रूस में बढ़ी नकदी की मांग, अरबों डॉलर की निकासी और बढ़ता बजट घाटा बना चिंता का कारण; यूक्रेन युद्ध के बीच कमजोर पड़ रहा है लोगों और कारोबार का भरोसा?
नई दिल्ली: रूस की वॉर इकोनॉमी को लेकर एक नई चिंता सामने आई है। देश में लोग बैंक खातों से बड़ी मात्रा में नकदी निकाल रहे हैं, जबकि कारोबार से जुड़ी पूंजी का एक हिस्सा विदेश की ओर जा रहा है। इसके साथ ही सरकारी बजट घाटा बढ़ रहा है और यूक्रेन के ड्रोन हमलों का असर रूस के भीतर औद्योगिक और लॉजिस्टिक्स गतिविधियों पर दिखाई दे रहा है।
इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या लंबे समय से युद्ध झेल रही रूसी अर्थव्यवस्था अब पैसे, भरोसे और सरकारी फंडिंग—तीनों मोर्चों पर दबाव महसूस कर रही है?
जून से अगस्त के बीच 15 अरब डॉलर से ज्यादा की निकासी
द वॉशिंगटन पोस्ट के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक, अगस्त के पहले दो हफ्तों में रूसी बैंक खातों से करीब 3.4 अरब डॉलर यानी 286.4 अरब रूबल निकाले गए।
इससे पहले जून और जुलाई में करीब 11.8 अरब डॉलर की निकासी हुई थी। यानी जून से 14 अगस्त के बीच कुल निकासी लगभग 15.2 अरब डॉलर तक पहुंच गई।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बैंकिंग सिस्टम से इतनी बड़ी मात्रा में नकदी निकलने का मतलब केवल लोगों की रोजमर्रा की जरूरत नहीं हो सकता। यह भविष्य को लेकर बढ़ती आर्थिक अनिश्चितता और बैंकिंग सिस्टम पर भरोसे में कमी का संकेत भी हो सकता है।
क्या 2022 के बाद फिर शुरू हुआ कैपिटल फ्लाइट?
रूस के सबसे बड़े बैंक स्बेरबैंक के वरिष्ठ अधिकारी तारास स्क्वॉर्त्सोव के मुताबिक, 2026 में रूस से होने वाला कुल कैपिटल फ्लाइट 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद आई शुरुआती बड़ी निकासी की लहर से करीब दोगुना हो सकता है।
यहां दो चीजों को अलग समझना जरूरी है।
बैंक से नकदी निकालना यानी पैसा बैंकिंग सिस्टम से निकालकर अपने पास रखना।
वहीं कैपिटल फ्लाइट का मतलब पूंजी का देश से बाहर जाना है—जैसे विदेशी बैंक खातों, निवेश या दूसरी विदेशी संपत्तियों में पैसा लगाना।
अगर दोनों घटनाएं एक साथ तेज होती हैं, तो इसका असर बैंकिंग सिस्टम और सरकार की फंडिंग क्षमता, दोनों पर पड़ सकता है।
रूसी नागरिक आखिर पैसा बैंक से क्यों निकाल रहे हैं?
इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं।
सबसे बड़ा कारण है युद्ध के लंबा खिंचने की चिंता। लंबे युद्ध के लिए सरकार को लगातार भारी रकम की जरूरत होती है। इससे लोगों में यह डर पैदा हो सकता है कि भविष्य में सरकार निजी क्षेत्र और नागरिकों की संपत्ति से अधिक संसाधन जुटाने की कोशिश कर सकती है।
जून में रूसी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता गेन्नाडी ज्युगानोव ने अर्थव्यवस्था और सरकारी वित्त को सहारा देने के लिए लोगों और कंपनियों के बैंक खातों में मौजूद बड़ी रकम के इस्तेमाल की बात कही थी।
यह कोई सरकारी फैसला या बैंक जमा जब्त करने की घोषणा नहीं थी, लेकिन ऐसी सार्वजनिक बहस से लोगों की बचत को लेकर चिंता जरूर बढ़ सकती है।
यूक्रेनी ड्रोन हमलों से बढ़ा आर्थिक दबाव
रूस के अंदर बढ़ते यूक्रेनी ड्रोन हमले भी आर्थिक अनिश्चितता बढ़ा रहे हैं।
अब हमलों का असर केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं है। ऊर्जा, औद्योगिक और लॉजिस्टिक्स से जुड़े बुनियादी ढांचे भी प्रभावित हो रहे हैं।
16 अगस्त को मॉस्को क्षेत्र के पोडॉल्स्क में रूस की बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी Wildberries के एक बड़े वेयरहाउस पर हमले की खबर सामने आई। रूस के मुताबिक, इस घटना में एक व्यक्ति की मौत हुई।
