Tuesday, June 16, 2026
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किशाऊ मल्टीपर्पस डैम प्रोजेक्ट: चार दशक का इंतजार खत्म, क्या यमुना को मिलेगा नया जीवन?

नई दिल्ली: उत्तर भारत की जल सुरक्षा, ऊर्जा जरूरतों और यमुना नदी के पुनर्जीवन से जुड़ी बहुप्रतीक्षित किशाऊ मल्टीपर्पस डैम परियोजना को लेकर बड़ा फैसला सामने आया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में मंगलवार को हुई उच्चस्तरीय बैठक में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान ने परियोजना को लागू करने के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर सहमति जता दी।

करीब चार दशक से विभिन्न कारणों से लंबित इस परियोजना को अब अंतिम मंजूरी की दिशा में निर्णायक कदम माना जा रहा है। केंद्र सरकार का दावा है कि यह योजना ‘अविरल और निर्मल यमुना’ के लक्ष्य को हासिल करने में अहम भूमिका निभाएगी।

चार दशक पुरानी परियोजना को मिली नई गति

किशाऊ परियोजना की अवधारणा 1980 के दशक में सामने आई थी, लेकिन राज्यों के बीच जल बंटवारे, लागत साझेदारी और पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर सहमति नहीं बन पाने के कारण यह लंबे समय तक ठंडे बस्ते में रही।

अब छह राज्यों के बीच बनी सहमति को उत्तर भारत के अंतरराज्यीय जल प्रबंधन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

क्या है किशाऊ मल्टीपर्पस डैम प्रोजेक्ट?

किशाऊ मल्टीपर्पस डैम उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टोंस नदी पर प्रस्तावित एक बहुउद्देशीय परियोजना है। टोंस नदी, यमुना की सबसे प्रमुख सहायक नदियों में से एक है।

परियोजना के प्रमुख उद्देश्य हैं:

660 मेगावाट जलविद्युत उत्पादन

दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के लिए अतिरिक्त पेयजल उपलब्ध कराना

लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई क्षमता बढ़ाना

बाढ़ नियंत्रण और जल संरक्षण को मजबूत करना

यमुना में वर्षभर नियंत्रित एवं स्वच्छ जल प्रवाह सुनिश्चित करना

वित्तीय ढांचा: केंद्र उठाएगा 90 प्रतिशत खर्च

बैठक में सहमति बनी कि परियोजना के जल संसाधन से जुड़े हिस्से की 90 प्रतिशत लागत केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत राशि छह राज्यों के बीच साझा की जाएगी।

वहीं, बिजली उत्पादन से संबंधित लागत और जल हिस्सेदारी को लेकर भी राज्यों के बीच सहमति बन गई है। इसके तहत हिमाचल प्रदेश के हिस्से के कुछ जल का आवंटन दिल्ली और राजस्थान को किया जाएगा।

यमुना पुनर्जीवन की दिशा में कितना प्रभावी होगा यह प्रोजेक्ट?

केंद्र सरकार का मानना है कि बांध से नियंत्रित तरीके से पानी छोड़े जाने से यमुना में सालभर पर्याप्त जल प्रवाह बना रहेगा। इससे नदी की आत्मशुद्धि क्षमता बढ़ने और प्रदूषण के स्तर को कम करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, जल विशेषज्ञों का कहना है कि केवल अतिरिक्त जल उपलब्ध कराना यमुना को स्वच्छ बनाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।

यमुना की मौजूदा स्थिति को देखते हुए निम्नलिखित कदम भी उतने ही आवश्यक हैं:

सभी शहरों में सीवेज शोधन संयंत्रों की क्षमता बढ़ाना

औद्योगिक अपशिष्टों के अनियंत्रित प्रवाह पर रोक लगाना

नदी तटों से अतिक्रमण हटाना

ठोस कचरा प्रबंधन को सुदृढ़ करना

नदी के प्राकृतिक प्रवाह और पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित रखना

उत्तर भारत की जल सुरक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह परियोजना?

जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, भूजल के लगातार दोहन और तेजी से बढ़ती आबादी के कारण उत्तर भारत गंभीर जल संकट की चुनौतियों का सामना कर रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, किशाऊ परियोजना भविष्य की जल आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए पेयजल, सिंचाई, ऊर्जा उत्पादन और बाढ़ प्रबंधन के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

विशेष रूप से दिल्ली, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कई क्षेत्रों को दीर्घकालिक जल सुरक्षा प्रदान करने में इसकी अहम भूमिका हो सकती है।

पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौतियां भी कम नहीं

बड़े बांधों की तरह किशाऊ परियोजना भी कई गंभीर सवालों के घेरे में है।

विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशील पारिस्थितिकी को देखते हुए निम्नलिखित चिंताएं जताई हैं:

भूकंपीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में बड़े बांध की सुरक्षा

स्थानीय समुदायों के संभावित विस्थापन का मुद्दा

जैव विविधता और वन क्षेत्रों पर प्रभाव

नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव

जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में जल उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता

विशेषज्ञों का मानना है कि परियोजना के क्रियान्वयन के दौरान पर्यावरणीय मानकों का कड़ाई से पालन और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास एवं आजीविका संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

अंतरराज्यीय सहयोग का बड़ा उदाहरण

जल संसाधनों को लेकर राज्यों के बीच अक्सर विवाद देखने को मिलते हैं। ऐसे में छह राज्यों के बीच सहमति बनना सहकारी संघवाद की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

यह समझौता भविष्य में अन्य अंतरराज्यीय नदी परियोजनाओं के लिए भी एक मॉडल साबित हो सकता है।

बैठक में कौन-कौन रहा मौजूद?

बैठक में केंद्रीय बिजली मंत्री मनोहर लाल, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, केंद्रीय गृह सचिव, जल शक्ति सचिव, बिजली मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी तथा दोनों राज्यों के मुख्य सचिव शामिल हुए।

अब आगे क्या?

MoU पर हस्ताक्षर होने के बाद परियोजना को केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। मंजूरी मिलने के बाद वित्तीय, तकनीकी और पर्यावरणीय स्वीकृतियों की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

हालांकि, परियोजना की वास्तविक सफलता केवल बांध निर्माण से नहीं, बल्कि पारदर्शी क्रियान्वयन, पर्यावरणीय संतुलन और प्रभावित समुदायों के हितों की रक्षा पर निर्भर करेगी।

किशाऊ मल्टीपर्पस डैम परियोजना उत्तर भारत के लिए जल सुरक्षा, ऊर्जा उत्पादन और यमुना पुनर्जीवन का एक महत्वपूर्ण अवसर है, लेकिन इसके साथ जुड़ी पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौतियों का संतुलित समाधान ही इसे वास्तव में सफल बना सकेगा।

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VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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