नई दिल्ली: दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार को भरभराकर गिरी पांच मंजिला इमारत ने राजधानी की निर्माण व्यवस्था, सुरक्षा मानकों और सरकारी निगरानी पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे में अब तक सात लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। हादसे के बाद जांच का दायरा लगातार बढ़ रहा है और अब कार्रवाई की गाज उन अधिकारियों पर भी गिरी है, जिनके जिम्मे इलाके की इमारतों की निगरानी और भवन नियमों के पालन की जिम्मेदारी थी।
हादसे के बाद फरार चल रहे पेइंग गेस्ट अकोमोडेशन के मालिक हरिराम बंसल को पुलिस ने राजस्थान के भिवाड़ी से हिरासत में ले लिया है। पुलिस उससे पूछताछ कर रही है और हादसे से जुड़े तमाम पहलुओं की जांच की जा रही है। इससे पहले उसके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर भी जारी किया गया था।
वहीं, दिल्ली नगर निगम (MCD) ने मामले को गंभीरता से लेते हुए साउथ जोन के डिप्टी कमिश्नर राकेश कुमार समेत पांच अधिकारियों को निलंबित कर दिया है। अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई पूरी होने तक यह निलंबन प्रभावी रहेगा।
MCD के पांच अफसरों पर कार्रवाई
PTI को मिले आदेश की प्रति के मुताबिक निलंबित किए गए अधिकारियों में साउथ जोन के सुपरिटेंडिंग इंजीनियर रणवीर सिंह, एग्जीक्यूटिव इंजीनियर (बिल्डिंग) ललित कुमार गोयल, असिस्टेंट इंजीनियर (बिल्डिंग) सुनील चौहान और जूनियर इंजीनियर (बिल्डिंग) आशीष कुमार शामिल हैं।
इन अधिकारियों पर कार्रवाई उस सवाल के बीच हुई है कि आखिर वर्षों पुरानी इमारत में चल रहे PG और हॉस्टल जैसे व्यावसायिक इस्तेमाल की निगरानी किस स्तर पर की जा रही थी। क्या भवन की स्थिति की नियमित जांच हुई थी? क्या इमारत में किसी तरह के अवैध निर्माण या नियमों के उल्लंघन की जानकारी निगम अधिकारियों को थी? और यदि थी, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
हादसे के बाद इन सवालों के जवाब तलाशना जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
दशकों पुरानी इमारत बनी मौत का मलबा
सत्य निकेतन की यह इमारत कई दशक पुरानी बताई जा रही है। पांच मंजिला इस भवन में लड़कों के रहने के लिए PG/हॉस्टल संचालित हो रहा था। रविवार को अचानक इमारत का एक बड़ा हिस्सा ढह गया और देखते ही देखते पूरा परिसर मलबे में तब्दील हो गया।
हादसे के वक्त अंदर मौजूद लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। मलबे में दबे लोगों को निकालने के लिए तत्काल राहत और बचाव अभियान शुरू किया गया। दूसरे दिन तक कुल 12 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला जा चुका था, लेकिन इस अभियान के दौरान सात लोगों की मौत की पुष्टि हुई।
रेस्क्यू टीमों ने मलबे के एक-एक हिस्से को सावधानी से हटाकर अंदर फंसे लोगों की तलाश की। हादसे की भयावहता ने इलाके के लोगों को भी झकझोर कर रख दिया।
हादसे के बाद जागा सिस्टम, अब जांच के घेरे में निगरानी तंत्र
सत्य निकेतन की घटना सिर्फ एक इमारत के गिरने का मामला नहीं है। यह राजधानी में पुराने भवनों की सुरक्षा, अवैध निर्माण, भवनों के बदलते उपयोग और सरकारी निरीक्षण की व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल है।
अक्सर पुरानी और जर्जर इमारतों में बिना पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम के बड़ी संख्या में लोगों को ठहराया जाता है। ऐसे भवनों में आग से बचाव, आपातकालीन निकास, संरचनात्मक मजबूती और अधिक क्षमता में लोगों के रहने जैसे कई पहलू बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।