ऐसे बड़े वेयरहाउस में हजारों कारोबारियों का माल रखा होता है। किसी हमले से सिर्फ एक कंपनी प्रभावित नहीं होती, बल्कि विक्रेताओं, डिलीवरी नेटवर्क, बीमा कंपनियों और पूरी सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है।
यही वजह है कि युद्ध का आर्थिक असर अब रूस के आम कारोबारी माहौल और लोगों की रोजमर्रा की आर्थिक सोच में भी दिखाई देने लगा है।
बैंकिंग सिस्टम भी दबाव में
रूस के बैंक युद्धकालीन अर्थव्यवस्था को कर्ज उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
जून में बैंकों का कॉर्पोरेट लेंडिंग पोर्टफोलियो 0.4 प्रतिशत बढ़ा, जबकि सालाना आधार पर इसमें करीब 13.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
लेकिन समस्या यह है कि अगर बैंक ग्राहक बड़ी मात्रा में अपनी जमा रकम निकालने लगें, तो बैंकों को पर्याप्त नकदी और लिक्विडिटी बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
जुलाई के अंत में स्बेरबैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा था कि रूसी बैंकों के पास सरकार के बजट घाटे की भरपाई के लिए जारी होने वाले सरकारी बॉन्ड खरीदने के लिए अतिरिक्त रूबल लिक्विडिटी सीमित हो गई है।
यानी मामला सिर्फ इतना नहीं है कि लोग पैसा निकाल रहे हैं। बैंकिंग सिस्टम से निकलती नकदी सरकार की युद्धकालीन फंडिंग क्षमता को भी प्रभावित कर सकती है।
रूस का बजट घाटा भी बढ़ा
रूस सरकार के लिए दूसरी बड़ी चुनौती बजट घाटा है।
रूस के वित्त मंत्रालय के मुताबिक, जनवरी से जुलाई 2026 के बीच संघीय बजट घाटा 6.455 ट्रिलियन रूबल, यानी GDP का करीब 2.8 प्रतिशत पहुंच गया।
पूरे 2026 के लिए शुरुआती लक्ष्य करीब 3.786 ट्रिलियन रूबल, यानी GDP का 1.6 प्रतिशत घाटा था।
इसका मतलब है कि साल के पहले सात महीनों में ही वास्तविक बजट घाटा पूरे साल के शुरुआती अनुमान से काफी ऊपर निकल गया।
सरकार इस अंतर को पूरा करने के लिए सरकारी बॉन्ड यानी OFZ जारी करती है। लेकिन अगर बैंकों के पास अतिरिक्त नकदी कम हो और निवेशकों की मांग कमजोर पड़े, तो सरकार के लिए घरेलू बाजार से कर्ज जुटाना महंगा और मुश्किल हो सकता है।
क्या रूस की वॉर इकोनॉमी कमजोर हो रही है?
सिर्फ एक आंकड़े के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि रूस की अर्थव्यवस्था संकट में है। लेकिन कई संकेत एक साथ जरूर चिंता पैदा कर रहे हैं।
एक तरफ बैंकिंग सिस्टम से बड़ी मात्रा में नकदी निकल रही है।
दूसरी तरफ कारोबारी पूंजी के देश से बाहर जाने की चिंता है।
तीसरी तरफ सरकारी बजट घाटा तेजी से बढ़ा है।
और चौथी तरफ यूक्रेनी हमलों से रूस के भीतर कारोबारी और लॉजिस्टिक्स ढांचे पर दबाव बढ़ रहा है।
इन सभी घटनाओं को एक साथ देखें तो तस्वीर यह बताती है कि रूस की वॉर इकोनॉमी पर आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ रहा है।
आगे क्रेमलिन के सामने क्या विकल्प होंगे?
अगर युद्ध लंबा चलता है और सरकारी आय के मुकाबले सैन्य खर्च लगातार ऊंचा रहता है, तो रूस को अपनी वित्तीय जरूरतें पूरी करने के लिए कई कठिन विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है।
सरकार को ज्यादा कर्ज लेना पड़ सकता है, टैक्स बढ़ाने पड़ सकते हैं, गैर-जरूरी सरकारी खर्च कम करना पड़ सकता है या अर्थव्यवस्था के निजी क्षेत्र से ज्यादा संसाधन जुटाने पड़ सकते हैं।
हालांकि, फिलहाल इन संकेतों को रूस की तत्काल बैंकिंग या आर्थिक तबाही के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी। असली सवाल यह है कि आने वाले महीनों में नकदी निकासी, पूंजी पलायन, बजट घाटे और युद्ध से जुड़े नुकसान की यह प्रवृत्ति कितनी तेज होती है।
अगर ये दबाव लगातार बढ़ते हैं, तो इसका असर सिर्फ रूसी नागरिकों और बैंकों पर नहीं, बल्कि पुतिन सरकार की लंबे युद्ध को वित्तीय रूप से बनाए रखने की क्षमता पर भी पड़ सकता है।














