Thursday, August 13, 2026
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खनिज टैक्स पर केंद्र का बड़ा दांव: राज्यों के अधिकारों पर लगेगी लगाम, एक समान लेवी का रास्ता साफ; सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले के बाद नई कानूनी जंग के संकेत

नई दिल्ली : खनिज संसाधनों पर टैक्स, सेस और दूसरी लेवी को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों की पुरानी खींचतान अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। केंद्र सरकार ने Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 को राज्यसभा से भी पारित करा लिया है। लोकसभा से यह विधेयक एक दिन पहले पारित हुआ था। इसके साथ ही खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर राज्यों की कर लगाने की शक्ति को सीमित करने की दिशा में केंद्र ने बड़ा कदम उठा दिया है। अब विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून का रूप ले सकेगा।

सरकार का दावा है कि इस संशोधन का मकसद खनन क्षेत्र में Certainty, Stability and Predictability यानी निश्चितता, स्थिरता और पूर्वानुमेयता सुनिश्चित करना है। केंद्र के अनुसार, अलग-अलग राज्यों में खनिजों पर अलग-अलग दरों से टैक्स, सेस और अन्य लेवी लगाए जाने से खनन परियोजनाओं की लागत बढ़ती है, निवेश प्रभावित होता है और कई परियोजनाओं की व्यावसायिक व्यवहार्यता पर सवाल खड़े होते हैं।

लेकिन इस विधेयक का दूसरा पहलू कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है—यह राज्यों की उस कराधान शक्ति को सीमित करने की कोशिश करता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने जुलाई 2024 में व्यापक रूप से मान्यता दी थी। यही वजह है कि विधेयक अब केवल खनन क्षेत्र का आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि केंद्र-राज्य संवैधानिक अधिकारों के बड़े सवाल से भी जुड़ गया है।

नया सेक्शन 9-D: राज्यों के टैक्स पर केंद्र की शर्तें

विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं में नया Section 9-D शामिल है। प्रस्तावित प्रावधान के अनुसार, राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर किसी भी नाम से टैक्स, सेस या अन्य लेवी तभी लगा सकेंगी, जब वह केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों और सीमाओं के अनुरूप हो।

यानी भविष्य में किसी राज्य द्वारा खनिज क्षेत्र में नया वित्तीय बोझ डालने की शक्ति पूरी तरह स्वतंत्र नहीं रहेगी। केंद्र कानून और उसके तहत बनाए गए नियमों के माध्यम से यह तय करने की स्थिति में होगा कि राज्य किस तरह की लेवी लगा सकते हैं और उसकी सीमा क्या होगी।

यहीं से इस विधेयक का सबसे बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक सवाल पैदा होता है—क्या खनिज संपदा वाले राज्यों की राजस्व जुटाने की स्वतंत्रता अब केंद्र के नियमों पर निर्भर हो जाएगी?

सरकार का जवाब है कि यह कदम राज्यों के अधिकार छीनने के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश में खनिज क्षेत्र के लिए एक समान वित्तीय व्यवस्था बनाने के लिए है। केंद्र का तर्क है कि खनिज संसाधन देश के कुछ चुनिंदा राज्यों में केंद्रित हैं और यदि हर राज्य अपनी अलग कर व्यवस्था बनाता है तो देश में खनन उद्योग के लिए असमान वित्तीय वातावरण पैदा होता है।

पहले से वसूली गई रकम पर क्या होगा?

