तुर्किये की राजधानी अंकारा में 7-8 जुलाई 2026 को आयोजित NATO (North Atlantic Treaty Organization) शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। 32 सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष और शीर्ष नेता इस बैठक में हिस्सा ले रहे हैं। यह सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब वैश्विक राजनीति कई बड़े संकटों से गुजर रही है—यूक्रेन युद्ध जारी है, मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ रहा है, अमेरिका और यूरोप के बीच रणनीतिक मतभेद सामने आ रहे हैं और चीन-रूस की साझेदारी भी लगातार मजबूत हो रही है।
इस बार का शिखर सम्मेलन केवल यूरोप की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। यहां लिए जाने वाले फैसलों का असर वैश्विक हथियार बाजार, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र, QUAD देशों और भारत की विदेश एवं रक्षा नीति तक दिखाई दे सकता है।
1. रक्षा बजट बढ़ाने का दबाव
सम्मेलन का सबसे बड़ा मुद्दा सदस्य देशों के रक्षा खर्च को बढ़ाना है। पिछले वर्ष हुए हेग सम्मेलन में NATO देशों ने 2035 तक अपनी GDP का 5 प्रतिशत रक्षा और सुरक्षा संबंधी गतिविधियों पर खर्च करने का लक्ष्य तय किया था। यह पुराने 2 प्रतिशत लक्ष्य की तुलना में काफी बड़ा बदलाव है।
अमेरिकी राष्ट्रपति लंबे समय से यूरोपीय देशों पर आरोप लगाते रहे हैं कि वे अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर अत्यधिक निर्भर हैं। इसी कारण NATO देशों पर रक्षा बजट बढ़ाने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। यूरोपीय देशों और कनाडा ने हाल के वर्षों में रक्षा निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि भी की है।
2. यूक्रेन युद्ध और सैन्य सहायता
सम्मेलन का दूसरा प्रमुख विषय रूस-यूक्रेन युद्ध है। यूक्रेन के राष्ट्रपति भी सम्मेलन में मौजूद हैं और वे NATO देशों से अधिक सैन्य सहयोग की मांग कर रहे हैं।
हाल के महीनों में रूस द्वारा किए गए ड्रोन और मिसाइल हमलों ने यूक्रेन की सुरक्षा चुनौतियों को और बढ़ा दिया है। विशेष रूप से अमेरिकी पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है। यूक्रेन चाहता है कि NATO देश उसे अधिक वायु रक्षा प्रणाली और आधुनिक हथियार उपलब्ध कराएं ताकि वह रूसी हमलों का प्रभावी जवाब दे सके।
3. ईरान संकट और NATO के भीतर मतभेद
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव ने NATO के भीतर नई बहस छेड़ दी है। अमेरिका चाहता है कि उसके सहयोगी ईरान के खिलाफ अधिक सक्रिय भूमिका निभाएं, लेकिन कई यूरोपीय देश इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सम्मेलन में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा पर चर्चा होगी। हालांकि इस मुद्दे पर सदस्य देशों के बीच पूर्ण सहमति बनना आसान नहीं दिखाई देता।
4. यूरोप से अमेरिकी सैनिकों की संभावित वापसी
अमेरिका और यूरोप के संबंध भी सम्मेलन के केंद्र में हैं। ट्रंप प्रशासन यूरोपीय देशों से अपेक्षा कर रहा है कि वे अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वयं अधिक उठाएं।
इसी संदर्भ में जर्मनी समेत कुछ यूरोपीय देशों में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या घटाने पर चर्चा हो रही है। यदि भविष्य में अमेरिका अपनी सैन्य मौजूदगी कम करता है, तो यूरोप को अपनी सुरक्षा संरचना को अधिक मजबूत बनाना पड़ेगा।
5. यूरोप की रणनीतिक स्वायत्तता
यूरोपीय देशों ने पिछले कुछ वर्षों में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए हैं। उनका लक्ष्य अमेरिका पर निर्भरता कम करना और अपनी स्वतंत्र सैन्य क्षमता विकसित करना है।
यूरोप अब संयुक्त सैन्य परियोजनाओं, रक्षा उत्पादन और तकनीकी विकास में बड़े निवेश कर रहा है। NATO सम्मेलन इस दिशा में आगे की रणनीति तय करने का महत्वपूर्ण मंच बन सकता है।
6. जर्मनी का सैन्य पुनर्निर्माण
युद्ध के बाद लंबे समय तक सीमित सैन्य भूमिका निभाने वाला जर्मनी अब तेजी से अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहा है। संवैधानिक और वित्तीय बदलावों के माध्यम से वह आधुनिक हथियारों, सैन्य ढांचे और सैनिक क्षमता में बड़ा निवेश कर रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार जर्मनी आने वाले वर्षों में यूरोप की सबसे प्रभावशाली सैन्य शक्तियों में से एक बन सकता है। यह बदलाव पूरे यूरोपीय सुरक्षा ढांचे को प्रभावित करेगा।
7. सुरक्षा खर्च की नई परिभाषा
