इस्लामाबाद: पाकिस्तान में संघीय सरकार के ढांचे को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सीनेट की Devolution पर उपसमिति ने करीब 25 संघीय मंत्रालयों, विभागों और संस्थानों को बंद या प्रांतीय स्तर पर स्थानांतरित करने की सिफारिश की है। समिति का कहना है कि कई विभाग ऐसे विषयों पर काम कर रहे हैं जो 18वें संविधान संशोधन के बाद प्रांतों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
समिति ने सरकार से करीब दो दर्जन मंत्रालयों और विभागों को बंद करने तथा कुछ अन्य संस्थाओं को Council of Common Interests (CCI) के तहत लाने की प्रक्रिया शुरू करने को कहा है। इसके लिए सरकार को सीमित समय में कार्रवाई और रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया है।
किन मंत्रालयों पर गिरी गाज?
सिफारिशों में स्वास्थ्य, शिक्षा, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा, जल संसाधन, जलवायु परिवर्तन, रेलवे, पेट्रोलियम, उद्योग और सांख्यिकी जैसे विभाग शामिल हैं। समिति का तर्क है कि इन क्षेत्रों में संघीय सरकार की भूमिका को संविधान और 18वें संशोधन के अनुरूप सीमित किया जाना चाहिए।
हर साल 5 से 6 ट्रिलियन रुपये की बचत का दावा
सीनेट समिति के मुताबिक, संघीय ढांचे में अनावश्यक मंत्रालयों और संस्थानों को बनाए रखने से सरकारी खर्च पर भारी दबाव पड़ रहा है। समिति ने अनुमान लगाया है कि 18वें संशोधन को पूरी तरह लागू करने और संघीय सरकार का आकार घटाने से हर साल करीब 5 से 6 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये की बचत हो सकती है।
यहां 5 ट्रिलियन डॉलर नहीं, बल्कि 5-6 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये की बात है।
18वें संशोधन का हवाला
समिति का कहना है कि संघीय सरकार को उन विषयों पर मंत्रालय और संस्थान नहीं चलाने चाहिए जिन्हें संवैधानिक व्यवस्था के तहत प्रांतों को सौंपा गया है। उसने Council of Common Interests को भी मजबूत करने और संविधान के अनुच्छेद 154 के तहत उसके नियमों को लागू करने की मांग की है।
अगर इन सिफारिशों को लागू किया जाता है, तो पाकिस्तान की संघीय प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव हो सकता है। इससे इस्लामाबाद में मंत्रालयों की संख्या और सरकारी खर्च घट सकता है, जबकि प्रांतों की भूमिका बढ़ेगी। हालांकि, यह फिलहाल सीनेट समिति की सिफारिश है, अंतिम सरकारी फैसला नहीं। पाकिस्तान की आधिकारिक सीनेट वेबसाइट पर भी विभिन्न समितियों की बैठकों और कार्यवाही दर्ज है।
यानी मामला सिर्फ मंत्रालय बंद करने का नहीं है—यह पाकिस्तान में केंद्र और प्रांतों के बीच सत्ता और संसाधनों के बंटवारे से जुड़ा बड़ा संवैधानिक मुद्दा बन गया है।














