“सिर में चोट के बाद इलाज कराया, सीटी स्कैन हुआ… हालत बिगड़ी तो अस्पताल पहुंचने से पहले ही टूट गई जिंदगी की डोर, पोस्टमार्टम के दौरान फूट पड़ा पति का दर्द—‘समय पर छुट्टी मिल जाती तो शायद आज मेरी केशरी जिंदा होती’”
बस्ती/लालगंज। वर्दी पहनकर दूसरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाले पुलिसकर्मियों के अपने घर की सुरक्षा और स्वास्थ्य की चिंता कौन करेगा? यह सवाल शनिवार को उस समय बेहद कचोटने लगा, जब लालगंज थाने में तैनात महिला सिपाही केशरी वर्मा की अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद मौत हो गई। एक हादसे में सिर पर लगी चोट के बाद इलाज करा चुकी केशरी ड्यूटी पर लौट आई थीं, लेकिन कुछ ही दिनों बाद उनकी जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया कि परिवार के पास अब सिर्फ उनकी यादें और पति के पास पत्नी को खोने का असहनीय दर्द रह गया।
सबसे मार्मिक दृश्य उस समय सामने आया, जब केशरी के शव के पोस्टमार्टम के दौरान उनके पति और साथी सिपाही नागेंद्र वर्मा अपने आंसुओं को रोक नहीं सके। पुलिस अधिकारियों के सामने हाथ जोड़कर खड़े नागेंद्र बार-बार यही कहते रहे कि अगर उनकी पत्नी को समय रहते बेहतर इलाज के लिए छुट्टी मिल जाती, तो शायद आज वह उनके साथ होतीं।
उनका यह सवाल सिर्फ एक पति का सवाल नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था पर सवाल है, जिसमें पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी के आगे कई बार अपने स्वास्थ्य और परिवार तक को पीछे छोड़ देते हैं।
22 अगस्त को सिर में लगी थी चोट, इलाज के बाद लौट आई थीं ड्यूटी पर
बताया गया कि केशरी वर्मा अपने घर प्रतापगढ़ गई थीं। 22 अगस्त को वापस लौटते समय उनकी स्कूटी असंतुलित हो गई और वह हादसे का शिकार हो गईं। दुर्घटना में उनके सिर के पीछे गंभीर चोट आई। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के साथ सिर में टांके लगाए गए और सीटी स्कैन भी कराया गया।
परिजनों के मुताबिक हादसे के बाद भी उनकी तबीयत को लेकर चिंता बनी हुई थी। हालांकि जांच में कोई बड़ी समस्या सामने नहीं आने की बात कही गई और केशरी वापस अपनी ड्यूटी पर लौट आईं।
वर्दी की जिम्मेदारी फिर उनके सामने थी। अस्पताल से लौटने के बाद भी वह सामान्य पुलिसकर्मी की तरह अपनी ड्यूटी करती रहीं। लेकिन सिर पर लगी चोट के बाद शरीर के भीतर क्या चल रहा था, शायद इसका अंदाजा किसी को नहीं था।
रात में पहरा देकर लौटे पति ने देखा तो पैरों तले खिसक गई जमीन
बीती रात केशरी के पति नागेंद्र वर्मा भी ड्यूटी पर थे। पहरा ड्यूटी पूरी करने के बाद जब वह घर लौटे तो सामने का दृश्य देखकर उनके होश उड़ गए।
केशरी की हालत बेहद गंभीर थी।
नागेंद्र ने बिना देर किए उन्हें जिला अस्पताल पहुंचाया। उम्मीद थी कि इलाज से पत्नी की जान बच जाएगी। लेकिन अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने केशरी को मृत घोषित कर दिया।
