“इमारत गिरी, लेकिन सवाल यह है कि निगरानी तंत्र क्यों सोता रहा?”
नई दिल्ली: एक इमारत का भरभराकर गिरना सिर्फ ईंट, सीमेंट और सरियों के ढहने की घटना नहीं होती। जब उस मलबे के नीचे पढ़ने-लिखने आए छात्र दब जाते हैं, परिवारों के सपने टूट जाते हैं और कई घरों में मातम पसर जाता है, तब सवाल सिर्फ बिल्डिंग के मालिक तक सीमित नहीं रह जाता। सवाल उस पूरे सिस्टम से पूछा जाता है, जिसे नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है।
और इस हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर इमारत पहले से जर्जर थी तो निगरानी कहाँ थी?
सूत्रों की मानें और आसपास रहने वाले लोगों के दावों पर भरोसा करें तो MCD की ओर से कुछ महीने पहले इस इमारत पर नोटिस लगाया गया था। स्थानीय लोगों का कहना है कि नोटिस में इमारत की जर्जर हालत की ओर संकेत करते हुए उचित व्यवस्था करने की बात कही गई थी।
अगर यह दावा सही है तो मामला और गंभीर हो जाता है।
क्योंकि फिर सवाल यह नहीं रह जाता कि इमारत अचानक क्यों गिरी?
सवाल यह बन जाता है कि खतरा दिखाई देने के बावजूद उसे रोकने की कोशिश क्यों नहीं हुई?
नोटिस लगा था तो निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी?
मान लीजिए किसी इमारत को जर्जर घोषित करने जैसा कोई नोटिस वास्तव में लगाया गया था। तो उसके बाद सामान्य नागरिक के मन में स्वाभाविक सवाल उठता है—क्या संबंधित विभाग ने यह सुनिश्चित किया कि वहां लोग रह तो नहीं रहे? क्या भवन को खाली कराया गया? क्या उसकी दोबारा जांच हुई? क्या मालिक को अनुपालन के लिए बाध्य किया गया? क्या पुलिस या अन्य संबंधित एजेंसियों को जानकारी दी गई?
या फिर सरकारी कार्रवाई का पूरा तंत्र सिर्फ नोटिस लगाने तक ही चलता है?
यही वह जगह है जहां दिल्ली की व्यवस्था पर सबसे बड़ा व्यंग्य खड़ा होता है।
नोटिस लग गया, फोटो हो गई, फाइल चल गई और फिर शायद खतरा भी फाइल के साथ किसी अलमारी में सो गया।
लेकिन इमारत नहीं सोई थी। उसमें छात्र रह रहे थे।
वे छात्र किसी सरकारी फाइल का हिस्सा नहीं थे। वे परिवारों की उम्मीद थे।
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मलबे में सिर्फ ईंटें नहीं, जवाबदेही भी दबी है
इस हादसे में छात्रों की मौत ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आखिर उन छात्रों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी?
क्या पूरी जिम्मेदारी सिर्फ भवन मालिक की थी?
अगर मालिक ने नियमों की अनदेखी की, अवैध निर्माण किया, जर्जर इमारत में छात्रों को रहने दिया या सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया, तो निश्चित रूप से उसकी जवाबदेही की जांच होनी चाहिए।
लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता।
राज्य की जिम्मेदारी कहाँ से शुरू होती है और कहाँ खत्म?
