किसी भी Body-Worn Camera सिस्टम की विश्वसनीयता केवल उसके हार्डवेयर पर निर्भर नहीं करती। उसकी असली ताकत इस बात में है कि रिकॉर्डिंग शुरू होने से लेकर अदालत में पेश होने तक उसकी पूरी डिजिटल यात्रा कितनी सुरक्षित और पारदर्शी रही।
पुलिस के खिलाफ सबूत हो या प्रदर्शनकारी के खिलाफ—फुटेज निष्पक्ष हो
इस PIL का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि Body-Worn Camera को केवल पुलिस पर निगरानी के उपकरण के रूप में नहीं देखा जा रहा।
यदि किसी प्रदर्शन के दौरान पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगता है, तो वही फुटेज पुलिस के पक्ष में भी तथ्य सामने ला सकती है। यदि किसी प्रदर्शनकारी पर हिंसा, पथराव या तोड़फोड़ का आरोप लगता है, तो रिकॉर्डिंग उसके खिलाफ भी महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकती है।
इसलिए मूल मांग का सार यही है कि सच किसी मोबाइल फोन के कैमरे की किस्मत पर निर्भर न रहे।
राज्य के पास आधुनिक कानून-व्यवस्था उपकरण हैं तो उसके पास आधुनिक और विश्वसनीय रिकॉर्डिंग व्यवस्था भी होनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल: कैमरा ऑन रहेगा या जवाबदेही ऑफ?
दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल यह PIL एक व्यापक बहस को जन्म देती है—क्या आधुनिक पुलिसिंग में Body-Worn Camera सुविधा है या जवाबदेही की अनिवार्य शर्त?
याचिकाकर्ता का स्पष्ट तर्क है कि जंतर-मंतर जैसी घटनाएं दिखाती हैं कि केवल वैकल्पिक या सलाहकारी Body-Worn Camera व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। भीड़ नियंत्रण और विरोध-प्रदर्शन जैसी संवेदनशील ड्यूटी में एक ऐसी बाध्यकारी प्रणाली जरूरी है जिसमें रिकॉर्डिंग, डेटा सुरक्षा, Retention और Chain of Custody के नियम पहले से निर्धारित हों।
मांग यह है कि केंद्र, दिल्ली पुलिस और RAF के लिए ऐसा Binding SOP बनाया जाए, जिसमें भीड़ नियंत्रण और प्रोटेस्ट मैनेजमेंट ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों के लिए Body-Worn Camera का इस्तेमाल अनिवार्य हो और रिकॉर्डिंग को मनमाने तरीके से बंद करने की गुंजाइश न रहे।
कानूनी तौर पर यह मामला अभी याचिका में उठाए गए दावों और मांगी गई राहत के स्तर पर है। अंतिम फैसला अदालत के समक्ष प्रस्तुत रिकॉर्ड, सरकार और संबंधित एजेंसियों के जवाब तथा न्यायिक विचार-विमर्श के बाद ही होगा।
लेकिन सवाल बेहद गंभीर है—
जब सड़क पर पुलिस और जनता आमने-सामने हों, तो इतिहास किसके कैमरे से लिखा जाएगा?
अगर रिकॉर्डिंग किसी राहगीर के मोबाइल फोन पर निर्भर रहेगी, तो सच भी संयोग पर निर्भर रहेगा।
और अगर राज्य के पास कैमरा है, लेकिन उसके इस्तेमाल, संरक्षण और जवाबदेही के लिए बाध्यकारी नियम नहीं हैं, तो सवाल सिर्फ फुटेज का नहीं—पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता का है।
अब निगाह दिल्ली हाई कोर्ट पर है कि क्या राजधानी की भीड़-नियंत्रण व्यवस्था को एक ऐसे बाध्यकारी Body-Worn Camera फ्रेमवर्क की दिशा मिलेगी, जिसमें पुलिस की ताकत और नागरिकों के अधिकार—दोनों कैमरे के सामने समान रूप से जवाबदेह हों।















