Wednesday, September 23, 2026
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“जयशंकर ने वैश्विक व्यवस्था में विकासशील देशों की प्रभावी भागीदारी की उठाई आवाज; ऊर्जा-खाद्य सुरक्षा से लेकर AI

नई दिल्ली:दुनिया आज संघर्षों, भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक बाधाओं, सप्लाई चेन में व्यवधान, निवेश के बिखराव और जलवायु संकट जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रही है। इन संकटों का सीधा और गहरा असर विकासशील देशों पर पड़ रहा है। इसके बावजूद वैश्विक निर्णय लेने वाली संस्थाओं में इन देशों की भागीदारी अभी भी उनकी वास्तविक स्थिति और जरूरतों के अनुरूप नहीं है। भारत ने इसी असंतुलन को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रमुखता से उठाया है।

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने ग्लोबल साउथ देशों की एक उच्चस्तरीय मंत्रिस्तरीय बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि आज ग्लोबल साउथ वैश्विक संकटों की ‘फ्रंट रो’ में खड़ा है, लेकिन वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उसकी स्थिति ‘बैक रो’ जैसी बनी हुई है। उन्होंने मौजूदा वैश्विक संस्थाओं और व्यवस्थाओं में सुधार की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि ये संस्थाएं काफी हद तक उस दौर की शक्ति संरचनाओं को प्रतिबिंबित करती हैं, जब दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताएं अलग थीं।

जयशंकर के संबोधन में भारत ने साफ किया कि वैश्विक व्यवस्था में सुधार केवल संस्थागत बदलाव का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध विकासशील देशों के आर्थिक विकास, सुरक्षा, खाद्य और ऊर्जा जरूरतों तथा भविष्य की तकनीकी संभावनाओं से है।

संघर्ष बढ़े तो सबसे पहले प्रभावित होता है ग्लोबल साउथ

विदेश मंत्री ने कहा कि पिछले एक साल में दुनिया में सक्रिय संघर्षों की संख्या बढ़ी है। किसी भी क्षेत्र में होने वाला संघर्ष अब केवल उस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। उसका असर ऊर्जा बाजार, खाद्य आपूर्ति, व्यापार, परिवहन और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

विकासशील देशों के लिए यह चुनौती और गंभीर हो जाती है क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्थाएं ऊर्जा, खाद्य पदार्थों, उर्वरकों, आवश्यक वस्तुओं और वैश्विक सप्लाई चेन में होने वाले बदलावों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकती हैं।

जयशंकर ने कहा कि जिस समय दुनिया को बहुपक्षवाद को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए था, उसी समय बहुपक्षीय व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। उन्होंने ग्लोबल साउथ से आग्रह किया कि सप्लाई चेन, वित्त और कनेक्टिविटी में ऐसे ‘चोक पॉइंट्स’ को सामान्य या वैध व्यवस्था के रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, जिनका इस्तेमाल देशों की आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।

ऊर्जा सुरक्षा को राजनीति का हथियार न बनाया जाए

भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को विकास की बुनियादी जरूरत के रूप में रेखांकित किया। जयशंकर ने कहा कि ऊर्जा की उपलब्धता और उसकी कीमतें किसी देश के विकास की गति को सीधे प्रभावित करती हैं। ऐसे में ऊर्जा संसाधनों और उनकी आपूर्ति को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए नियंत्रित या प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।

विकासशील देशों के लिए ऊर्जा की कीमतों में अचानक होने वाला बदलाव महंगाई, औद्योगिक उत्पादन और आम नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डाल सकता है। इसलिए भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को अधिक स्थिर, भरोसेमंद और न्यायसंगत बनाने की जरूरत बताई।

इसी के साथ खाद्य सुरक्षा को भी साझा वैश्विक लक्ष्य बताया गया। जयशंकर ने अनाज और उर्वरकों की आपूर्ति से जुड़ी बाधाओं को तेजी से दूर करने पर जोर दिया, ताकि संघर्षों और भू-राजनीतिक तनावों का असर दुनिया की खाद्य सुरक्षा पर न पड़े।

ग्लोबल साउथ सिर्फ बाजार नहीं, उत्पादन का केंद्र बने

भारत ने आर्थिक और व्यापारिक व्यवस्था में ऐसे बदलाव की आवश्यकता बताई, जिससे विकासशील देशों की उत्पादन क्षमता मजबूत हो सके। जयशंकर ने इस बात पर जोर दिया कि ग्लोबल साउथ के देशों को केवल बड़े बाजार या उपभोक्ता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

इन देशों के पास अपनी औद्योगिक क्षमता विकसित करने, रोजगार पैदा करने और वैश्विक उत्पादन नेटवर्क का हिस्सा बनने का अवसर होना चाहिए। इसके लिए निष्पक्ष व्यापार व्यवस्था, निवेश, तकनीक और औद्योगीकरण तक बेहतर पहुंच जरूरी है।

भारत की ओर से यह संदेश भी दिया गया कि विकासशील देशों के औद्योगीकरण के अधिकार को नकारा नहीं जाना चाहिए। आर्थिक विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहे देशों को अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए पर्याप्त नीति-स्थान मिलना चाहिए।

समुद्री रास्ते सुरक्षित रहना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी

जयशंकर ने समुद्री मार्गों की सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण वैश्विक प्राथमिकता बताया। उन्होंने maritime commons को सुरक्षित रखने, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करने और समुद्री व्यापार से जुड़े लोगों यानी seafarers तथा commercial shipping की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों के जरिए संचालित होता है। ऐसे में समुद्री रास्तों में किसी भी तरह का व्यवधान केवल जहाजों की आवाजाही को प्रभावित नहीं करता, बल्कि इसका असर ईंधन, खाद्य पदार्थों, कच्चे माल और तैयार उत्पादों की वैश्विक आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।