नगर निकायों का गठन सिर्फ कूड़ा उठाने, सड़क पर अतिक्रमण देखने या टैक्स वसूलने के लिए नहीं हुआ है। उनके पास भवनों की सुरक्षा, निर्माण मानकों और खतरनाक संरचनाओं पर कार्रवाई से जुड़े दायित्व भी होते हैं।
इसलिए यदि किसी सरकारी एजेंसी को किसी इमारत के खतरनाक होने की जानकारी थी और उसके बावजूद वहां लोगों का रहना जारी रहा, तो उस पूरी प्रक्रिया की जांच होना जरूरी है।
Article 21 सिर्फ किताब में छपा अधिकार नहीं
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण की गारंटी देता है। न्यायिक व्याख्या में ‘जीवन के अधिकार’ को सिर्फ सांस लेने तक सीमित नहीं माना गया, बल्कि गरिमापूर्ण और सुरक्षित जीवन से जुड़े व्यापक पहलुओं से जोड़ा गया है।
इसी व्यापक संवैधानिक दृष्टिकोण से देखें तो किसी ऐसी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है, जिसमें संभावित खतरे की जानकारी होने के बावजूद लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित न की जा सके।
हालांकि, किसी अधिकारी या सरकारी विभाग की आपराधिक लापरवाही कानूनी रूप से स्वतः सिद्ध नहीं हो जाती। इसके लिए जांच में यह स्थापित करना होगा कि किस अधिकारी या एजेंसी को क्या जानकारी थी, उसकी वैधानिक जिम्मेदारी क्या थी, उसने क्या कार्रवाई की या नहीं की और उस कथित चूक का हादसे से क्या संबंध था।
लेकिन इतना तय है कि जवाबदेही की जांच से सरकार या सरकारी मशीनरी को बाहर नहीं रखा जा सकता।
बिल्डिंग मालिक कटघरे में, लेकिन सरकारी तंत्र से भी पूछताछ जरूरी
हादसे के बाद अक्सर एक परिचित कहानी सामने आती है।
मालिक पर कार्रवाई होगी।
किसी कर्मचारी का बयान लिया जाएगा।
कुछ नोटिस जारी होंगे।
कुछ अधिकारी मौके पर पहुंचेंगे।
जांच कमेटी बनेगी।
और फिर?
कुछ समय बाद शहर किसी दूसरे हादसे की खबर में व्यस्त हो जाएगा,यही हमारी प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना है।
हादसे से पहले सिस्टम को आंखें चाहिए होती हैं, हादसे के बाद सिर्फ बयान।
इसलिए इस मामले में सिर्फ यह पता लगाना पर्याप्त नहीं कि इमारत का मालिक कौन था। यह भी पता लगना चाहिए कि संबंधित सरकारी रिकॉर्ड में इस भवन की क्या स्थिति दर्ज थी। क्या इसके खिलाफ पहले कोई शिकायत हुई थी? क्या निरीक्षण किया गया था? क्या कोई नोटिस जारी हुआ था? नोटिस के बाद क्या कार्रवाई हुई? क्या भवन को खाली कराने या उपयोग रोकने की प्रक्रिया शुरू की गई थी?
और सबसे अहम—अगर नोटिस लगाया गया था तो वह नोटिस हादसे के समय कहाँ था?
क्या वह अब भी इमारत की किसी दीवार पर मौजूद था?
क्या उसे हटा दिया गया था?
क्या वह कागजों में था लेकिन जमीन पर नहीं?
या फिर नोटिस ने अपना सरकारी धर्म निभा दिया था—लगना था, लग गया; आगे क्या हुआ, यह भगवान जाने।
‘जर्जर’ इमारतों की फाइलें आखिर कितनी सुरक्षित हैं?
दिल्ली जैसे महानगर में जर्जर इमारतें कोई नई समस्या नहीं हैं। असली समस्या तब पैदा होती है जब खतरे की पहचान और वास्तविक कार्रवाई के बीच इतना बड़ा अंतर पैदा हो जाए कि हादसा उस अंतर को हमेशा के लिए उजागर कर दे।
अगर किसी भवन को लेकर शिकायत या चेतावनी मौजूद थी, तो प्रशासनिक तंत्र के पास आगे की कार्रवाई का रिकॉर्ड होना चाहिए।
क्योंकि सरकारी व्यवस्था में हर कार्रवाई का हिसाब होता है।
लेकिन क्या हर निष्क्रियता का भी हिसाब होता है?
