Saturday, August 8, 2026
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दो साल में बदल गया दिल्ली का सियासी गणित: INDIA में दरार, NDA का कुनबा मजबूत; लोकसभा में 42 तो राज्यसभा में 11 कदम दूर ‘दो-तिहाई

“2024 में विपक्ष की मजबूत चुनौती से 2026 में NDA की बढ़ती पकड़ तक पहुंची कहानी; DMK की दूरी, उद्धव खेमे में टूट, TMC में बगावत और AAP के सात सांसदों का पाला बदलना बना बड़ा टर्निंग प्वाइंट”

नई दिल्ली:2024 के लोकसभा चुनाव में जिस विपक्षी एकजुटता ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले NDA को पहली बार गठबंधन सरकार बनाने के लिए मजबूर किया था, दो साल बाद वही विपक्षी मोर्चा अंदरूनी टूट, क्षेत्रीय हितों और राजनीतिक असहमति से जूझता नजर आ रहा है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने सिर्फ अपने पुराने सहयोगियों को साथ रखने की कोशिश नहीं की, बल्कि विपक्षी खेमे में भी सेंधमारी कर संसद के दोनों सदनों में अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाया है।

2024 में BJP को 240 लोकसभा सीटें मिली थीं और सहयोगियों के साथ NDA का आंकड़ा 293 तक पहुंचा था। INDIA गठबंधन के घटक दलों ने मिलकर 234 सीटें जीती थीं। उस समय यह संख्या विपक्ष को सरकार को घेरने की मजबूत स्थिति देती थी।

लेकिन अगस्त 2026 तक संसद का सियासी नक्शा पहले जैसा नहीं रहा।

महाराष्ट्र में शिवसेना (UBT) के छह सांसदों का एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में जाना, पश्चिम बंगाल में TMC के 20 लोकसभा सांसदों का अलग गुट बनाना और अप्रैल में AAP के सात राज्यसभा सांसदों का BJP में शामिल होना विपक्षी खेमे के लिए बड़े झटकों के तौर पर सामने आया है। महाराष्ट्र में छह सांसदों के पाला बदलने से शिंदे गुट की लोकसभा ताकत सात से बढ़कर 13 हो गई।

INDIA गठबंधन को एक के बाद एक चार बड़े झटके

1. DMK ने कांग्रेस से दूरी बनाई, INDIA की एकजुटता पर सवाल

तमिलनाडु की राजनीति में 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद बड़ा बदलाव देखने को मिला। DMK और कांग्रेस के बीच चुनावी रणनीति, सीट बंटवारे और राज्य की राजनीति को लेकर मतभेद गहराए। इसके बाद DMK के INDIA गठबंधन से दूरी बनाने का फैसला विपक्षी एकजुटता के लिए बड़ा झटका माना गया।

2024 के लोकसभा चुनाव में DMK ने 22 सीटें जीती थीं। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी मंच से उसका अलग होना केवल तमिलनाडु तक सीमित घटना नहीं है। यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या 2024 में बना INDIA प्रयोग 2029 तक उसी रूप में कायम रह पाएगा?

DMK की ओर से संसद में अपने सांसदों के लिए अलग बैठने की मांग ने भी इस राजनीतिक दूरी को सार्वजनिक रूप से रेखांकित किया।

2. महाराष्ट्र में उद्धव खेमे को बड़ा झटका

22 जून 2026 महाराष्ट्र की राजनीति में एक और बड़ा मोड़ लेकर आया। शिवसेना (UBT) के छह लोकसभा सांसदों ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थाम लिया।

संजय दिना पाटिल, संजय जाधव, संजय देशमुख, ओमप्रकाश राजेनिंबालकर, नगेष पाटिल आष्टीकर और भाऊसाहेब वाकचौरे के पाला बदलने के बाद शिंदे गुट की लोकसभा में संख्या सात से बढ़कर 13 हो गई, जबकि उद्धव ठाकरे गुट के पास केवल तीन सांसद रह गए।

शिंदे ने इस घटनाक्रम को ‘ऑपरेशन टाइगर’ की सफलता बताया। राजनीतिक तौर पर देखें तो यह बदलाव केवल शिवसेना के भीतर शक्ति संतुलन नहीं बदलता, बल्कि NDA की संसदीय ताकत को भी प्रभावित करता है।

3. बंगाल में TMC के भीतर सबसे बड़ी बगावत

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को भी बड़ा झटका लगा। पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI में विलय की पहल की।

इस बगावत की अगुवाई बारासात से TMC सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने की। रिपोर्टों के मुताबिक 20 सांसदों ने TMC से अलग होकर NCPI में विलय का रास्ता चुना।

यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बंगाल में TMC लंबे समय से विपक्षी राजनीति का एक बड़ा स्तंभ रही है। यदि उसके लोकसभा सांसदों का बड़ा समूह अलग होता है तो इसका असर सिर्फ राज्य की राजनीति पर नहीं, बल्कि दिल्ली में विपक्ष की सामूहिक रणनीति पर भी पड़ता है।

हालांकि इस तरह के विलय और दल-बदल के मामलों में कानूनी और संसदीय प्रक्रियाएं भी महत्वपूर्ण हैं। लोकसभा अध्यक्ष के स्तर पर इसकी वैधानिक स्थिति और दल-बदल कानून की व्याख्या अहम भूमिका निभा सकती है।

4. AAP के सात राज्यसभा सांसदों ने बदली राजनीतिक तस्वीर

अप्रैल 2026 में आम आदमी पार्टी को राज्यसभा में बड़ा झटका लगा, जब उसके सात सांसद BJP में शामिल हो गए। इनमें राघव चड्ढा और पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह जैसे चर्चित नाम भी शामिल थे।

इस घटनाक्रम से AAP की राज्यसभा में मौजूदगी घटकर महज तीन सांसदों तक पहुंच गई, जबकि BJP की संख्या 113 तक पहुंची। NDA की कुल संख्या भी लगभग 140 के आसपास बताई गई।

यह बदलाव इसलिए अहम है क्योंकि राज्यसभा में सरकार को कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर विपक्षी दलों की रणनीति का सामना करना पड़ता है। AAP के सात सांसदों का जाना विपक्षी खेमे के लिए संख्या के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक झटका भी है।


लोकसभा में NDA का बढ़ा कुनबा, लेकिन दो-तिहाई से अभी दूरी

2024 के चुनाव में BJP के 240 सांसद थे। NDA में TDP के 16, JDU के 12, शिंदे शिवसेना के सात, LJP (रामविलास) के पांच और अन्य सहयोगियों के सांसद शामिल थे।

इसके बाद बंगाल में TMC के 20 सांसदों के अलग गुट में जाने और महाराष्ट्र में छह UBT सांसदों के शिंदे गुट में शामिल होने से NDA समर्थक खेमे की प्रभावी संख्या में बढ़ोतरी हुई।

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—किसी सांसद का विपक्षी दल से अलग होना और उसका औपचारिक रूप से NDA में शामिल होना एक ही बात नहीं है। बंगाल में NCPI प्रकरण की संसदीय मान्यता और औपचारिक स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है।

फिलहाल तीन लोकसभा सीटें रिक्त होने के कारण प्रभावी सदन की संख्या 540 मानी जा रही है। दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 सांसदों की जरूरत होगी। उपलब्ध राजनीतिक आंकड़ों के आधार पर NDA अभी उस जादुई आंकड़े से काफी दूर है।

यानी संख्या बढ़ने के बावजूद दो-तिहाई बहुमत अभी BJP के नेतृत्व वाले गठबंधन की पहुंच से बाहर है।


राज्यसभा में भी NDA मजबूत, 163 के आंकड़े से 11 दूर

उच्च सदन में भी पिछले कुछ महीनों में तेज राजनीतिक बदलाव हुए हैं।

अप्रैल में AAP के सात सांसदों के BJP में जाने के बाद NDA की स्थिति मजबूत हुई। इसके बाद पश्चिम बंगाल में TMC के तीन पूर्व राज्यसभा सांसद—सुखेंदु शेखर रे, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बरैक—BJP में शामिल हुए। तीनों ने राज्यसभा से इस्तीफा देने के बाद BJP का दामन थामा और बाद में BJP उम्मीदवार के रूप में निर्विरोध फिर राज्यसभा पहुंच गए।

यह घटनाक्रम दिखाता है कि BJP की रणनीति केवल लोकसभा तक सीमित नहीं है। उच्च सदन में संख्या बढ़ाना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कई विधेयकों और संवैधानिक-राजनीतिक मुद्दों पर राज्यसभा का समीकरण सरकार की रणनीति तय करता है।

245 सदस्यों वाली राज्यसभा में दो-तिहाई का आंकड़ा 163 बैठता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार NDA लगभग 152 सांसदों के स्तर तक पहुंच चुका है। यानी दो-तिहाई बहुमत से करीब 11 सांसद दूर।


BJP की रणनीति: विपक्ष तोड़ो नहीं, अपना कुनबा बढ़ाओ

पिछले दो वर्षों की राजनीति का सबसे बड़ा संदेश यह है कि BJP ने गठबंधन प्रबंधन को अपनी रणनीति का अहम हिस्सा बना लिया है।

2024 में NDA को बहुमत के लिए TDP, JDU, शिवसेना और LJP जैसे सहयोगियों की जरूरत थी। इसके बाद BJP ने इन सहयोगियों को साथ रखने के साथ-साथ पुराने साथियों को दोबारा जोड़ने पर भी जोर दिया।

