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महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव से पहले महायुति में बढ़ी बेचैनी: सीट बंटवारे के बाद असंतोष ने बढ़ाई चिंता, क्या अंदरूनी कलह बिगाड़ सकती है जीत का गणित?

“17 सीटों पर जीत का दावा, लेकिन बगावत की आहट ने बढ़ाई नेतृत्व की मुश्किलें”

मुंबई। महाराष्ट्र विधान परिषद की 17 सीटों के चुनाव से पहले सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन ने लंबे मंथन के बाद सीटों का फार्मूला तो तय कर लिया है, लेकिन इसके साथ ही गठबंधन के भीतर असंतोष, नाराजगी और संभावित बगावत के संकेत भी खुलकर सामने आने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संख्या बल के लिहाज से महायुति मजबूत स्थिति में जरूर दिखाई दे रही है, लेकिन यदि सहयोगी दलों और स्थानीय नेताओं की नाराजगी समय रहते दूर नहीं हुई तो कुछ सीटों पर मुकाबला अपेक्षा से अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।


केवल सीट बंटवारा नहीं, गठबंधन की एकजुटता की भी परीक्षा

महाराष्ट्र की राजनीति में महायुति केवल एक चुनावी गठबंधन नहीं बल्कि भाजपा, एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के बीच सत्ता संतुलन का एक जटिल राजनीतिक प्रयोग है।

ऐसे में विधान परिषद चुनाव का यह सीट बंटवारा केवल उम्मीदवार तय करने की प्रक्रिया नहीं बल्कि गठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन और राजनीतिक प्रभाव का भी संकेत माना जा रहा है।

सबसे अधिक चर्चा मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना को मिली सीटों को लेकर हुई। पार्टी छह सीटों की मांग कर रही थी, लेकिन अंततः उसे केवल चार सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। इससे यह संदेश भी गया कि गठबंधन में अंतिम निर्णय लेने की स्थिति में भाजपा अब भी सबसे प्रभावशाली भूमिका में है।


रायगढ़ से लेकर नासिक तक क्यों बढ़ रहा है असंतोष?

रायगढ़ सीट पर एनसीपी नेता सुनील तटकरे के बेटे को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद स्थानीय स्तर पर असंतोष देखने को मिला। शिवसेना के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इसे अपने प्रभाव क्षेत्र की अनदेखी के रूप में देखा।

इसी तरह नासिक और ठाणे जैसी सीटें, जहां भाजपा की मजबूत संगठनात्मक पकड़ मानी जाती है, गठबंधन समीकरणों के चलते शिंदे गुट को दे दी गईं। इससे भाजपा कार्यकर्ताओं के एक वर्ग में भी नाराजगी की चर्चा है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि चुनावी गणित के लिए किए गए समझौते कभी-कभी संगठनात्मक असंतोष को जन्म देते हैं, जिसका असर मतदान के समय दिखाई दे सकता है।


भाजपा के भीतर भी बढ़ी बेचैनी

धाराशिव-बीड़-लातूर सीट से हाल ही में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए बसवराज पाटिल को उम्मीदवार बनाए जाने से पुराने भाजपा कार्यकर्ताओं में असंतोष सामने आया है।

यह सवाल भी उठ रहा है कि वर्षों से संगठन के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर दूसरे दलों से आए नेताओं को प्राथमिकता देना क्या भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित कर सकता है?

राजनीतिक दलों के लिए यह एक गंभीर चुनौती होती है क्योंकि चुनाव केवल नेताओं के भरोसे नहीं बल्कि कार्यकर्ताओं की सक्रियता से भी जीते जाते हैं।


अब्दुल सत्तार का कदम क्यों माना जा रहा है बड़ा राजनीतिक संदेश?

जालना-छत्रपति संभाजीनगर सीट पर पूर्व मंत्री अब्दुल सत्तार द्वारा अपने बेटे समीर सत्तार का नामांकन दाखिल कराना केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं माना जा रहा।

राजनीतिक हलकों में इसे शिवसेना के भीतर बढ़ते असंतोष और नेतृत्व के निर्णयों के प्रति नाराजगी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

यदि ऐसे बागी उम्मीदवार नामांकन वापस नहीं लेते हैं तो इससे गठबंधन के अधिकृत उम्मीदवारों को नुकसान पहुंच सकता है।


यवतमाल सीट ने भी बढ़ाई शिंदे नेतृत्व की चुनौती

यवतमाल में मंत्री संजय राठौड़ अपनी पत्नी के लिए टिकट चाहते थे, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने उनकी मांग को स्वीकार नहीं किया।

इसके बजाय दुष्यंत चतुर्वेदी को दोबारा उम्मीदवार बनाए जाने से स्थानीय स्तर पर असहमति के स्वर सुनाई देने लगे हैं।

यह घटनाक्रम दर्शाता है कि महायुति के भीतर केवल दलों के बीच ही नहीं बल्कि दलों के अंदर भी राजनीतिक संतुलन बनाए रखना नेतृत्व के लिए चुनौती बना हुआ है।


क्या संख्या बल ही जीत की गारंटी है?

वर्तमान विधानसभा गणित को देखें तो महायुति सभी 17 सीटों पर मजबूत स्थिति में दिखाई देती है। भाजपा, शिवसेना और एनसीपी के संयुक्त संख्या बल के कारण विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती खड़ी है।

लेकिन भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि कई बार चुनाव केवल संख्या बल से नहीं जीते जाते।

क्रॉस वोटिंग, नाराज विधायकों का रुख, बागी उम्मीदवारों की सक्रियता और स्थानीय राजनीतिक समीकरण अंतिम परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।

इसी कारण राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि महायुति के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं बल्कि अपनी आंतरिक एकजुटता बनाए रखना है।


2029 की राजनीति का संकेत भी हो सकता है यह चुनाव

विशेषज्ञों का मानना है कि विधान परिषद चुनाव केवल वर्तमान सीटों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह भविष्य की राजनीति का संकेत भी देगा।

इन चुनावों से यह स्पष्ट होगा कि भाजपा, शिवसेना और एनसीपी के बीच सत्ता संतुलन किस दिशा में जा रहा है, कौन सा दल गठबंधन के भीतर अधिक प्रभावशाली है और स्थानीय स्तर पर किस नेता की पकड़ मजबूत बनी हुई है।


सबसे बड़ा सवाल

महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव में महायुति के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं बल्कि अपनी ही पंक्ति में उठ रही असहमति है।

अब सबकी नजर नामांकन वापसी की अंतिम तिथि पर टिकी है।

क्या महायुति नेतृत्व नाराज नेताओं को मना पाएगा?

क्या बागी उम्मीदवार पीछे हटेंगे या चुनावी मुकाबले को रोचक बनाएंगे?

और क्या संख्या बल के बावजूद अंदरूनी कलह महायुति की कुछ सीटों पर मुश्किलें बढ़ा सकती है?

इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति की नई दिशा तय कर सकते हैं।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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