जिस पत्नी के साथ कुछ घंटे पहले तक जिंदगी और ड्यूटी की बातें रही हों, उसे अचानक मृत घोषित कर दिया जाना किसी भी पति के लिए कल्पना से परे त्रासदी है। नागेंद्र के लिए भी यह सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि उनकी पूरी जिंदगी का अचानक उजड़ जाना था।
‘मेरी पत्नी को समय पर छुट्टी मिल जाती तो शायद वह जिंदा होती’
केशरी के पोस्टमार्टम के दौरान नागेंद्र का दर्द गुस्से और बेबसी में बदल गया। पुलिस अधिकारियों के सामने वह हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
आंसुओं से भरी आंखों और कांपती आवाज में उन्होंने इलाज और विभागीय व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए। उनका आरोप था कि उनकी पत्नी को बेहतर इलाज के लिए समय पर छुट्टी नहीं मिली। अगर उन्हें समय रहते पर्याप्त आराम और बेहतर चिकित्सा सुविधा मिल जाती, तो शायद आज यह नौबत नहीं आती।
नागेंद्र ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए बिना एफआईआर के पोस्टमार्टम कराने से इनकार कर दिया। उन्होंने पूरे मामले की जांच और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की।
एक पुलिसकर्मी का यह विरोध इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह किसी बाहरी व्यक्ति की तरह व्यवस्था पर सवाल नहीं उठा रहा था। वह खुद उसी वर्दी का हिस्सा है, जिसके भीतर से यह आवाज उठी है।
सवाल सिर्फ केशरी की मौत का नहीं, पुलिसकर्मियों की सेहत का भी है
केशरी वर्मा की मौत ने पुलिस विभाग की उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जहां ड्यूटी का दबाव अक्सर स्वास्थ्य पर भारी पड़ता है।
पुलिसकर्मी से उम्मीद की जाती है कि वह हर परिस्थिति में ड्यूटी पर मौजूद रहे। कानून-व्यवस्था बिगड़े तो पुलिस आगे, वीआईपी ड्यूटी हो तो पुलिस आगे, त्योहार हो तो पुलिस आगे, रात का पहरा हो तो पुलिस आगे।
लेकिन सवाल यह है कि जब वही पुलिसकर्मी बीमार हो, घायल हो या उसे आराम की जरूरत हो, तब व्यवस्था कितनी संवेदनशील होती है?
केशरी के मामले में भी यही सवाल अब परिवार और उनके साथियों के सामने खड़ा है। सिर में चोट लगी। इलाज हुआ। टांके लगे। सीटी स्कैन हुआ। इसके बाद वह ड्यूटी पर लौट आईं।
क्या एक गंभीर सिर की चोट के बाद पुलिसकर्मी की स्थिति की लगातार निगरानी जरूरी नहीं थी?
क्या उन्हें पर्याप्त आराम और चिकित्सकीय निगरानी नहीं मिलनी चाहिए थी?
क्या ड्यूटी से ज्यादा जरूरी एक पुलिसकर्मी की जिंदगी नहीं है?
इन सवालों के जवाब अब जांच से ही सामने आ सकते हैं।
वर्दी के पीछे छिपे दर्द को कौन देखेगा?
पुलिसकर्मी भी इंसान हैं। उनके भी परिवार हैं, बच्चे हैं, माता-पिता हैं और उनके अपने डर हैं। लेकिन वर्दी पहनते ही उनसे उम्मीद की जाती है कि वे हर परिस्थिति में मजबूत बने रहें।
केशरी भी शायद यही करती रहीं।
सड़क हादसे में चोट लगी, अस्पताल गईं, इलाज कराया और फिर ड्यूटी पर लौट आईं। लेकिन क्या उनके शरीर को उतनी ही जल्दी सामान्य होने का आदेश दिया जा सकता था, जितनी जल्दी एक पुलिसकर्मी को ड्यूटी पर लौटने का आदेश मिल जाता है?
