Tuesday, September 8, 2026
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सड़क जनता की, कब्जा किसका? सेक्टर-127 में रेहड़ी-खोमचों का ‘साम्राज्य’, जाम और गंदगी ने खोली सिस्टम की पोल

“एक्सिस बैंक के पास सड़क किनारे बढ़ता कथित अतिक्रमण बना परेशानी का सबब | नालियों में कचरा, सड़क पर दुकानें और व्यवस्था ‘मूकदर्शक’ | स्थानीय लोगों का सवाल—किसके संरक्षण में चल रहा है यह खेल?”

नोएडा। शहर को स्मार्ट बनाने की योजनाएं कागजों पर दौड़ रही हैं, लेकिन जमीन पर कई जगह तस्वीर इसके ठीक उलट दिखाई देती है। नोएडा सेक्टर-127 में एक्सिस बैंक के आसपास सड़क किनारे रेहड़ी-खोमचों और अस्थायी दुकानों के कथित बढ़ते कब्जे ने इसी विरोधाभास को सामने ला दिया है। सड़क पर यातायात के लिए बनी जगह धीरे-धीरे दुकानों और ठेलों की कतार में बदलती नजर आ रही है। नतीजा—जाम, अव्यवस्था, गंदगी और स्थानीय लोगों की बढ़ती परेशानी।

विडंबना यह है कि जहां आम आदमी से सड़क पर एक इंच भी गलत तरीके से वाहन खड़ा करने पर सवाल पूछे जाते हैं, वहीं सार्वजनिक रास्ते पर अस्थायी कारोबार का फैलता दायरा कई सवाल खड़े कर रहा है। सवाल सिर्फ अतिक्रमण का नहीं है, बल्कि उस ‘मौन सहमति’ का भी है जिसके बिना किसी सार्वजनिक स्थान पर लगातार कब्जा जमाए रखना आसान नहीं माना जाता।

सड़क बनी दुकान, नाली बनी कूड़ेदान—कहां है जिम्मेदार विभाग?

स्थानीय लोगों के अनुसार सेक्टर-127 में एक्सिस बैंक के पास सड़क किनारे रेहड़ी-खोमचों और अस्थायी दुकानों की संख्या बढ़ती जा रही है। शुरुआत में कुछ ठेले या छोटी दुकानें दिखाई दी होंगी, लेकिन धीरे-धीरे यह व्यवस्था एक स्थायी बाजार का रूप लेती नजर आ रही है।

दुकानों के आसपास ग्राहकों की भीड़, सड़क किनारे खड़े वाहन और सामान फैलाए जाने से सड़क की उपयोगी चौड़ाई प्रभावित होने की शिकायत है। व्यस्त समय में स्थिति और खराब हो जाती है। वाहनों की आवाजाही प्रभावित होती है और लोगों को जाम जैसी समस्या से जूझना पड़ता है।

लेकिन कहानी का दूसरा और अधिक गंभीर अध्याय गंदगी से जुड़ा है।

खाने-पीने की दुकानों से निकलने वाला कचरा, प्लास्टिक, खाद्य सामग्री के अवशेष और अन्य अपशिष्ट आसपास पड़े रहने की शिकायत है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यही कचरा नाले-नालियों तक पहुंचकर जल निकासी व्यवस्था को प्रभावित करता है। गंदगी जमा होने से दुर्गंध और मच्छरों का प्रकोप बढ़ने की आशंका भी बनी रहती है।

यानी एक तरफ सड़क पर अतिक्रमण, दूसरी तरफ कचरे का ढेर—और बीच में आम नागरिक, जो हर दिन इस अव्यवस्था की कीमत चुकाने को मजबूर है।

‘अवैध’ है तो हटता क्यों नहीं? यही है सबसे बड़ा सवाल

सेक्टर-127 की इस स्थिति को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर सड़क किनारे संचालित हो रही इन अस्थायी दुकानों के पास संबंधित अनुमति नहीं है, तो फिर इनके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

और यदि अनुमति है, तो उसका दायरा क्या है?

क्या सड़क किनारे सार्वजनिक स्थान पर दुकान लगाने की अनुमति दी गई है? यदि दी गई है तो किस विभाग ने दी? क्या दुकानदारों को निर्धारित स्थान आवंटित किया गया है? क्या सफाई और कचरा प्रबंधन की कोई व्यवस्था है? क्या यातायात प्रभावित होने की स्थिति में कोई निरीक्षण किया गया?

इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।

क्योंकि असली समस्या केवल कुछ ठेले या खोमचे नहीं हैं। असली समस्या तब पैदा होती है जब अस्थायी व्यवस्था धीरे-धीरे स्थायी कब्जे में बदल जाती है और जिम्मेदार तंत्र उसे देखकर भी अनदेखा करता रहता है।

‘आज एक ठेला, कल पूरा बाजार’—अतिक्रमण का पुराना फॉर्मूला

शहरों में अतिक्रमण की कहानी अक्सर एक ही पटकथा पर चलती है।

पहले सड़क किनारे एक छोटा ठेला लगता है। फिर उसके आसपास दूसरा ठेला आ जाता है। कुछ दिनों बाद कुर्सियां दिखाई देती हैं। फिर तिरपाल लगती है। उसके बाद सामान रखने के लिए जगह घिरती है और देखते ही देखते सड़क का वह हिस्सा, जो कभी सार्वजनिक आवागमन के लिए था, एक छोटे बाजार में तब्दील हो जाता है।

अगर समय रहते कार्रवाई हो जाए तो समस्या वहीं खत्म हो सकती है।

लेकिन कार्रवाई न हो तो यही अस्थायी व्यवस्था धीरे-धीरे इतनी मजबूत हो जाती है कि बाद में उसे हटाना प्रशासन के लिए भी चुनौती बन जाता है।

सेक्टर-127 में स्थानीय लोगों की शिकायत इसी आशंका की ओर इशारा करती है।

किसके संरक्षण में? सवाल गंभीर है, जवाब जरूरी है

स्थानीय नागरिकों का सबसे तीखा सवाल यही है—आखिर सड़क पर यह कारोबार किसके संरक्षण में चल रहा है?