ऐसे में जांच का एक अहम हिस्सा यह भी होगा कि क्या संबंधित विभागों के अधिकारियों ने इमारत का निरीक्षण किया था और यदि किया था तो उनकी रिपोर्ट में क्या पाया गया था।
1959 के नियमों के तहत निलंबन
MCD की ओर से जारी निलंबन आदेश DMC Service (Control and Appeal) Regulations, 1959 के तहत नागरिक निकाय के आयुक्त के निर्देश पर जारी किए गए हैं। दिल्ली नगर निगम के विजिलेंस विभाग ने अधिकारियों के खिलाफ यह कार्रवाई की है।
आदेश में कहा गया है कि संबंधित अधिकारियों को रेगुलेशन 5(2) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है। निलंबन अवधि के दौरान अधिकारी नियमों के तहत निर्धारित गुजारा भत्ता पाने के हकदार होंगे।
निलंबन आदेशों पर डिप्टी लॉ ऑफिसर (विजिलेंस) नंद किशोर ने हस्ताक्षर किए हैं।
यह कार्रवाई फिलहाल जांच पूरी होने तक की गई है। इसका अंतिम दोष निर्धारण जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा।
मालिक के खिलाफ FIR, गंभीर धाराओं में जांच
दिल्ली पुलिस ने बिल्डिंग गिरने के मामले में हरिराम बंसल और अन्य के खिलाफ FIR दर्ज की है। पुलिस ने मामले में गैर-इरादतन हत्या, संरचना के रखरखाव में लापरवाही और लोगों की सुरक्षा को खतरे में डालने से जुड़े आरोपों के तहत जांच शुरू की है।
मालिक के फरार होने के बाद पुलिस ने उसकी तलाश तेज कर दी थी और उसके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी किया गया था। अब भिवाड़ी से हिरासत में लिए जाने के बाद पुलिस उसके बयान दर्ज कर सकती है और यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि इमारत की हालत के बारे में उसे क्या जानकारी थी।
जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश करेंगी कि भवन में कितने लोग रह रहे थे, भवन का वास्तविक इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए स्वीकृत था और क्या उसमें किसी तरह का अतिरिक्त निर्माण या बदलाव किया गया था।
सबसे बड़ा सवाल—हादसे से पहले निगरानी कहां थी?
सत्य निकेतन हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर इमारत इतनी पुरानी थी और उसमें बड़ी संख्या में लोग रह रहे थे, तो उसकी सुरक्षा जांच पहले क्यों नहीं हुई?
हर हादसे के बाद सरकारी विभाग सक्रिय होते हैं, निलंबन होते हैं, FIR दर्ज होती है और जांच के आदेश दिए जाते हैं। लेकिन असली सवाल हादसे के बाद की कार्रवाई से ज्यादा हादसे से पहले की निगरानी का है।
क्या राजधानी में पुराने और जर्जर भवनों की नियमित सूची तैयार की जाती है? क्या PG और हॉस्टल में बदल चुकी आवासीय इमारतों की संरचनात्मक सुरक्षा की जांच होती है? क्या नियमों का उल्लंघन मिलने पर समय रहते नोटिस और कार्रवाई होती है?
यदि इन सवालों के जवाब व्यवस्था के पक्ष में नहीं हैं, तो सत्य निकेतन जैसी घटनाएं महज दुर्घटना नहीं बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम बन सकती हैं।
अब जांच बताएगी—गलती कहां हुई?
फिलहाल पुलिस और नगर निगम दोनों स्तर पर जांच जारी है। एक तरफ पुलिस मालिक और अन्य आरोपियों की भूमिका की जांच कर रही है, वहीं MCD के निलंबित अधिकारियों की जवाबदेही भी जांच के दायरे में है।
सवाल सिर्फ सात लोगों की मौत का नहीं है। सवाल यह है कि क्या इस हादसे से पहले ऐसे किसी खतरे को पहचाना जा सकता था और क्या समय रहते सात जिंदगियां बचाई जा सकती थीं।
सत्य निकेतन की ढही हुई इमारत के मलबे में सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं दबे हैं—उसके साथ राजधानी की निगरानी व्यवस्था पर उठे कई सवाल भी दबे हैं। अब जांच की जिम्मेदारी है कि उन सवालों के जवाब सामने आएं और यह तय हो कि हादसा महज किस्मत का खेल था या किसी की लापरवाही का नतीजा।














