“बिंदी, तिलक, सिंदूर पर कथित रोक और हिजाब-पगड़ी को छूट के आरोपों के बाद देशभर में आक्रोश; कंपनी की सफाई के बावजूद बहस जारी”
नई दिल्ली,: देश की अग्रणी आईवियर कंपनी लेंसकार्ट एक ऐसे विवाद में घिर गई है जिसने कॉर्पोरेट भारत की कार्यसंस्कृति, धार्मिक समानता और सांस्कृतिक संवेदनशीलता को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर कंपनी के एक कथित आंतरिक ड्रेस कोड दस्तावेज़ के वायरल होने के बाद देशभर में तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। आरोप लगाया गया कि कंपनी की पूर्व गूमिंग गाइडलाइन में कर्मचारियों को बिंदी, तिलक, सिंदूर और कलावा जैसे पारंपरिक हिंदू धार्मिक प्रतीकों से परहेज करने को कहा गया था, जबकि हिजाब और पगड़ी को अनुमति दी गई थी। इस कथित असमानता ने देखते ही देखते जनाक्रोश का रूप ले लिया और #BoycottLenskart जैसे अभियान सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगे।
वायरल दस्तावेज़ ने भड़काई बहस
अप्रैल के तीसरे सप्ताह में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर Lenskart का एक कथित स्टोर स्टाइल एवं ग्रूमिंग गाइड प्रसारित हुआ। दस्तावेज़ में कर्मचारियों की वर्दी, बाल, मेकअप और व्यक्तिगत प्रस्तुति से जुड़े कई निर्देश बताए गए। विवाद तब बढ़ा जब उसमें धार्मिक प्रतीकों के संदर्भ में कथित तौर पर लिखा पाया गया कि बिंदी, स्टिकर, तिलक, कलावा तथा स्पष्ट सिंदूर जैसे चिह्न “प्रोफेशनल लुक” के अनुरूप नहीं माने जाएंगे, जबकि हिजाब और सिख पगड़ी को छूट दी गई थी। इस कथित नीति को लोगों ने चयनात्मक उदारवाद और सांस्कृतिक पक्षपात का उदाहरण बताया।
सोशल मीडिया पर बहिष्कार की मांग
दस्तावेज़ के सामने आते ही सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं ने कंपनी के खिलाफ नाराजगी जताई। अनेक उपयोगकर्ताओं ने प्रश्न उठाया कि यदि भारत जैसे बहुधार्मिक समाज में एक कंपनी कुछ धार्मिक प्रतीकों को स्वीकार करती है, तो अन्य प्रतीकों को अनुपयुक्त कैसे ठहरा सकती है।
X और इंस्टाग्राम पर हजारों पोस्टों में इसे “हिंदू प्रतीकों के प्रति कॉर्पोरेट असहजता” बताया गया। कई उपभोक्ताओं ने अपने ऑर्डर रद्द करने की घोषणा की, तो कुछ ने Lenskart के उत्पादों का बहिष्कार करते हुए वीडियो साझा किए। डिजिटल मंचों पर यह बहस भी उभरी कि क्या भारतीय कंपनियाँ पश्चिमी पेशेवर मानकों के नाम पर देशज सांस्कृतिक प्रतीकों को हाशिये पर डाल रही हैं।
पियूष बंसल की सफाई: ‘पुराना और अप्रासंगिक दस्तावेज़’
विवाद बढ़ने के बाद कंपनी के सह-संस्थापक Peyush Bansal ने सार्वजनिक बयान जारी कर कहा कि सोशल मीडिया पर प्रसारित दस्तावेज़ पुराना, अधूरा और वर्तमान कंपनी नीति से असंबद्ध है। उन्होंने स्पष्ट किया कि Lenskart किसी भी कर्मचारी को उसकी धार्मिक आस्था व्यक्त करने से नहीं रोकता और कंपनी सभी धर्मों के प्रतीकों का सम्मान करती है।
बंसल ने यह भी स्वीकार किया कि दस्तावेज़ की भाषा संवेदनशील नहीं थी और इससे लोगों की भावनाएँ आहत हुईं, जिसके लिए कंपनी खेद व्यक्त करती है।
नई गाइडलाइन में सभी प्रतीकों को दी गई अनुमति
क्षति नियंत्रण के प्रयास में कंपनी ने संशोधित स्टाइल गाइड जारी की। इसमें स्पष्ट शब्दों में कहा गया कि कर्मचारी बिंदी, तिलक, सिंदूर, कलावा, हिजाब, पगड़ी तथा अन्य धार्मिक प्रतीकों के साथ कार्य कर सकते हैं, बशर्ते उनका समग्र प्रस्तुतिकरण स्वच्छ और व्यवस्थित हो।
कंपनी ने कहा कि उसकी नीति का मूल उद्देश्य केवल “ग्राहक-सामना करने वाले कर्मचारियों की सुसज्जित प्रस्तुति” सुनिश्चित करना है, न कि किसी धर्म विशेष के प्रतीकों पर प्रतिबंध लगाना।
फिर भी क्यों नहीं थमा विवाद?
