महाराष्ट्र के GMCH और मेयो अस्पताल को तत्काल कार्रवाई के निर्देश, गुणवत्ता परीक्षण में फेल हुए दो दवा बैच | 1 लाख से अधिक टेल्मिसर्टन और करीब 25 हजार पैरासिटामोल टैबलेट की सप्लाई पर उठे सवाल
नागपुर। महाराष्ट्र में सरकारी अस्पतालों में मरीजों को उपलब्ध कराई जा रही दवाओं की गुणवत्ता को लेकर गंभीर मामला सामने आया है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने गुणवत्ता परीक्षण में निर्धारित मानकों पर खरी नहीं उतरने के बाद पैरासिटामोल 500 मिलीग्राम और टेल्मिसर्टन 40 मिलीग्राम की कुछ दवाओं का वितरण तत्काल रोकने और उपलब्ध स्टॉक वापस लेने के निर्देश दिए हैं। इन दवाओं की सप्लाई नागपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (GMCH) और इंदिरा गांधी सरकारी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (मेयो) में की गई थी।
FDA की जांच में दोनों दवाओं के संबंधित बैच गुणवत्ता परीक्षण में विफल पाए गए। इनमें हाई ब्लड प्रेशर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली टेल्मिसर्टन की एक लाख से अधिक गोलियां और दर्द व बुखार के उपचार में इस्तेमाल होने वाली करीब 25 हजार पैरासिटामोल टैबलेट शामिल हैं। मामला सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन ने संबंधित दवाओं का वितरण रोक दिया है और स्टॉक वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
FDA अधिकारियों के मुताबिक, दोनों दवाओं का निर्माण इंदौर स्थित क्यूरेजा हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड ने किया था। अगस्त में FDA की टीम ने मेयो अस्पताल से संबंधित दवाओं के नमूने लिए थे। इन नमूनों की जांच के बाद 10 सितंबर को जारी परीक्षण रिपोर्ट में दवाओं को निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया।
पैरासिटामोल के रंग में दिखा बदलाव, टेल्मिसर्टन भी गुणवत्ता जांच में फेल
FDA की परीक्षण रिपोर्ट में पैरासिटामोल 500 मिलीग्राम की गोलियों को लेकर खास तौर पर उल्लेख किया गया है कि फार्माकोलॉजिकल असेसमेंट के दौरान टैबलेट के रंग में हल्का बदलाव देखा गया। हालांकि रिपोर्ट के मुताबिक बाकी स्टॉक सामान्य दिखाई दे रहा था, लेकिन संबंधित बैच गुणवत्ता परीक्षण में निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरा।
पैरासिटामोल की ये गोलियां ‘पैरासेव 500’ नाम से बाजार और सरकारी सप्लाई में थीं। इनका बैच नंबर PTTC-108 बताया गया है। FDA की रिपोर्ट सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन ने इस बैच की दवाओं के इस्तेमाल और वितरण को रोकने के निर्देश जारी किए।
दूसरी ओर, हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल होने वाली टेल्मिसर्टन 40 मिलीग्राम की गोलियां भी गुणवत्ता परीक्षण में विफल पाई गईं। इनका बैच नंबर CHPLT 416 है। FDA के अनुसार, इस बैच की दवाएं भी निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं थीं।
जुलाई में हुई थी पैरासिटामोल की सप्लाई, 25 हजार टैबलेट वापस
GMCH प्रशासन के मुताबिक, जुलाई में अस्पताल को करीब 25,000 पैरासिटामोल 500 मिलीग्राम टैबलेट की सप्लाई की गई थी। FDA की रिपोर्ट मिलने के बाद संबंधित स्टॉक को वापस मंगा लिया गया है। अस्पताल के अधिकारियों ने कहा कि FDA का पत्र प्राप्त होते ही आवश्यक कार्रवाई शुरू कर दी गई थी।