तमिलनाडु इसका बड़ा उदाहरण है। 2024 से पहले BJP और AIADMK अलग हो गए थे, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में दोनों के बीच फिर राजनीतिक तालमेल देखने को मिला।

महाराष्ट्र में शिंदे गुट पहले से NDA के साथ था। अब उद्धव खेमे के छह सांसदों के आने से उसकी संसदीय ताकत और बढ़ गई।

बंगाल में TMC के भीतर विद्रोह और राज्यसभा में तीन पूर्व TMC सांसदों का BJP में जाना भी इसी व्यापक रणनीति की ओर संकेत करता है।


ओडिशा में BJD की क्रॉस वोटिंग ने भी खोली सेंधमारी की राह

BJP की रणनीति सिर्फ INDIA गठबंधन तक सीमित नहीं रही। ओडिशा में नवीन पटनायक की BJD को भी मार्च 2026 के राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग का सामना करना पड़ा।

16 मार्च को हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान BJD के छह विधायकों पर पार्टी लाइन से हटकर मतदान करने के आरोप लगे। इसके बाद पार्टी ने उनके खिलाफ कार्रवाई की। चुनाव से पहले ही ओडिशा में विधायकों की खरीद-फरोख्त और क्रॉस वोटिंग को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला था।

यह घटना बताती है कि BJP का प्रभाव बढ़ने की प्रक्रिया केवल सीधे दल-बदल से नहीं, बल्कि क्षेत्रीय दलों के भीतर असंतोष और सत्ता समीकरणों के बदलने से भी जुड़ी हुई है।


आखिर क्यों बिखर रहा INDIA?

INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी समस्या अब केवल संख्या नहीं, बल्कि साझा राजनीतिक दिशा दिखाई देती है।

2024 में BJP के खिलाफ एकजुट होना विपक्षी दलों का साझा लक्ष्य था। लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद वही दल अपने-अपने राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक हितों के साथ आगे बढ़े।

कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर BJP की मुख्य प्रतिद्वंद्वी है, लेकिन कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों के लिए कांग्रेस खुद सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती है।

पश्चिम बंगाल में TMC और कांग्रेस का रिश्ता इसका उदाहरण है। तमिलनाडु में DMK और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग और राजनीतिक रणनीति पर मतभेद सामने आए। पंजाब में AAP और कांग्रेस पहले से एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं।

यही INDIA की सबसे बड़ी संरचनात्मक कमजोरी है—दिल्ली में साझेदार, लेकिन राज्यों में प्रतिद्वंद्वी।

इसके उलट BJP ने NDA को एक चुनावी गठबंधन से आगे बढ़ाकर सत्ता और संसदीय प्रबंधन के एक व्यापक मंच के रूप में इस्तेमाल किया है।


2029 से पहले सबसे बड़ा सवाल: क्या विपक्ष फिर एकजुट हो पाएगा?

अगले लोकसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन 2024 से 2026 के बीच हुए राजनीतिक बदलाव ने 2029 की लड़ाई की जमीन जरूर बदल दी है।

विपक्ष के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि BJP को कितनी सीटों पर हराया जा सकता है। असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस और क्षेत्रीय दल एक साझा रणनीति, साझा नेतृत्व और साझा सीट-बंटवारे के फार्मूले पर सहमत हो पाएंगे?

दूसरी तरफ BJP के लिए चुनौती भी कम नहीं है। NDA का विस्तार जितना बढ़ेगा, सहयोगियों की महत्वाकांक्षाएं भी उतनी ही बढ़ेंगी। सीट बंटवारा, नेतृत्व, राज्यों में सत्ता की हिस्सेदारी और क्षेत्रीय दलों के हित भविष्य में गठबंधन की परीक्षा लेंगे।

फिलहाल संसद का गणित BJP के नेतृत्व वाले NDA के पक्ष में झुकता दिखाई दे रहा है। विपक्षी खेमे की ताकत में गिरावट और NDA की लगातार बढ़ती संख्या ने 2024 के बाद की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है।

2024 में सवाल था—क्या विपक्ष BJP को रोक पाएगा?

2026 में सवाल बदल चुका है—क्या विपक्ष खुद को एकजुट रख पाएगा?

और यही सवाल 2029 के लोकसभा चुनाव की सबसे बड़ी राजनीतिक पटकथा लिख सकता है।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
VIKAS TRIPATHI भारत देश की सभी छोटी और बड़ी खबरों को सामने दिखाने के लिए "पर्दाफास न्यूज" चैनल को लेके आए हैं। जिसके लोगो के बीच में करप्शन को कम कर सके। हम देश में समान व्यवहार के साथ काम करेंगे। देश की प्रगति को बढ़ाएंगे।
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