यह सवाल किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था की जवाबदेही तय करने के लिए उठाया जा रहा है।

यदि अतिक्रमण अवैध है तो उसे हटाने की जिम्मेदारी किसकी है?

यदि संबंधित विभाग को जानकारी है तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

यदि कार्रवाई हुई थी तो फिर वही स्थिति दोबारा कैसे बन गई?

और यदि दुकानदारों को किसी स्तर से अनुमति मिली है तो उस अनुमति की शर्तें क्या हैं?

इन सवालों का जवाब जितनी जल्दी मिले, उतना ही बेहतर होगा।

जाम में फंसा शहर, फाइलों में दौड़ता सिस्टम

नोएडा को देश के आधुनिक और सुनियोजित शहरों में गिना जाता है। चौड़ी सड़कें, सेक्टरों की व्यवस्थित योजना और आधुनिक बुनियादी ढांचे की चर्चा अक्सर शहर की पहचान के रूप में होती है।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि जहां सड़कें चौड़ी हैं, वहां भी यदि फुटपाथ, सड़क किनारे की जगह और सार्वजनिक स्थान धीरे-धीरे अतिक्रमण की चपेट में आते जाएं तो शहर की पूरी योजना सवालों के घेरे में आ जाती है।

व्यंग्य की स्थिति यह है कि शहर की सड़कें ट्रैफिक के लिए बनाई जाती हैं, लेकिन कुछ जगहों पर वे कारोबार के लिए ज्यादा उपयोगी साबित होने लगती हैं।

नागरिक जाम में खड़ा रहता है और व्यवस्था शायद यह सोचती रहती है कि अगली बैठक में इस समस्या पर चर्चा की जाएगी।

सफाई का दावा बनाम जमीन की गंदगी

स्वच्छता केवल सड़क पर झाड़ू लगाने से पूरी नहीं होती। बाजार या सड़क किनारे खाद्य सामग्री बेचने वाले स्थानों पर कचरा प्रबंधन की ठोस व्यवस्था जरूरी है।

यदि दुकानों से निकलने वाला कचरा नालियों में पहुंच रहा है तो यह केवल सफाई का मामला नहीं है। यह जल निकासी, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण से भी जुड़ा सवाल है।

स्थानीय लोगों की चिंता इसलिए भी गंभीर है क्योंकि बरसात के दौरान नालियों में कचरा जमा होने से पानी की निकासी प्रभावित होने की आशंका रहती है।

यानी आज की गंदगी कल जलभराव का कारण बन सकती है और आज का अतिक्रमण कल बड़े यातायात संकट में बदल सकता है।

थाना सेक्टर-126 क्षेत्र, लेकिन जिम्मेदारी किसकी?

यह इलाका थाना सेक्टर-126 क्षेत्र में आता है। हालांकि अतिक्रमण हटाना, सड़क और सार्वजनिक स्थान की निगरानी तथा सफाई व्यवस्था से जुड़े अधिकार अलग-अलग संबंधित विभागों के दायरे में हो सकते हैं।

इसीलिए नागरिकों की मांग है कि संबंधित विभाग आपसी समन्वय से मौके का निरीक्षण करें और वास्तविक स्थिति स्पष्ट करें।

पुलिस की भूमिका कानून-व्यवस्था और यातायात से जुड़ी परिस्थितियों में महत्वपूर्ण हो सकती है, जबकि अतिक्रमण और नगर व्यवस्था से संबंधित विभागों को अपने स्तर पर कार्रवाई करनी होगी।

सबसे जरूरी बात यह है कि जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने के बजाय एक संयुक्त कार्रवाई जमीन पर दिखाई दे।

अब सवाल कार्रवाई का नहीं, समय का भी है

स्थानीय लोगों का कहना है कि समस्या को छोटा समझकर टालना ठीक नहीं होगा। अतिक्रमण जितना बढ़ेगा, उसे हटाना उतना ही कठिन होगा।

प्रशासन को चाहिए कि मौके का निरीक्षण कर यह स्पष्ट करे कि कौन-सी दुकान या रेहड़ी वैध अनुमति के तहत है और कौन-सी नहीं। सड़क और सार्वजनिक स्थान को अतिक्रमण से मुक्त कराया जाए, कचरा फेंकने पर रोक लगाई जाए और नालियों की नियमित सफाई सुनिश्चित की जाए।

इसके साथ ही यदि किसी स्तर पर नियमों की अनदेखी हुई है तो उसकी भी जांच होनी चाहिए।

क्योंकि सवाल केवल कुछ रेहड़ियों का नहीं है।

सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें आम आदमी से नियमों के पालन की उम्मीद की जाती है, लेकिन सार्वजनिक सड़क पर नियमों की स्थिति खुद सवाल बन जाए।

सेक्टर-127 की सड़क फिलहाल एक आईना है—जिसमें अतिक्रमण से ज्यादा प्रशासनिक निगरानी की कमजोरी दिखाई देती है।

अब देखना यह है कि जिम्मेदार विभाग इस आईने में अपनी तस्वीर देखते हैं या फिर हमेशा की तरह इसे भी किसी फाइल के नीचे दबा दिया जाता है।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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