Thursday, August 20, 2026
Your Dream Technologies
HomeDelhi NCRचीनी के दाम पर केजरीवाल का वार: इथेनॉल नीति को बताया महंगाई...

चीनी के दाम पर केजरीवाल का वार: इथेनॉल नीति को बताया महंगाई की जड़, बोले—‘विदेशी मुद्रा बचाने चले थे, अब चीनी आयात पर खर्च करेंगे’

नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने देश में चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। केजरीवाल ने आरोप लगाया कि गन्ने को इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने के सरकार के फैसले का सीधा असर चीनी के उत्पादन पर पड़ा है और इसी वजह से बाजार में चीनी की कीमतों में अचानक भारी उछाल आया है। उन्होंने दावा किया कि महज 17 दिनों में चीनी के दाम करीब 20 रुपये प्रति किलो बढ़ गए हैं।

गुरुवार को जारी एक वीडियो संदेश में केजरीवाल ने केंद्र की इथेनॉल नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की नीति को बढ़ावा देते हुए गन्ने के एक बड़े हिस्से को चीनी उत्पादन से हटाकर इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल करने की दिशा में बढ़ाया। सरकार की ओर से इसका तर्क यह दिया गया था कि इथेनॉल के इस्तेमाल से पेट्रोल की खपत और कच्चे तेल के आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा में कमी आएगी।

लेकिन केजरीवाल का आरोप है कि इस नीति का दूसरा पहलू सरकार ने नजरअंदाज कर दिया। उनका कहना है कि जब गन्ने की उपलब्धता का एक हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में चला गया तो चीनी उत्पादन प्रभावित हुआ और अब बाजार में इसकी कमी का असर आम उपभोक्ता की जेब पर दिखाई दे रहा है।

‘17 दिनों में 46 से 65 रुपये किलो हुई चीनी’

केजरीवाल ने अपने वीडियो में दावा किया कि करीब 17 दिन पहले चीनी की कीमत लगभग 46 रुपये प्रति किलो थी, जो अब बढ़कर करीब 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। उन्होंने इस तेजी को सरकार की नीतियों का परिणाम बताते हुए कहा कि खाद्य वस्तुओं की कीमत में इतनी तेज वृद्धि सीधे तौर पर आम परिवार के घरेलू बजट को प्रभावित करती है।

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि देश में चीनी का पर्याप्त उत्पादन नहीं रहेगा तो घरेलू मांग पूरी करने के लिए सरकार को दूसरे देशों से चीनी मंगानी पड़ेगी। उनके मुताबिक, यही स्थिति अब बनती दिखाई दे रही है।

केजरीवाल ने कहा कि भारत कभी चीनी का निर्यात करने वाले देशों में शामिल था, लेकिन अब चीनी आयात करने की स्थिति पर पहुंच रहा है। उन्होंने सरकार की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस विदेशी मुद्रा को तेल के आयात पर खर्च होने से बचाने के लिए इथेनॉल को बढ़ावा दिया गया, वही विदेशी मुद्रा अब चीनी के आयात में खर्च करनी पड़ सकती है।

‘तेल बचाने की कोशिश, लेकिन चीनी महंगी’

अरविंद केजरीवाल ने इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि इथेनॉल मिश्रण से वाहनों की माइलेज पर असर पड़ रहा है और लोगों को महंगे पेट्रोल के साथ कम माइलेज की दोहरी मार झेलनी पड़ रही है।

केजरीवाल ने कहा कि एक तरफ सरकार इथेनॉल को पेट्रोल में मिलाकर विदेशी मुद्रा बचाने की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ चीनी की कीमतों में वृद्धि के कारण आम लोगों को महंगी चीनी खरीदनी पड़ रही है। उन्होंने इसे सरकार की नीति में संतुलन की कमी बताते हुए पूछा कि किसी भी फैसले का व्यापक असर देखने से पहले उसके संभावित परिणामों पर विचार क्यों नहीं किया गया।

उनका तर्क है कि गन्ने का इस्तेमाल केवल एक उत्पाद के लिए नहीं होता। गन्ना चीनी उद्योग के लिए भी महत्वपूर्ण कच्चा माल है और यदि उसका बड़ा हिस्सा दूसरे उत्पादों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा तो चीनी उत्पादन पर असर पड़ना स्वाभाविक है।

‘जब गन्ना इथेनॉल में जाएगा तो चीनी कहां से आएगी?’

केजरीवाल ने केंद्र सरकार पर सवालों की बौछार करते हुए कहा कि जब गन्ने को इथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट करने का निर्णय लिया गया था, तब यह सोचना चाहिए था कि देश की चीनी की जरूरत कैसे पूरी होगी।

उन्होंने सवाल किया, “जब इतना गन्ना इथेनॉल में जाएगा तो चीनी कहां से आएगी?”