कंपनी की सफाई के बावजूद सार्वजनिक असंतोष पूरी तरह शांत नहीं हुआ। इसके पीछे तीन प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
पहला, लोगों का सवाल है कि यदि यह दस्तावेज़ पुराना था तो क्या वह कभी कंपनी के आधिकारिक प्रशिक्षण ढांचे का हिस्सा नहीं रहा? यदि रहा, तो उसके निर्माण में ऐसी सोच क्यों अपनाई गई?
दूसरा, संशोधन केवल सोशल मीडिया दबाव के बाद सामने आया। इससे यह धारणा बनी कि कंपनी ने स्वेच्छा से नहीं, बल्कि जनदबाव के कारण नीति बदली।
तीसरा, यह विवाद ऐसे समय में उभरा जब कॉर्पोरेट जगत में विविधता, समावेशन और पहचान की स्वतंत्रता को लेकर पहले से ही गहन चर्चा चल रही है। इसलिए इस प्रकरण को एक isolated HR error की बजाय व्यापक कॉर्पोरेट मानसिकता के संदर्भ में देखा जा रहा है।
कानूनी अपराध नहीं, लेकिन नैतिक संकट अवश्य
कई सोशल मीडिया पोस्टों में इस मामले को “राष्ट्रविरोधी” तक कहा गया, हालांकि अब तक न तो किसी सरकारी एजेंसी ने कंपनी के खिलाफ ऐसी कोई कानूनी टिप्पणी की है और न ही किसी अदालत ने इसे विधिक अपराध माना है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला मुख्यतः corporate cultural insensitivity, perceived discrimination और brand trust deficit की श्रेणी में आता है।
यानी कानूनी कार्रवाई भले न हो, लेकिन जनविश्वास का ह्रास किसी भी ब्रांड के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकता है।
बाज़ार पर भी पड़ा असर
ऑनलाइन विरोध के बीच निवेशकों की प्रतिक्रिया भी देखने को मिली। बाजार रिपोर्टों के अनुसार विवाद के बाद कंपनी के शेयरों पर दबाव बना और ब्रांड की डिजिटल प्रतिष्ठा को झटका लगा। विश्लेषकों का मानना है कि आज के समय में उपभोक्ता केवल उत्पाद की गुणवत्ता नहीं, बल्कि कंपनी के सामाजिक व्यवहार और सांस्कृतिक दृष्टिकोण का भी मूल्यांकन करता है। ऐसे में प्रतिष्ठा संबंधी संकट सीधे बाजार मूल्य पर प्रभाव डाल सकते हैं।
कॉर्पोरेट भारत के लिए स्पष्ट संदेश
लेंसकार्ट विवाद ने एक बार फिर यह स्थापित किया है कि भारत केवल उपभोक्ताओं की संख्या से परिभाषित बाजार नहीं, बल्कि गहरी सांस्कृतिक चेतना वाला समाज है। यहां धार्मिक प्रतीक व्यक्तिगत विकल्प भर नहीं, बल्कि सम्मान, परंपरा और पहचान के संवाहक हैं।
ऐसे में किसी भी कंपनी की आंतरिक नीति यदि असमानता का आभास देती है, तो उसका असर सीधे ब्रांड विश्वसनीयता पर पड़ता है।
कॉर्पोरेट विशेषज्ञों का मानना है कि “ग्लोबल प्रोफेशनलिज़्म” और “लोकल संवेदनशीलता” के बीच संतुलन साधे बिना भारत जैसे देश में दीर्घकालिक उपभोक्ता विश्वास अर्जित करना कठिन है।
निष्कर्ष
लेंसकार्ट प्रकरण केवल एक वायरल दस्तावेज़ का विवाद नहीं, बल्कि उस सोच की परीक्षा है जिसमें कॉर्पोरेट नीतियाँ पेशेवर छवि और सांस्कृतिक सम्मान के बीच रेखाएँ खींचती हैं।
यह घटना बताती है कि आधुनिक भारत में ब्रांड की सफलता अब केवल बिक्री के आंकड़ों से तय नहीं होगी; उसे जनता की भावनाओं, धार्मिक पहचान और सामाजिक समानता की कसौटी पर भी परखा जाएगा।
यदि आप चाहें तो मैं अब इसका और भी अधिक तीखा “फ्रंट पेज एक्सपोज़े संस्करण” लिख सकता हूँ — जैसा राष्ट्रीय अखबार के पहले पन्ने पर छपता है।














