नई दिल्ली: जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के दौरान दर्ज किए गए मामलों को लेकर अब तक कोई ठोस राहत नहीं मिली है। प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR अभी भी बरकरार हैं और दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया है कि सरकार की ओर से मामले वापस लेने का कोई आधिकारिक आदेश नहीं मिला है। ऐसे में हजारों छात्रों और उनके परिवारों की निगाहें अब केंद्र सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। दूसरी ओर, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने सरकार पर कथित समझौते का उल्लंघन करने का आरोप लगाते हुए चेतावनी दी है कि यदि छात्रों पर दर्ज मामले वापस नहीं लिए गए तो आंदोलन फिर से शुरू किया जाएगा।
सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत के बाद यह उम्मीद जताई जा रही थी कि प्रदर्शन के दौरान दर्ज मामलों को वापस लिया जाएगा, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ है। इस वजह से आंदोलन से जुड़े छात्र और स्वयंसेवक लगातार असमंजस की स्थिति में हैं। दिल्ली पुलिस का कहना है कि वह केवल सरकार के निर्देशों के अनुसार ही कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है।
करीब 20 मामलों में दर्ज हैं FIR
दिल्ली पुलिस के अनुसार जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन और उससे जुड़ी घटनाओं के संबंध में लगभग 20 मामले दर्ज किए गए हैं। इनमें से 14 मामले विरोध-प्रदर्शन, कानून-व्यवस्था भंग करने और हिंसा से जुड़े हैं। इसके अलावा एक मामला बिना अनुमति ड्रोन उड़ाने का दर्ज किया गया है, जबकि अन्य मामलों में पत्रकारों और पुलिसकर्मियों पर कथित हमले की शिकायतें शामिल हैं।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इन मामलों की जांच और कानूनी कार्रवाई नियमानुसार जारी है। जब तक सरकार की ओर से औपचारिक आदेश नहीं मिलता, तब तक मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती।
इस बीच आंदोलन से जुड़े कई छात्रों का कहना है कि उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि आंदोलन समाप्त होने के बाद उनके खिलाफ दर्ज मामलों पर पुनर्विचार किया जाएगा। अब आदेश में हो रही देरी को लेकर उनमें नाराजगी बढ़ रही है।
सरकार का आदेश मिलते ही शुरू होगी कानूनी प्रक्रिया
सूत्रों के अनुसार यदि केंद्र सरकार मामले वापस लेने का निर्णय करती है तो सबसे पहले दिल्ली पुलिस अभियोजन पक्ष की ओर से उपराज्यपाल (LG) को एक औपचारिक पत्र भेजेगी। इस पत्र में कहा जाएगा कि पुलिस इन मामलों में आगे अभियोजन नहीं चलाना चाहती।
इसके बाद उपराज्यपाल की मंजूरी ली जाएगी। मंजूरी मिलने के बाद संबंधित अदालत को सूचित किया जाएगा कि अभियोजन पक्ष इन मामलों में आगे कार्रवाई नहीं करना चाहता। अंतिम निर्णय अदालत के अधिकार क्षेत्र में होगा और अदालत ही यह तय करेगी कि मामले वापस लिए जाएं या नहीं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी आपराधिक मामले को वापस लेने की प्रक्रिया केवल सरकार के आदेश से पूरी नहीं होती। इसमें अभियोजन पक्ष की सहमति, उपराज्यपाल की मंजूरी और अंततः अदालत की अनुमति आवश्यक होती है।
पत्रकारों की शिकायत वाले मामले अलग
दिल्ली पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया है कि सभी मामले एक समान नहीं हैं। जिन मामलों में पत्रकारों ने अपने ऊपर हुए कथित हमलों को लेकर स्वयं शिकायत दर्ज कराई है, उन्हें सरकार या पुलिस अपने स्तर पर वापस नहीं ले सकती।
ऐसे मामलों को वापस लेने के लिए संबंधित शिकायतकर्ता की सहमति आवश्यक होगी। यानी यदि कोई पत्रकार अपनी शिकायत वापस नहीं लेता है तो उस मामले में कानूनी प्रक्रिया जारी रह सकती है।