NATO देशों के बीच इस बात पर भी चर्चा हो रही है कि सुरक्षा खर्च में केवल हथियारों और सैनिकों को ही शामिल किया जाए या सुरक्षा से जुड़े बुनियादी ढांचे को भी।
कई देश सड़कों, बंदरगाहों, ऊर्जा नेटवर्क, साइबर सुरक्षा और संचार प्रणालियों पर होने वाले खर्च को भी राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा मान रहे हैं। इससे रक्षा बजट के लक्ष्य हासिल करना उनके लिए आसान हो सकता है।
8. ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र का महत्व
आर्कटिक क्षेत्र वैश्विक रणनीति का नया केंद्र बनता जा रहा है। यहां प्राकृतिक संसाधनों, समुद्री मार्गों और सैन्य उपस्थिति को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।
ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों के बीच उत्पन्न तनाव ने इस मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है। रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों के कारण NATO भी आर्कटिक क्षेत्र को भविष्य की सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा मान रहा है।
9. यूरोप की क्षमता संबंधी चुनौतियां
रक्षा बजट बढ़ाने के बावजूद यूरोप अभी भी कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अमेरिका पर निर्भर है। लंबी दूरी के हमले, उपग्रह नेटवर्क, खुफिया जानकारी, लॉजिस्टिक्स और उन्नत सैन्य तकनीक जैसे क्षेत्रों में अमेरिकी सहयोग की भूमिका निर्णायक बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन क्षमताओं को स्वतंत्र रूप से विकसित करने में यूरोप को कई वर्ष और भारी निवेश की आवश्यकता होगी।
10. इंडो-पैसिफिक देशों की बढ़ती भागीदारी
इस बार सम्मेलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के देशों की बढ़ती भागीदारी है। ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों के साथ विशेष बैठकें आयोजित की जा रही हैं।
यह संकेत है कि NATO अब केवल यूरो-अटलांटिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि इंडो-पैसिफिक में भी अपनी रणनीतिक भूमिका मजबूत करने पर विचार कर रहा है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत NATO का सदस्य नहीं है, लेकिन सम्मेलन में लिए जाने वाले फैसले उसके हितों को प्रभावित कर सकते हैं।
रक्षा उद्योग के लिए अवसर और चुनौतियां
यदि यूरोपीय देश बड़े पैमाने पर हथियार उत्पादन बढ़ाते हैं, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ सकता है। इससे रक्षा उपकरणों और तकनीकी संसाधनों की कीमतों में वृद्धि हो सकती है। दूसरी ओर, भारत के ‘मेक इन इंडिया’ और रक्षा विनिर्माण कार्यक्रमों को नए अवसर भी मिल सकते हैं।
QUAD की भूमिका बढ़ सकती है
यदि अमेरिका का ध्यान यूरोप और मध्य-पूर्व में अधिक केंद्रित रहता है, तो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा में QUAD देशों—भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया—की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी।
रूस-चीन समीकरण
यूक्रेन युद्ध के चलते रूस और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक निकटता भारत के लिए संतुलन की चुनौती पैदा कर सकती है। भारत के रूस और पश्चिमी देशों दोनों के साथ मजबूत संबंध हैं, इसलिए उसे अपनी कूटनीतिक रणनीति सावधानी से आगे बढ़ानी होगी।
रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा
भारत लंबे समय से स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति का समर्थक रहा है। बदलते वैश्विक समीकरणों, मध्य-पूर्व के तनाव और महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए संतुलन बनाए रखना होगा।
अंकारा NATO शिखर सम्मेलन केवल एक नियमित अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं है, बल्कि यह वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था के भविष्य को दिशा देने वाला महत्वपूर्ण मंच बन गया है। रक्षा बजट, यूक्रेन युद्ध, अमेरिका-यूरोप संबंध, आर्कटिक रणनीति और इंडो-पैसिफिक सहयोग जैसे मुद्दों पर लिए जाने वाले निर्णय आने वाले वर्षों की विश्व राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
भारत के लिए यह सम्मेलन विशेष महत्व रखता है क्योंकि इसके परिणाम रक्षा उद्योग, विदेश नीति, QUAD सहयोग और वैश्विक शक्ति संतुलन पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए अंकारा में होने वाली चर्चाएं केवल NATO देशों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण हैं।














