नई दिल्ली: देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET को लेकर जारी विवाद अब केवल पेपर लीक या परीक्षा अनियमितताओं तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला अब सीधे सरकार की जवाबदेही, शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता और लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बनता जा रहा है।
लगातार सामने आ रहे पेपर लीक, कथित धांधली और परीक्षा प्रबंधन में गंभीर सवालों के बीच अब केंद्र सरकार और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधे सवाल पूछे जा रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब किसी विभाग में बार-बार लापरवाही या विफलता सामने आती है, तो सरकार संबंधित अधिकारियों का ट्रांसफर कर देती है या उन्हें पद से हटा दिया जाता है। फिर आखिर NEET जैसी राष्ट्रीय परीक्षा में लगातार विवादों के बावजूद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और NTA DG अभिषेक सिंह पर अब तक कोई बड़ी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
आलोचकों का कहना है कि यदि एक बार पेपर लीक होता तो उसे “मानवीय भूल” कहा जा सकता था, लेकिन बार-बार पेपर लीक और परीक्षा से जुड़ी अनियमितताओं के आरोप यह दर्शाते हैं कि या तो व्यवस्था पूरी तरह विफल है या फिर जिम्मेदार लोग अपने पद के अनुरूप काम करने में असफल साबित हुए हैं।
“जिम्मेदारी सिर्फ छोटे आरोपियों तक सीमित क्यों?”
सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि दोषियों पर कार्रवाई होगी, जांच एजेंसियां सक्रिय हैं और सख्त कदम उठाए जा रहे हैं। लेकिन छात्रों, अभिभावकों और शिक्षा से जुड़े कई लोगों का सवाल है कि क्या कार्रवाई सिर्फ निचले स्तर तक सीमित रहेगी?
लोग पूछ रहे हैं कि जब लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर हो, तब जवाबदेही शीर्ष स्तर पर तय क्यों नहीं की जा रही?
कई छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों ने मांग की है कि:
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और NTA DG अभिषेक सिंह नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दें
यदि वे इस्तीफा नहीं देते, तो सरकार उन्हें पद से बर्खास्त करे
परीक्षा प्रणाली की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए
“क्या भारत में शिक्षा अब व्यवसाय बन चुकी है?”
NEET विवाद ने देश में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक और बड़ी बहस छेड़ दी है।
दुनिया के कई विकसित देशों में शिक्षा को मौलिक अधिकार और सामाजिक जिम्मेदारी माना जाता है। वहां उच्च शिक्षा तक या तो मुफ्त है या बेहद कम लागत पर उपलब्ध कराई जाती है। सरकारें इस बात पर ध्यान देती हैं कि कोई भी छात्र आर्थिक या व्यवस्थागत कारणों से पीछे न रह जाए।
लेकिन भारत में शिक्षा का स्वरूप लगातार बदलता दिखाई दे रहा है।
महंगी कोचिंग इंडस्ट्री, निजी संस्थानों का बढ़ता प्रभाव, प्रवेश परीक्षाओं का दबाव और अब पेपर लीक जैसे मामलों ने शिक्षा को “सेवा” से ज्यादा “व्यापार” बना दिया है।
आज लाखों परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई पर जीवनभर की कमाई खर्च कर देते हैं। छात्र वर्षों तक दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन जब परीक्षा प्रणाली पर ही सवाल खड़े होने लगें, तो सबसे बड़ा नुकसान युवाओं के भरोसे को होता है।
छात्रों और अभिभावकों में गहरा आक्रोश
देशभर में छात्रों और अभिभावकों के बीच भारी नाराजगी देखी जा रही है। सोशल मीडिया पर लगातार यह सवाल पूछा जा रहा है कि जब आम सरकारी विभागों में छोटी गलती पर भी अधिकारियों को हटाया जा सकता है, तो देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा में लगातार विवादों के बावजूद शीर्ष स्तर पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
कई छात्रों का कहना है कि पेपर लीक केवल परीक्षा नहीं बिगाड़ता, बल्कि यह उन लाखों मेहनती युवाओं का मनोबल तोड़ देता है जो ईमानदारी से अपने भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं।
“देश को जवाब चाहिए”
अब यह मुद्दा केवल परीक्षा प्रबंधन का नहीं, बल्कि जवाबदेही और विश्वास का बन चुका है।
लोग पूछ रहे हैं:
अगर बार-बार विफलता के बाद भी कोई जिम्मेदार नहीं माना जाएगा, तो फिर जवाबदेही किसे कहा जाएगा?
और सबसे बड़ा सवाल सीधे प्रधानमंत्री मोदी से पूछा जा रहा है —