यही इस घटना का सबसे बड़ा मानवीय पक्ष है।
एक महिला सिपाही, जिसने दूसरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाली, खुद अपनी जिंदगी की लड़ाई हार गई। और अब उनका पति उसी विभाग के अधिकारियों के सामने खड़ा होकर अपनी पत्नी के लिए न्याय मांग रहा है।
परिवार ने भी उठाए सवाल, निष्पक्ष जांच की मांग
केशरी की मौत के बाद उनके भाई और अन्य परिजनों ने भी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। परिवार का कहना है कि सिर में चोट लगने के बाद से ही केशरी का इलाज चल रहा था। ऐसे में उनकी शारीरिक स्थिति को सामान्य मानने के बजाय गंभीरता से निगरानी की जानी चाहिए थी।
परिजनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि अगर इलाज या ड्यूटी से संबंधित किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए।
परिवार इस समय सिर्फ अपनी बेटी, बहन और पत्नी को खोने का दुख नहीं झेल रहा, बल्कि यह जानना चाहता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि इलाज करा चुकी एक महिला सिपाही अचानक जिंदगी से हाथ धो बैठी।
अधिकारी बोले—जांच में बड़ी समस्या नहीं मिली थी
मामले पर कलवारी सीओ एवं डिप्टी एसपी बृजेश सिंह ने बताया कि केशरी वर्मा और उनके पति नागेंद्र कुमार दोनों लालगंज थाने में तैनात थे।
उन्होंने बताया कि प्रतापगढ़ में स्कूटी असंतुलित होने से केशरी के सिर के पीछे चोट आई थी। इसके बाद उनका इलाज कराया गया, टांके लगाए गए और सीटी स्कैन भी कराया गया था। जांच में कोई बड़ी समस्या सामने नहीं आने के बाद वह थाने लौट आई थीं।
अधिकारी के मुताबिक रात में अचानक उनकी हालत बिगड़ी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल में चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
एक मौत, कई सवाल और पुलिस व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती
केशरी वर्मा अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी मौत कई ऐसे सवाल छोड़ गई है, जिनका जवाब सिर्फ कागजी जांच से नहीं, बल्कि संवेदनशील व्यवस्था से मिलना चाहिए।
क्या पुलिसकर्मियों की मेडिकल फिटनेस की नियमित समीक्षा होती है?
क्या गंभीर चोट के बाद उन्हें पर्याप्त रिकवरी टाइम दिया जाता है?
क्या थानों में तैनात पुलिसकर्मियों के स्वास्थ्य को लेकर कोई प्रभावी निगरानी व्यवस्था है?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या पुलिसकर्मी की ड्यूटी उसकी जिंदगी से बड़ी हो सकती है?
इन सवालों को सिर्फ केशरी की मौत तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। यह घटना पूरे पुलिस विभाग के लिए चेतावनी है। पुलिसकर्मी मशीन नहीं हैं कि चोट लगे और फिर भी ड्यूटी करते रहें। उनके शरीर को भी आराम चाहिए, उनके मन को भी सहारा चाहिए और उनके परिवार को भी यह भरोसा चाहिए कि ड्यूटी के दौरान अगर उनके अपने को कुछ होता है तो विभाग उनके साथ खड़ा होगा।
नागेंद्र की आंखों के आंसू पूछ रहे हैं—‘आखिर मेरी पत्नी को बचाने के लिए और क्या किया जा सकता था?’
पोस्टमार्टम के दौरान नागेंद्र का रोना सिर्फ एक पति के अपनी पत्नी को खोने का दर्द नहीं था। वह उस व्यवस्था के सामने खड़ा एक सवाल था, जिसका हिस्सा वह खुद हैं।
एक तरफ वर्दी की जिम्मेदारी थी, दूसरी तरफ पत्नी की जिंदगी।
लेकिन अब दोनों में से एक हमेशा के लिए छिन गया।
केशरी वर्मा की मौत का सच जांच से सामने आएगा। यदि कहीं लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी तय होनी ही चाहिए। क्योंकि किसी परिवार के लिए उसकी बेटी, बहन, पत्नी या मां की जिंदगी की कीमत किसी भी ड्यूटी से कम नहीं हो सकती।
केशरी चली गईं, लेकिन उनकी मौत पुलिस व्यवस्था से एक बेहद जरूरी सवाल पूछ गई है—जो पुलिस दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए हर वक्त खड़ी रहती है, क्या उसकी अपनी जिंदगी बचाने के लिए व्यवस्था उतनी ही गंभीर है?
यही सवाल अब सिर्फ नागेंद्र का नहीं, बल्कि हर उस पुलिसकर्मी का है जो वर्दी पहनकर रोज अपने घर से निकलता है और दूसरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाता है।