इस मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि सरकारी अस्पतालों में आने वाली दवाओं का इस्तेमाल बड़ी संख्या में मरीजों के इलाज में होता है। अस्पतालों के वार्डों के अलावा आउटपेशेंट डिपार्टमेंट यानी ओपीडी में आने वाले मरीजों को भी सरकारी स्टॉक से दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
GMCH और मेयो अस्पतालों में पैरासेव 500 की एक लाख से अधिक टैबलेट की खरीद किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। ऐसे में संबंधित बैच की दवाओं की उपलब्धता और इस्तेमाल की पूरी जानकारी जुटाई जा रही है।
वार्ड और ओपीडी में दवा बांटने पर रोक
FDA की रिपोर्ट के बाद GMCH के फार्माकोलॉजी विभाग ने अस्पताल के विभिन्न वार्डों और आउटपेशेंट डिपार्टमेंट को निर्देश जारी किए हैं। संबंधित बैच की दवाओं का वितरण तत्काल बंद करने और उपलब्ध स्टॉक को वापस करने को कहा गया है।
अस्पताल प्रशासन का कहना है कि FDA के निर्देश मिलते ही संबंधित दवाओं की पहचान कर उनका वितरण रोक दिया गया। इसके साथ ही स्टॉक को अलग रखने और वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की गई।
अस्पतालों में दवाओं की नियमित गुणवत्ता जांच की व्यवस्था पहले से मौजूद है। इसी प्रक्रिया के तहत अगस्त में नमूने लिए गए थे। परीक्षण रिपोर्ट आने के बाद संबंधित बैच की दवाओं को लेकर यह कार्रवाई की गई।
FDA ने मेयो प्रशासन को भेजा अलग नोटिस
दवाओं की गुणवत्ता पर कार्रवाई के साथ ही FDA ने मेयो अस्पताल प्रशासन को अलग से नोटिस भी जारी किया है। यह नोटिस ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत जारी किया गया है।
नोटिस में अस्पताल प्रशासन से दवाओं की खरीद, बिक्री और वितरण से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध कराने को कहा गया है। FDA अब यह जांच करेगा कि संबंधित दवाएं किस प्रक्रिया के तहत खरीदी गईं, उनकी सप्लाई चेन क्या थी और अस्पताल तक पहुंचने के बाद उनका वितरण किस तरह किया गया।
इसके अलावा संबंधित निर्माता कंपनी की ओर से नियमों के पालन और दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया की भी जांच की जाएगी।
FDA अधिकारियों के अनुसार, जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह पता लगाना है कि खराब पाए गए बैच की दवाएं किन-किन स्थानों तक सप्लाई की गई थीं और उनका कितना स्टॉक अभी उपलब्ध है। इसी आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
FDA: सरकारी अस्पतालों में दवाओं की नियमित टेस्टिंग होती है
FDA के असिस्टेंट कमिश्नर मनीष चौधरी ने कहा कि सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध कराई जाने वाली दवाओं की नियमित रूप से गुणवत्ता जांच की जाती है। इसी प्रक्रिया के तहत अगस्त में पैरासिटामोल और टेल्मिसर्टन के नमूने लिए गए थे।
उनके अनुसार, परीक्षण रिपोर्ट में दोनों दवाएं निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं पाई गईं। इसके बाद संबंधित अस्पतालों को दवाओं का वितरण रोकने और उपलब्ध स्टॉक वापस लेने के निर्देश दिए गए।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि FDA की कार्रवाई का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीजों को केवल निर्धारित गुणवत्ता मानकों को पूरा करने वाली दवाएं ही उपलब्ध हों।
अब सप्लाई चेन से निर्माता तक होगी जांच