इसी प्रकार यदि किसी निजी व्यक्ति ने अलग से शिकायत दर्ज कराई है तो उसका निर्णय भी संबंधित शिकायतकर्ता और अदालत पर निर्भर करेगा।
CJP ने सरकार पर समझौता तोड़ने का लगाया आरोप
इस पूरे मामले में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने सोशल मीडिया मंच X पर केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह को टैग करते हुए आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई न करने के कथित समझौते का पालन नहीं किया जा रहा है।
रांका ने लिखा कि सरकार ने आंदोलन समाप्त कराने के दौरान जो भरोसा दिया था, वह अब तक पूरा नहीं हुआ है। उनका कहना है कि कई राज्यों में आंदोलन से जुड़े छात्रों और स्वयंसेवकों को परेशान किया जा रहा है।
बिहार और बंगाल का भी किया जिक्र
आशुतोष रांका ने अपने बयान में दावा किया कि बिहार और पश्चिम बंगाल में सैकड़ों छात्रों को गिरफ्तार किया गया है। वहीं दिल्ली और अन्य राज्यों में भी कई छात्रों तथा आंदोलन से जुड़े स्वयंसेवकों पर नजर रखी जा रही है।
उन्होंने आरोप लगाया कि कई ऐसे लोग भी कार्रवाई का सामना कर रहे हैं जिन्होंने केवल प्रदर्शन के दौरान भोजन, परिवहन या अन्य व्यवस्थाओं में सहयोग किया था।
हालांकि इन दावों पर संबंधित राज्य सरकारों या पुलिस की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
सभी FIR वापस लेने की मांग
CJP ने मांग की है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी FIR तत्काल वापस ली जाएं। साथ ही जिन छात्रों और स्वयंसेवकों को हिरासत में लिया गया है, उन्हें तुरंत रिहा किया जाए।
संगठन ने यह भी कहा है कि भविष्य में प्रदर्शन से जुड़े छात्रों के खिलाफ दिल्ली पुलिस, केंद्रीय एजेंसियों या भाजपा शासित राज्यों की पुलिस द्वारा कोई नई FIR दर्ज नहीं की जानी चाहिए।
पार्टी का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में आंदोलन के दौरान हुए समझौते का सम्मान करती है तो उसे इस दिशा में जल्द फैसला लेना चाहिए।
लिखित समझौते की भी उठी मांग
आशुतोष रांका ने सरकार से यह भी मांग की है कि आंदोलन के दौरान यदि कोई लिखित समझौता हुआ था तो उसे सार्वजनिक किया जाए। साथ ही कानूनी मामलों को लेकर सरकार ने जो समय-सीमा तय की थी, उसकी जानकारी भी आंदोलनकारियों के साथ साझा की जाए।
उनका कहना है कि पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सरकार को पूरी प्रक्रिया स्पष्ट करनी चाहिए ताकि छात्रों के बीच फैली अनिश्चितता समाप्त हो सके।
दोबारा आंदोलन की चेतावनी
CJP ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि सरकार ने जल्द निर्णय नहीं लिया तो संगठन एक बार फिर देशभर में विरोध-प्रदर्शन शुरू करेगा। पार्टी का कहना है कि छात्रों पर दर्ज मामलों को लेकर लंबी चुप्पी स्वीकार नहीं की जाएगी।
संगठन के अनुसार, आंदोलन केवल FIR वापस लेने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि छात्रों के खिलाफ भविष्य में किसी भी प्रकार की कार्रवाई रोकने की मांग भी उठाई जाएगी।
छात्रों की निगाहें सरकार पर
फिलहाल पूरा मामला सरकार के अगले कदम पर टिका हुआ है। दिल्ली पुलिस का कहना है कि वह सरकार के आदेश की प्रतीक्षा कर रही है, जबकि छात्र संगठन लगातार कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। यदि जल्द कोई निर्णय नहीं लिया गया तो यह मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बन सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामलों को वापस लेने का आदेश जारी करेगी, या फिर यह मामला अदालतों में लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरेगा। आने वाले दिनों में सरकार का फैसला न केवल आंदोलन से जुड़े छात्रों के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच हुए भरोसे की परीक्षा में कौन कितना खरा उतरता है।