इसी संदर्भ में उन्होंने मोदी सरकार की नीतियों पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार के फैसलों में जमीनी स्तर की समस्याओं और उनके संभावित परिणामों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है।

केजरीवाल ने आरोप लगाया कि सरकार के कई फैसलों का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ा है। उन्होंने नोटबंदी और कोरोना महामारी के दौरान सरकार की नीतियों का भी जिक्र किया और कहा कि इन फैसलों से जनता को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

नोटबंदी से कोरोना तक, पुराने फैसलों का भी किया जिक्र

अपने बयान में केजरीवाल ने नोटबंदी का जिक्र करते हुए दावा किया कि उस दौरान देशभर में लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और कई लोगों की मौत हुई। इसके बाद कोरोना महामारी के समय सरकार की तैयारियों और प्राथमिकताओं पर भी उन्होंने सवाल उठाए।

उन्होंने आरोप लगाया कि कोरोना संकट के दौरान लोगों को चिकित्सा सुविधाएं और ऑक्सीजन उपलब्ध कराने की जरूरत थी, लेकिन सरकार की ओर से थाली बजाने जैसे अभियानों पर जोर दिया गया। केजरीवाल ने इन उदाहरणों के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की कि केंद्र सरकार के फैसलों का मूल्यांकन केवल घोषणा के समय नहीं, बल्कि उनके वास्तविक परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए।

हालांकि, चीनी की कीमतों में हालिया वृद्धि को लेकर केजरीवाल द्वारा लगाए गए आरोपों के बीच यह भी महत्वपूर्ण है कि चीनी की कीमतें केवल गन्ने के इस्तेमाल और इथेनॉल उत्पादन से ही तय नहीं होतीं। उत्पादन, स्टॉक, घरेलू मांग, निर्यात-आयात नीति, मौसम, चीनी मिलों की स्थिति और सरकारी नीतियां भी कीमतों को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए कीमतों में तेजी के कारणों का आकलन व्यापक आंकड़ों के आधार पर ही किया जा सकता है।

इथेनॉल नीति पर फिर गरमाई सियासत

चीनी की कीमतों को लेकर केजरीवाल का ताजा बयान ऐसे समय आया है जब पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण को लेकर केंद्र की नीति लंबे समय से राजनीतिक और आर्थिक बहस का विषय रही है। सरकार इथेनॉल मिश्रण को कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने और किसानों के लिए गन्ने तथा अन्य फीडस्टॉक से अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराने के उपाय के रूप में प्रस्तुत करती रही है।

दूसरी ओर, केजरीवाल का आरोप है कि नीति बनाते समय इसके दूसरे आर्थिक प्रभावों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। उनके मुताबिक, यदि गन्ने का इस्तेमाल इथेनॉल उत्पादन में बढ़ेगा और चीनी का उत्पादन अपेक्षा के अनुरूप नहीं होगा तो अंततः उपभोक्ता को महंगी चीनी खरीदनी पड़ेगी।

यही वह बिंदु है जहां से राजनीतिक बहस तेज होती दिखाई दे रही है—क्या ऊर्जा सुरक्षा के लिए इथेनॉल को बढ़ावा देने और खाद्य वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित रखने के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है?

आम आदमी की रसोई पर नजर

चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे सीधा असर घरेलू उपभोक्ताओं पर पड़ता है। चाय से लेकर मिठाई, बेकरी उत्पाद और कई खाद्य पदार्थों तक चीनी का इस्तेमाल होता है। इसलिए इसकी कीमत में लगातार बढ़ोतरी केवल एक वस्तु की महंगाई नहीं, बल्कि कई अन्य उत्पादों की लागत पर भी असर डाल सकती है।

केजरीवाल ने इसी मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाते हुए केंद्र सरकार से सवाल किया है कि यदि गन्ने का इस्तेमाल इथेनॉल के लिए बढ़ाया जा रहा है तो घरेलू चीनी की जरूरत को पूरा करने के लिए सरकार की रणनीति क्या है।

उन्होंने कहा कि सरकार को पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि देश की आवश्यक खाद्य जरूरतें पूरी हों और उसके बाद ही उपलब्ध संसाधनों के दूसरे इस्तेमाल पर जोर दिया जाए।

‘विदेशी मुद्रा बचाने की नीति कहीं महंगी न पड़ जाए’

केजरीवाल के बयान का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही है कि सरकार जिस इथेनॉल नीति को विदेशी मुद्रा बचाने और तेल आयात घटाने की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, उसका असर यदि चीनी की कीमतों के रूप में सामने आता है तो नीति के लाभ और नुकसान दोनों का हिसाब जनता के सामने रखा जाना चाहिए।

उनका सवाल है कि यदि तेल आयात पर बचाई गई विदेशी मुद्रा बाद में चीनी आयात पर खर्च करनी पड़े तो ऐसी नीति से वास्तविक आर्थिक लाभ कितना हुआ?

अब इस मुद्दे पर निगाहें सरकार की प्रतिक्रिया पर हैं। चीनी की कीमतों में तेजी के वास्तविक कारण, देश में उपलब्ध स्टॉक, गन्ने की उपलब्धता, इथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट किए गए गन्ने की मात्रा और आयात-निर्यात संबंधी फैसले आने वाले दिनों में इस राजनीतिक बहस की दिशा तय कर सकते हैं।

फिलहाल केजरीवाल ने चीनी की बढ़ती कीमत को आम आदमी की रसोई से जोड़ते हुए मोदी सरकार की इथेनॉल नीति पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। तेल बचाने की नीति बनाम चीनी की कीमत—यह टकराव अब महज आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि सियासी बहस का नया मोर्चा बनता दिखाई दे रहा है।

- Advertisement -
Your Dream Technologies
VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
VIKAS TRIPATHI भारत देश की सभी छोटी और बड़ी खबरों को सामने दिखाने के लिए "पर्दाफास न्यूज" चैनल को लेके आए हैं। जिसके लोगो के बीच में करप्शन को कम कर सके। हम देश में समान व्यवहार के साथ काम करेंगे। देश की प्रगति को बढ़ाएंगे।
RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments

Call Now Button