नोएडा/ग्रेटर नोएडा। गौतमबुद्धनगर में ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने की प्रक्रिया को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। ड्राइविंग टेस्ट में असफल होने वाले आवेदकों के लिए अब दोबारा टेस्ट देना पहले जितना आसान नहीं रह गया है।जानकारी के अनुसार, टेस्ट में फेल होने के बाद आवेदक को सीधे री-टेस्ट का मौका देने के बजाय संबंधित निजी ड्राइविंग ट्रेनिंग सेंटर में करीब एक महीने का प्रशिक्षण लेना अनिवार्य बताया जा रहा है। इसके लिए लगभग 6,000 रुपये शुल्क निर्धारित होने की बात सामने आई है।
नई व्यवस्था ने उन हजारों आवेदकों की चिंता बढ़ा दी है जो ड्राइविंग लाइसेंस हासिल करने के लिए टेस्ट प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कोई व्यक्ति टेस्ट में एक बार असफल होता है, तो क्या उसे दोबारा परीक्षा देने से पहले पूरे एक महीने का प्रशिक्षण लेना ही होगा? और यदि ऐसा है तो इस प्रशिक्षण की अनिवार्यता, शुल्क और निजी संस्थानों की भूमिका को लेकर स्पष्ट नियम आखिर क्या हैं?
300 रुपये के री-टेस्ट से 6 हजार रुपये की ट्रेनिंग तक पहुंचा मामला
जानकारी के मुताबिक, पहले ड्राइविंग टेस्ट में असफल होने के बाद आवेदक निर्धारित री-टेस्ट शुल्क जमा करके दोबारा परीक्षा दे सकता था। यह शुल्क करीब 300 रुपये बताया जाता है। आवेदक को अपनी कमियों को दूर करने के बाद दोबारा टेस्ट देने का अवसर मिलता था।
लेकिन अब सामने आई व्यवस्था में तस्वीर काफी अलग नजर आ रही है। री-टेस्ट से पहले एक महीने की ट्रेनिंग और करीब 6,000 रुपये का खर्च आवेदक के सामने नई बाध्यता के रूप में दिखाई दे रहा है।
यानी जिस प्रक्रिया में पहले कुछ सौ रुपये खर्च करके दोबारा परीक्षा देने का विकल्प उपलब्ध था, उसमें अब प्रशिक्षण की फीस के रूप में कई गुना अधिक रकम खर्च करनी पड़ सकती है। यही वजह है कि आम आवेदकों के बीच इस व्यवस्था को लेकर नाराजगी बढ़ रही है।
एक टेस्ट में असफलता, एक महीने का प्रशिक्षण क्यों?
आवेदकों का सबसे बड़ा सवाल इसी बिंदु पर है। उनका कहना है कि ड्राइविंग टेस्ट में असफल होने के कई कारण हो सकते हैं। किसी आवेदक से पार्किंग में गलती हो सकती है, किसी से रिवर्सिंग के दौरान चूक हो सकती है, तो कोई टेस्ट के दौरान घबराहट के कारण निर्धारित मानक पूरा नहीं कर पाता।
ऐसे में क्या हर असफल आवेदक के लिए एक समान रूप से 30 दिन का प्रशिक्षण अनिवार्य करना उचित है?
लोगों का कहना है कि यदि किसी आवेदक को किसी विशेष ड्राइविंग कौशल में सुधार की जरूरत है, तो उसे संबंधित कमी की जानकारी देकर सुधार का अवसर दिया जाना चाहिए। प्रशिक्षण को विकल्प के रूप में उपलब्ध कराया जा सकता है, लेकिन उसे अनिवार्य बनाने से पहले नियम, कारण और जवाबदेही सार्वजनिक होना जरूरी है।
निजी ट्रेनिंग सेंटरों की भूमिका पर सबसे बड़ा सवाल
नई व्यवस्था में सबसे ज्यादा चर्चा निजी ड्राइविंग ट्रेनिंग सेंटरों की भूमिका को लेकर है। यदि ड्राइविंग टेस्ट में असफल होने वाला हर आवेदक निजी प्रशिक्षण केंद्र में एक महीने की ट्रेनिंग लेने के लिए बाध्य होगा, तो स्वाभाविक रूप से इन संस्थानों के पास बड़ी संख्या में आवेदक पहुंचेंगे।
यहीं से सवाल उठता है कि क्या किसी आवेदक को प्रशिक्षण की आवश्यकता का निर्णय स्वतंत्र और पारदर्शी तरीके से किया जा रहा है, या टेस्ट में असफल होने के बाद प्रशिक्षण केंद्र जाना स्वतः अनिवार्य हो गया है?
आवेदकों की मांग है कि परिवहन विभाग यह स्पष्ट करे कि प्रशिक्षण केंद्रों का चयन कैसे किया गया है, उनकी फीस कौन निर्धारित करता है, प्रशिक्षण की निगरानी कौन करता है और यदि किसी केंद्र के खिलाफ शिकायत आती है तो उसकी जांच किस स्तर पर होगी।
दादरी के ड्राइविंग टेस्ट केंद्र पहले भी रहे हैं चर्चा में
गौतमबुद्धनगर में ड्राइविंग टेस्ट की प्रक्रिया और निजी ऑपरेटरों की भूमिका को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। दादरी क्षेत्र में संचालित ड्राइविंग टेस्ट केंद्रों को लेकर आवेदकों ने समय-समय पर टेस्ट प्रक्रिया, कठिनाई, समय सीमा और व्यवस्था से संबंधित शिकायतें उठाई हैं।
कुछ आवेदकों का दावा रहा है कि टेस्ट में असफल होने के कारणों की पर्याप्त जानकारी उन्हें नहीं दी जाती। ऐसे में अब यदि री-टेस्ट से पहले प्रशिक्षण को अनिवार्य किया जा रहा है, तो यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि आवेदक को फेल होने का स्पष्ट कारण, संबंधित ड्राइविंग मानक और सुधार के लिए आवश्यक कौशल लिखित अथवा डिजिटल माध्यम से उपलब्ध कराया जाए।
6 हजार रुपये की फीस आम आदमी के लिए कितना बड़ा बोझ?
ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना पहले से ही आवेदन शुल्क, टेस्ट, वाहन और अन्य औपचारिकताओं से जुड़ी प्रक्रिया है। ऐसे में यदि टेस्ट में असफल होने के बाद 6,000 रुपये का प्रशिक्षण शुल्क अतिरिक्त रूप से देना पड़े, तो यह निम्न और मध्यम आय वर्ग के आवेदकों के लिए बड़ा आर्थिक बोझ बन सकता है।
एक आवेदक यदि पहली बार टेस्ट में असफल हो जाता है तो उसे अपनी गलती सुधारने के साथ-साथ अतिरिक्त रकम भी खर्च करनी पड़ सकती है। यदि वह प्रशिक्षण के बाद भी दोबारा टेस्ट में सफल नहीं होता, तो आगे की प्रक्रिया और खर्च को लेकर भी सवाल खड़े होंगे।
यही वजह है कि आवेदक पूछ रहे हैं—सड़क सुरक्षा के नाम पर नियम सख्त करना उचित है, लेकिन क्या उसकी आर्थिक कीमत सीधे आवेदक से वसूलना ही एकमात्र रास्ता है?
पारदर्शिता नहीं हुई तो बढ़ सकता है विवाद
नई व्यवस्था को लेकर सबसे महत्वपूर्ण मांग पारदर्शिता की है। आवेदकों का कहना है कि परिवहन विभाग को अपनी वेबसाइट और टेस्ट केंद्रों पर स्पष्ट रूप से जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए कि—
- टेस्ट में फेल होने के बाद री-टेस्ट की प्रक्रिया क्या है?
- क्या एक महीने की ट्रेनिंग वास्तव में अनिवार्य है?
- 6,000 रुपये की फीस किस नियम के तहत निर्धारित है?
- प्रशिक्षण केंद्र का चयन कौन करता है?
- प्रशिक्षण पूरा होने का प्रमाणपत्र कौन जारी करेगा?
- टेस्ट में असफल होने के कारण आवेदक को कैसे बताए जाएंगे?
- किसी निजी केंद्र की शिकायत होने पर कार्रवाई कौन करेगा?
जब तक इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने नहीं आता, तब तक नई व्यवस्था को लेकर असमंजस बना रहेगा।
सड़क सुरक्षा जरूरी, लेकिन व्यवस्था भी जवाबदेह हो
यह बात निर्विवाद है कि सड़क पर वाहन चलाने वाले व्यक्ति का प्रशिक्षित और सुरक्षित चालक होना जरूरी है। ड्राइविंग टेस्ट का उद्देश्य भी यही है कि केवल सक्षम व्यक्ति को ही लाइसेंस मिले। यदि प्रशिक्षण के माध्यम से ड्राइविंग कौशल बेहतर होता है और दुर्घटनाओं में कमी आती है तो ऐसी पहल का स्वागत किया जाना चाहिए।
लेकिन सड़क सुरक्षा के नाम पर लागू किसी भी व्यवस्था में पारदर्शिता, समानता और जवाबदेही उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी आवेदक को टेस्ट में असफल घोषित किया जाता है, तो उसे यह पता होना चाहिए कि वह किस मानक पर असफल हुआ और उसे सुधार के लिए क्या करना है।
प्रशिक्षण की जरूरत है तो उसकी गुणवत्ता की भी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। फीस निर्धारित है तो उसका आधिकारिक आदेश सार्वजनिक होना चाहिए। निजी संस्था जिम्मेदारी संभाल रही है तो उसके कामकाज की निगरानी भी सरकारी स्तर पर सुनिश्चित होनी चाहिए।
अब परिवहन विभाग के जवाब का इंतजार
गौतमबुद्धनगर के आवेदकों के बीच उठ रहे सवालों के बीच अब निगाह परिवहन विभाग पर है। विभाग की ओर से यदि स्पष्ट कर दिया जाता है कि एक महीने की ट्रेनिंग और 6,000 रुपये शुल्क की व्यवस्था किस आदेश, नियम या नीति के तहत लागू है, तो मौजूदा भ्रम काफी हद तक दूर हो सकता है।
वहीं, यदि यह व्यवस्था वास्तव में लागू है तो इसके पीछे का उद्देश्य, प्रशिक्षण की अनिवार्यता और आवेदकों के लिए उपलब्ध वैकल्पिक व्यवस्था भी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ 6,000 रुपये का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें एक बार ड्राइविंग टेस्ट में असफल होने वाला व्यक्ति दोबारा सड़क पर अपनी योग्यता साबित करने से पहले एक महीने की ट्रेनिंग और हजारों रुपये के खर्च की अनिवार्यता के बीच खड़ा दिखाई दे रहा है।
अब देखना यह है कि यह नई व्यवस्था वास्तव में सड़क सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में प्रभावी कदम साबित होती है या फिर निजी प्रशिक्षण केंद्रों की भूमिका और आर्थिक हितों को लेकर उठ रहे सवालों को और हवा देती है।