भारत के लिए समुद्री सुरक्षा इसलिए भी अहम है क्योंकि देश की आर्थिक गतिविधियों और वैश्विक व्यापार का एक बड़ा हिस्सा समुद्री परिवहन से जुड़ा हुआ है।

AI विकास का नया माध्यम बने, नया डिजिटल विभाजन नहीं

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर भी भारत ने ग्लोबल साउथ की चिंताओं को सामने रखा। जयशंकर ने कहा कि AI दुनिया में तेजी से बदलाव ला रहा है, लेकिन इसके कारण नया वैश्विक डिजिटल विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए।

तकनीक पर कुछ देशों या कंपनियों की अत्यधिक निर्भरता विकासशील देशों के लिए नई असमानताएं पैदा कर सकती है। ऐसे में भारत ने ग्लोबल साउथ के देशों के बीच स्वदेशी रूप से विकसित AI टूल्स और फ्रेमवर्क साझा करने का सुझाव दिया।

भारत ने AI को मानव-केंद्रित बनाए रखने पर भी जोर दिया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नई तकनीक का लाभ समाज के व्यापक वर्गों तक पहुंचे और विकासशील देशों को केवल तकनीक के उपभोक्ता की भूमिका तक सीमित न रहना पड़े।

Climate action में आत्मनिर्भर सहयोग पर जोर

जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर भी भारत ने ग्लोबल साउथ के देशों के बीच सहयोग को मजबूत करने की जरूरत बताई। जयशंकर ने कहा कि जलवायु कार्रवाई के लिए विकासशील देशों को केवल ग्लोबल नॉर्थ पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

उन्होंने भारत के नेतृत्व वाले International Solar Alliance (ISA) और Coalition for Disaster Resilient Infrastructure (CDRI) जैसे मंचों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। इन पहलों के जरिए विकासशील देश नवीकरणीय ऊर्जा, आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे और जलवायु अनुकूलन के क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ा सकते हैं।

भारत का जोर इस बात पर रहा कि जलवायु संकट से निपटने के प्रयासों में विकासशील देशों की जरूरतों, वित्तीय क्षमताओं और विकास संबंधी प्राथमिकताओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

मौजूदा मंचों का इस्तेमाल कर अपनी आवाज मजबूत करे ग्लोबल साउथ

जयशंकर ने ग्लोबल साउथ के देशों से अपने मौजूदा बहुपक्षीय मंचों का प्रभावी इस्तेमाल करने का आह्वान किया। उनका कहना था कि विकासशील देशों की जिन चिंताओं का उनके भविष्य पर सीधा असर पड़ता है, उन्हें वैश्विक एजेंडे में पीछे नहीं जाने देना चाहिए।

इसके लिए ग्लोबल साउथ के देशों के बीच अधिक करीबी आर्थिक सहयोग की जरूरत है। अगर विकासशील देश एक-दूसरे के साथ व्यापार, निवेश, तकनीक, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और कनेक्टिविटी के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाते हैं, तो बाहरी संकटों का असर कम करने की क्षमता भी मजबूत हो सकती है।

UN Reform पर भारत का स्पष्ट जोर

भारत ने संयुक्त राष्ट्र और व्यापक बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार को भी ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं से जोड़ते हुए महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। जयशंकर के संबोधन का केंद्रीय संदेश यही रहा कि जिन देशों पर वैश्विक फैसलों का सबसे ज्यादा असर पड़ता है, उनकी आवाज भी निर्णय लेने वाली संस्थाओं में प्रभावी रूप से सुनी जानी चाहिए।

मौजूदा वैश्विक संस्थाओं की संरचना लंबे समय पहले की परिस्थितियों में बनी थी। आज दुनिया की अर्थव्यवस्था, जनसंख्या, उत्पादन और विकास का भूगोल बदल चुका है। ऐसे में भारत का तर्क है कि वैश्विक संस्थाओं में भी इन बदलती वास्तविकताओं का प्रतिनिधित्व दिखाई देना चाहिए।

भारत की प्राथमिकताओं का खाका

जयशंकर के संबोधन में ग्लोबल साउथ के लिए भारत की प्राथमिकताएं कई स्तरों पर सामने आईं—ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा, निष्पक्ष व्यापार, उत्पादन क्षमता और औद्योगीकरण, सुरक्षित समुद्री मार्ग, AI में समान अवसर, जलवायु कार्रवाई, आर्थिक सहयोग और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार।

इन सभी मुद्दों के केंद्र में एक ही सवाल दिखाई देता है—क्या वैश्विक व्यवस्था विकासशील देशों को केवल संकटों का सामना करने वाला पक्ष मानेगी या उन्हें वैश्विक फैसलों को आकार देने में भी पर्याप्त भूमिका देगी?

भारत ने अपने संदेश में इस बात पर जोर दिया कि ग्लोबल साउथ को वैश्विक अर्थव्यवस्था का केवल बाजार नहीं, बल्कि उत्पादन, नवाचार, तकनीक और विकास का सक्रिय भागीदार बनाया जाना चाहिए।

जयशंकर का संबोधन ऐसे समय में आया है जब दुनिया कई समानांतर संकटों से गुजर रही है और बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रभावशीलता पर बहस जारी है। भारत ने ग्लोबल साउथ के देशों के बीच सहयोग बढ़ाने और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी मजबूत करने को भविष्य की वैश्विक व्यवस्था की महत्वपूर्ण जरूरत के रूप में सामने रखा है।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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