अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने और स्थायी शांति समझौते की कोशिशों को एक बार फिर झटका लगता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान समझौता करना चाहता है, लेकिन फिलहाल वह ऐसी डील के लिए तैयार नहीं है जिसे अमेरिका सही समझता है। ट्रंप के इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच जारी कूटनीतिक गतिरोध के जल्द खत्म होने की उम्मीदें कमजोर पड़ गई हैं।
60 दिन की समयसीमा खत्म, फिर भी नहीं बनी बात
अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर के बाद स्थायी समझौते की दिशा में बातचीत शुरू हुई थी। इसके लिए 60 दिनों की समयसीमा तय की गई थी, लेकिन यह अवधि पूरी होने के बावजूद दोनों पक्ष किसी अंतिम समझौते तक नहीं पहुंच सके।
दोनों देश बातचीत के ठप होने के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। ऐसे में युद्ध खत्म करने की इच्छा तो दोनों तरफ से दिखाई दे रही है, लेकिन समझौते की शर्तों पर गहरी असहमति बनी हुई है।
ईरान की क्या हैं मांगें?
ईरान की प्रमुख मांगों में अमेरिकी आर्थिक नाकाबंदी और प्रतिबंधों को हटाना, अमेरिकी सैन्य दबाव कम करना और युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई शामिल है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने भी युद्ध खत्म करने की इच्छा जताई है, लेकिन उनका कहना है कि ईरान अपनी ताकत और अपनी शर्तों के आधार पर समझौता करना चाहता है।
पेजेशकियन ने अमेरिका पर ईरान के स्कूलों, अस्पतालों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने का आरोप लगाते हुए दावा किया कि दुनिया ने ईरान की जीत को स्वीकार किया है।
अमेरिका क्यों अड़ा हुआ है?
ट्रंप प्रशासन ईरान से परमाणु कार्यक्रम समेत कई रणनीतिक मुद्दों पर बड़ी रियायतें चाहता है। अमेरिका का रुख है कि केवल सीजफायर पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसा समझौता जरूरी है जो भविष्य में ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं से जुड़े जोखिमों को कम करे।
यही मांगें दोनों पक्षों के बीच बातचीत में सबसे बड़ी अड़चन बनती दिखाई दे रही हैं।
प्रतिबंधों से बढ़ेगा दबाव
कूटनीतिक बातचीत के साथ अमेरिका ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की तैयारी में भी है। वॉशिंगटन की ओर से नए और कड़े प्रतिबंध लगाए जाने की संभावना ने तनाव को और बढ़ा दिया है।
ईरान ने अमेरिकी प्रतिबंधों को अपनी संप्रभुता के खिलाफ बताते हुए इसका विरोध किया है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने अमेरिकी नीति की कड़ी आलोचना की है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना सबसे बड़ा जोखिम
इस पूरे संकट में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक बना हुआ है। यह दुनिया के प्रमुख तेल परिवहन मार्गों में शामिल है और यहां बढ़ने वाला तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार और तेल की कीमतों पर असर डाल सकता है।
ईरान का कहना है कि अमेरिकी सैन्य दबाव और नाकाबंदी जैसे कदम जारी रहते हुए स्थायी समझौता मुश्किल है। दूसरी ओर, अमेरिका तेहरान पर दबाव बनाए रखने के पक्ष में है।
आगे क्या?
फिलहाल दोनों पक्ष युद्ध खत्म करने की बात कर रहे हैं, लेकिन शांति समझौते की शर्तों पर सहमति दूर दिखाई दे रही है। ट्रंप के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिका तत्काल समझौते के बजाय ईरान पर दबाव बढ़ाने की रणनीति अपना सकता है।
अगर कूटनीतिक रास्ता जल्द नहीं खुलता, तो प्रतिबंधों, सैन्य दबाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव का असर केवल अमेरिका-ईरान संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है।