विधेयक में एक महत्वपूर्ण संक्रमणकालीन व्यवस्था भी रखी गई है। इसके लागू होने से पहले यदि किसी राज्य सरकार ने ऐसा टैक्स, सेस या लेवी वसूल या प्राप्त नहीं किया है, तो उसे प्रारंभ से ही अमान्य माना जाएगा।

हालांकि, जो राशि पहले ही राज्य सरकार को जमा हो चुकी है या वसूल की जा चुकी है, उसकी वापसी की जिम्मेदारी इस व्यवस्था के तहत नहीं होगी।

इसका अर्थ यह है कि कानून लागू होने के बाद राज्यों के लिए भविष्य की लेवी व्यवस्था पर केंद्र की सीमाएं अधिक स्पष्ट होंगी, जबकि पहले से वसूली गई रकम को अलग कानूनी स्थिति में रखा जाएगा।

धारा 13 में संशोधन: नियम बनाने की ताकत केंद्र के पास

विधेयक में MMDR Act, 1957 की धारा 13 में भी संशोधन का प्रस्ताव है। इसके जरिए केंद्र सरकार को नियम बनाने की शक्ति मिलेगी, जिसके माध्यम से यह तय किया जा सकेगा कि राज्य सरकारें खनिज अधिकारों अथवा खनिज-युक्त भूमि पर टैक्स, सेस या अन्य लेवी किन परिस्थितियों, शर्तों और सीमाओं के अधीन लगा सकती हैं।

यानी कानून केवल राज्य की कराधान शक्ति पर सिद्धांतात्मक सीमा नहीं लगाएगा, बल्कि उसके संचालन की बारीकियां तय करने के लिए केंद्र को नियम बनाने की शक्ति भी देगा।

केंद्र सरकार की दलील है कि खनन परियोजनाओं में निवेश लंबे समय के लिए होता है। किसी खदान को विकसित करने में भारी पूंजी लगती है और निवेशक वर्षों तक उत्पादन तथा राजस्व का अनुमान लगाकर परियोजना शुरू करते हैं। ऐसे में यदि परियोजना शुरू होने के बाद अचानक नया टैक्स, सेस या डिस्पैच आधारित लेवी लागू हो जाए तो पूरी आर्थिक गणना बदल सकती है।

सरकार इसी अनिश्चितता को कम करना चाहती है।

छोटे और मध्यम खनन कारोबार पर सबसे ज्यादा असर?

खनन क्षेत्र की बड़ी कंपनियां अतिरिक्त वित्तीय बोझ को कुछ हद तक संभाल सकती हैं, लेकिन छोटे और मध्यम स्तर के खनन संचालकों के लिए स्थिति अधिक कठिन हो सकती है।

यदि खनिज की कीमत और उत्पादन लागत के बीच पहले से ही सीमित अंतर हो और उसके ऊपर अलग-अलग स्तरों पर टैक्स तथा लेवी बढ़ जाएं, तो खदान चलाना आर्थिक रूप से मुश्किल हो सकता है। कुछ मामलों में उत्पादन घट सकता है और कमजोर परियोजनाएं बंद भी हो सकती हैं।

सरकार के अनुसार, खनिजों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ का असर केवल खनन कंपनी तक सीमित नहीं रहता। उत्पादन, परिवहन और प्रसंस्करण लागत बढ़ने पर स्टील, सीमेंट, निर्माण सामग्री और अन्य खनिज आधारित उत्पादों की लागत भी प्रभावित हो सकती है।

अंततः इसका असर उपभोक्ता तक पहुंच सकता है।

यानी केंद्र इस विधेयक को केवल ‘माइनिंग टैक्स सुधार’ के रूप में नहीं देख रहा, बल्कि इसे व्यापक औद्योगिक लागत और निवेश वातावरण से जोड़ रहा है।

सरकार का तर्क: अलग-अलग राज्यों के अलग टैक्स से बिगड़ता है निवेश गणित

केंद्र सरकार का कहना है कि देश में खनिज संसाधनों का वितरण समान नहीं है। कुछ राज्यों में कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट और अन्य खनिजों के बड़े भंडार हैं, जबकि कई राज्य खनिज उत्पादन में अपेक्षाकृत पीछे हैं।

ऐसे में यदि खनिज संपदा वाले राज्यों में अलग-अलग प्रकार की लेवी और अलग-अलग दरें लागू होती हैं, तो कंपनियों के लिए परियोजनाओं की लागत राज्य-दर-राज्य बदल जाती है।