मामले में अब FDA का फोकस केवल अस्पताल में मौजूद दवाओं को वापस लेने तक सीमित नहीं है। अधिकारियों के मुताबिक, संबंधित दवाओं की पूरी सप्लाई चेन की जांच की जाएगी। इसमें निर्माता कंपनी से लेकर सरकारी अस्पताल तक दवाओं के पहुंचने की प्रक्रिया और उससे जुड़े दस्तावेजों की जांच शामिल होगी।
FDA यह भी देखेगा कि दवा निर्माण, गुणवत्ता नियंत्रण, सप्लाई और अस्पतालों में वितरण के दौरान संबंधित नियमों का पालन हुआ था या नहीं।
खास बात यह है कि दोनों दवाओं के नमूने अस्पताल से लिए गए थे और उनकी गुणवत्ता जांच के बाद रिपोर्ट सामने आई। इससे सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में दवाओं की खरीद और गुणवत्ता नियंत्रण की प्रक्रिया पर भी ध्यान केंद्रित हुआ है।
मरीजों की सुरक्षा को लेकर अस्पताल प्रशासन सतर्क
सरकारी अस्पतालों में पैरासिटामोल और टेल्मिसर्टन जैसी आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली दवाओं की बड़ी मात्रा में सप्लाई होती है। पैरासिटामोल का इस्तेमाल मुख्य रूप से दर्द और बुखार जैसी सामान्य समस्याओं के उपचार में किया जाता है, जबकि टेल्मिसर्टन का उपयोग हाई ब्लड प्रेशर के इलाज में किया जाता है।
ऐसे में संबंधित बैच की दवाओं के गुणवत्ता परीक्षण में विफल होने के बाद अस्पताल प्रशासन ने वितरण रोकने और स्टॉक वापस लेने की कार्रवाई की है।
अस्पताल प्रशासन के सामने अब यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि संबंधित बैच की कोई भी दवा मरीजों तक न पहुंचे। साथ ही FDA की जांच के दौरान मांगे गए दस्तावेज उपलब्ध कराना और स्टॉक की पूरी जानकारी देना भी महत्वपूर्ण होगा।
बड़ी सप्लाई के कारण बढ़ी जांच की अहमियत
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू संबंधित दवाओं की सप्लाई की मात्रा है। एक तरफ टेल्मिसर्टन की एक लाख से अधिक गोलियों की सप्लाई का मामला है, वहीं दूसरी ओर करीब 25 हजार पैरासिटामोल टैबलेट भी अस्पतालों तक पहुंची थीं।
यानी गुणवत्ता परीक्षण में सामने आई खामी केवल सीमित संख्या में दवाओं तक नहीं थी, बल्कि संबंधित बैच की बड़ी मात्रा सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंच चुकी थी। यही वजह है कि FDA ने तत्काल वितरण रोकने और स्टॉक वापस लेने के निर्देश दिए हैं।
अब जांच के जरिए यह स्पष्ट किया जाएगा कि संबंधित बैच की कितनी दवाएं इस्तेमाल हो चुकी थीं, कितनी दवाएं अस्पतालों में बची थीं और क्या यही बैच अन्य सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों तक भी पहुंचा था।
FDA की कार्रवाई के बाद तीन बड़े सवाल
इस मामले के सामने आने के बाद सरकारी दवा सप्लाई व्यवस्था को लेकर तीन अहम सवाल उठ रहे हैं—पहला, गुणवत्ता परीक्षण से पहले इतनी बड़ी मात्रा में दवाएं अस्पतालों तक कैसे पहुंचीं? दूसरा, संबंधित बैच की दवाएं और किन सरकारी संस्थानों को सप्लाई की गई थीं? और तीसरा, निर्माता कंपनी और सप्लाई चेन में गुणवत्ता मानकों के पालन की निगरानी किस स्तर पर हुई?
इन सवालों के जवाब FDA की आगे की जांच और संबंधित दस्तावेजों की समीक्षा के बाद सामने आने की उम्मीद है।
फिलहाल FDA ने संबंधित दवाओं का वितरण रोकने, उपलब्ध स्टॉक वापस लेने और खरीद एवं वितरण से जुड़े दस्तावेज जमा कराने के निर्देश दिए हैं। अस्पताल प्रशासन ने भी कार्रवाई शुरू कर दी है। अब निगाह इस बात पर है कि जांच में निर्माता कंपनी और सप्लाई चेन के स्तर पर क्या तथ्य सामने आते हैं और गुणवत्ता मानकों में कमी के लिए जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है।