यही जांच का असली मुद्दा होना चाहिए।
किस अधिकारी के पास फाइल थी?
किसके पास निरीक्षण की जिम्मेदारी थी?
किसने भवन की स्थिति देखी?
किसने यह तय किया कि वहां लोग रह सकते हैं या नहीं?
किसने यह सुनिश्चित किया कि नोटिस के बाद आदेश का पालन हुआ?
और अगर किसी स्तर पर लापरवाही हुई तो सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारी को बलि का बकरा बनाकर क्या कहानी खत्म कर दी जाएगी?
राजनीतिक पर्दे के पीछे की कहानी भी समझनी होगी
हर बड़े हादसे के बाद राजनीति मौके पर पहुंचती है। नेता आते हैं, संवेदनाएं व्यक्त होती हैं, मुआवजे की घोषणा होती है और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन दिया जाता है।
लेकिन जनता का सवाल इससे बड़ा है।
“मुआवजा जिंदगी वापस नहीं लाता।”
जिस छात्र के माता-पिता ने उसे पढ़ने के लिए शहर भेजा था, उनके लिए कुछ लाख रुपये उस सपने की कीमत नहीं हो सकते।
राजनीति को इसलिए सिर्फ यह नहीं बताना चाहिए कि दोषी कौन है। उसे यह भी बताना होगा कि “जिस सिस्टम को खतरा दिखाई देना चाहिए था, उसे खतरा दिखाई क्यों नहीं दिया—और अगर दिखाई दिया था तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई।”
यही वह सवाल है जो सत्ता और विपक्ष दोनों से पूछा जाना चाहिए,क्योंकि जर्जर इमारत किसी एक राजनीतिक दल की नहीं होती लेकिन जवाबदेही सरकार की जरूर होती है।
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मलबा हटेगा, लेकिन सवाल नहीं हटने चाहिए
आज राहत और बचाव अभियान के बाद मलबा हट जाएगा। सड़क साफ हो जाएगी। तस्वीरें बदल जाएंगी। कैमरे दूसरे घटनास्थलों की तरफ चले जाएंगे।
लेकिन इस हादसे का सबसे जरूरी काम मलबा हटाना नहीं, जवाबदेही तय करना है।
एक स्वतंत्र और समयबद्ध जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि भवन की वास्तविक स्थिति क्या थी, MCD या अन्य किसी प्राधिकरण को इसकी जानकारी थी या नहीं, कथित नोटिस की सच्चाई क्या है और नोटिस जारी होने के बाद क्या कदम उठाए गए।
यदि किसी सरकारी अधिकारी या एजेंसी की लापरवाही सामने आती है तो सिर्फ विभागीय खानापूर्ति नहीं, बल्कि कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
और अगर भवन मालिक की गलती सामने आती है तो उसके खिलाफ भी कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
क्योंकि सवाल किसी एक व्यक्ति को बचाने या किसी एक विभाग को कटघरे में खड़ा करने का नहीं है।
सवाल यह है कि अगली इमारत गिरने से पहले सिस्टम जागेगा या फिर अगली बार भी सरकार की नींद मलबे के नीचे दबे लोगों की चीखों से खुलेगी?
यह हादसा सिर्फ एक इमारत के गिरने की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है जिसमें कभी-कभी खतरा पहले दर्ज होता है और कार्रवाई बाद में—वह भी तब, जब हादसा हो चुका होता है।
अब देखना यह है कि इस बार भी जांच की फाइल खुलेगी और धीरे-धीरे बंद हो जाएगी, या पहली बार यह पता लगाया जाएगा कि इमारत गिरने से पहले जिम्मेदारी किसकी थी।
क्योंकि मलबे से शव निकाले जा सकते हैं,
लेकिन व्यवस्था की नाकामी को हमेशा के लिए दफन नहीं किया जा सकता।