सरकार के अनुसार, समस्या तब और गंभीर होती है जब खनन शुरू होने के बाद नए वित्तीय दायित्व सामने आते हैं। उत्पादन या डिस्पैच पर अतिरिक्त लेवी, नई सेस व्यवस्था अथवा पिछली अवधि से टैक्स लगाने की कोशिश निवेशकों के लिए अनिश्चितता पैदा करती है।

केंद्र का कहना है कि निवेश तभी आएगा जब निवेशक को यह पता हो कि आज लगाई गई लागत और कल की देनदारी के बीच कितना अंतर हो सकता है।

इसीलिए बिल के पीछे का मूल विचार है—खनन क्षेत्र में वित्तीय नियमों को अधिक स्थिर और पूर्वानुमेय बनाया जाए।

लेकिन असली विवाद यहीं से शुरू होता है: सुप्रीम कोर्ट का 2024 फैसला

इस विधेयक को समझने के लिए जुलाई 2024 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को समझना जरूरी है।

Mineral Area Development Authority बनाम Steel Authority of India मामले में नौ जजों की संविधान पीठ ने 8:1 के बहुमत से कहा था कि राज्यों के पास खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने की संवैधानिक शक्ति है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि खनन कंपनियों द्वारा केंद्र को दी जाने वाली रॉयल्टी को टैक्स नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के बहुमत के अनुसार, राज्य विधानसभाओं की खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने की शक्ति संविधान की Entry 50, List II से जुड़ी है। हालांकि यह शक्ति पूरी तरह असीमित नहीं है। उसी संवैधानिक प्रविष्टि में यह व्यवस्था है कि संसद खनिज विकास से संबंधित कानून के जरिए राज्यों की इस शक्ति पर सीमाएं लगा सकती है।

यही बिंदु 2026 के संशोधन को संवैधानिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बना देता है।

केंद्र अब इसी संसदीय शक्ति का इस्तेमाल करते हुए राज्यों की लेवी पर व्यापक सीमाएं तय करने की कोशिश कर रहा है।

इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि नया कानून सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले को सीधे ‘खत्म’ नहीं करता, बल्कि उस फैसले में मान्य राज्य शक्ति पर संसद द्वारा वैधानिक सीमाएं लगाने की संवैधानिक गुंजाइश का इस्तेमाल करने की कोशिश करता है।

राज्यों के सामने राजस्व का सवाल

खनिज संपदा वाले राज्यों के लिए यह केवल अधिकारों का सवाल नहीं, बल्कि राजस्व का भी मुद्दा है।

खनिज उत्पादन से मिलने वाली रॉयल्टी, टैक्स, सेस और अन्य राजस्व मदें कई राज्यों की वित्तीय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे राज्यों का तर्क हो सकता है कि खनिज उनके भूभाग से निकलता है, उसके कारण पर्यावरणीय और सामाजिक लागत भी स्थानीय स्तर पर पड़ती है, इसलिए राज्य को उससे संबंधित राजस्व पर पर्याप्त अधिकार होना चाहिए।

यही वजह है कि संशोधन के खिलाफ राजनीतिक और कानूनी प्रतिक्रिया की संभावना बढ़ गई है। केरल ने पहले ही केंद्र के प्रस्तावित बदलावों का विरोध किया है और इसे राज्यों की कराधान तथा भूमि संबंधी शक्तियों को सीमित करने वाला कदम बताया है। राज्य ने कानूनी विकल्पों पर भी विचार करने की बात कही है।

यह विवाद आने वाले समय में केवल संसद के भीतर नहीं, बल्कि अदालतों में भी पहुंच सकता है।

क्या केंद्र बनाम राज्य की नई संवैधानिक लड़ाई शुरू होगी?

भारत की संघीय व्यवस्था में प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार हमेशा संवेदनशील विषय रहा है। खनिज संपदा का मामला और भी जटिल है क्योंकि इसमें तीन स्तर एक साथ आते हैं—खनिज विकास का केंद्रीय नियमन, राज्यों की कराधान शक्ति और स्थानीय स्तर पर भूमि एवं पर्यावरण से जुड़े प्रभाव।

2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के अधिकार को स्पष्ट किया था। अब केंद्र संसद के माध्यम से उस शक्ति पर सीमाएं तय करने की कोशिश कर रहा है।

इसलिए आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि प्रस्तावित Section 9-D और धारा 13 में किए जाने वाले बदलाव संविधान की संबंधित प्रविष्टियों और 2024 के फैसले में निर्धारित सिद्धांतों के साथ किस तरह संतुलित होते हैं।

अगर राज्यों को लगता है कि केंद्र ने संसद की सीमा से आगे जाकर उनकी संवैधानिक शक्ति को लगभग निष्प्रभावी कर दिया है, तो मामला फिर न्यायपालिका तक पहुंच सकता है।

खनन उद्योग के लिए राहत या राज्यों के लिए राजस्व संकट?

सरकार इसे निवेश, उत्पादन और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने वाला सुधार बता रही है। उद्योग के नजरिए से देखें तो स्थिर कर व्यवस्था निश्चित रूप से लंबे समय की परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण है। किसी खदान में निवेश करने वाली कंपनी को वर्षों तक टैक्स और लेवी की संभावित लागत का अनुमान लगाना पड़ता है।

लेकिन संघीय ढांचे के नजरिए से सवाल अलग है।

यदि राज्यों को खनिज अधिकारों से मिलने वाले राजस्व पर केंद्र की शर्तों का पालन करना पड़ेगा, तो खनिज संपदा वाले राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है। यही वह बिंदु है जहां ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ और ‘फिस्कल फेडरलिज्म’ आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं।

फैसला अब सिर्फ खदानों का नहीं, संघीय ढांचे का भी

Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 का असर खनन उद्योग से कहीं व्यापक हो सकता है। एक तरफ केंद्र देशभर में समान, स्थिर और अनुमान लगाने योग्य वित्तीय व्यवस्था बनाना चाहता है; दूसरी तरफ राज्यों के सामने अपनी संवैधानिक कराधान शक्ति और राजस्व की रक्षा का सवाल खड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले ने राज्यों के अधिकार को मजबूत किया था, लेकिन उसी फैसले में यह भी स्वीकार किया गया था कि संसद खनिज विकास से जुड़े कानून के माध्यम से उन अधिकारों पर सीमाएं लगा सकती है।

अब 2026 का संशोधन इसी संवैधानिक संतुलन की अगली परीक्षा बन सकता है।

केंद्र के लिए चुनौती यह होगी कि वह खनन उद्योग को करों और लेवी की अनिश्चितता से बचाए, लेकिन ऐसा करते समय राज्यों की संवैधानिक और वित्तीय स्वायत्तता पर जरूरत से ज्यादा अंकुश न लगे।

और राज्यों के सामने सवाल यह होगा कि क्या खनिज संपदा से होने वाली कमाई पर उनका अधिकार केवल संविधान की किताब में रहेगा या व्यवहार में भी उतना ही प्रभावी रहेगा।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि यह विधेयक सिर्फ खदानों से निकलने वाले कोयले, लौह अयस्क या दूसरे खनिजों की कीमत तय करने वाला कानून नहीं है। यह तय करने की कोशिश भी है कि खनिज संपदा से मिलने वाले राजस्व पर अंतिम नियंत्रण किसके हाथ में होगा—राज्य के या केंद्र के।

राज्यसभा से पारित होने के साथ इस बहस का पहला संसदीय चरण पूरा हो गया है। अब राष्ट्रपति की मंजूरी, कानून के लागू होने और उसके बाद केंद्र द्वारा बनाए जाने वाले नियमों पर सबकी नजर रहेगी। वहीं, यदि राज्यों ने इसे अपनी संवैधानिक शक्ति में हस्तक्षेप माना, तो अगला बड़ा मंच अदालत हो सकता है।

यानी खनिजों की लड़ाई अब सिर्फ जमीन के नीचे नहीं—संविधान की जमीन पर भी लड़ी जाने की संभावना है।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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