Tuesday, September 29, 2026
Your Dream Technologies
HomeUttar Pradesh₹4,000 करोड़ के नोएडा लीजबैक मामले में बड़ा प्रहार, वरिष्ठ PCS अधिकारी...

₹4,000 करोड़ के नोएडा लीजबैक मामले में बड़ा प्रहार, वरिष्ठ PCS अधिकारी हरीश चंद्र बर्खास्त

योगी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का बड़ा एक्शन—2011 में नोएडा प्राधिकरण की जमीन के लीजबैक मामले में विभागीय जांच के बाद सेवा से बाहर हुए 1997 बैच के अधिकारी

पर्दाफाश न्यूज़ | विशेष रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकारी कार्रवाई ने एक बार फिर नोएडा की जमीनों से जुड़े पुराने और बेहद गंभीर विवाद को सुर्खियों में ला दिया है। राज्य सरकार ने 1997 बैच के वरिष्ठ PCS अधिकारी हरीश चंद्र को सरकारी सेवा से बर्खास्त कर दिया है। यह कार्रवाई नोएडा विकास प्राधिकरण में उनके तत्कालीन सचिव पद पर कार्यकाल के दौरान सामने आए लीजबैक मामले से जुड़ी विभागीय अनुशासनिक कार्रवाई के बाद हुई है।

28 सितंबर 2026 को सामने आई जानकारी के मुताबिक नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग की ओर से बर्खास्तगी का आदेश जारी किया गया। प्रमुख सचिव नियुक्ति एवं कार्मिक एम. देवराज के आदेश के अनुसार कार्रवाई विभागीय अनुशासनिक कार्यवाही में सिद्ध आरोपों, लोक सेवा आयोग की सहमति तथा इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के 3 सितंबर 2026 के आदेश में सामने आए तथ्यों के आधार पर की गई।

हरीश चंद्र बर्खास्तगी से पहले पश्चिम बंगाल के कोलकाता में खाद्य एवं रसद विभाग के स्थानिक प्रतिनिधि के पद पर तैनात थे। लेकिन उनके प्रशासनिक करियर पर वर्षों से लंबित यह मामला अंततः उस मुकाम तक पहुंच गया, जहां विभागीय जांच के निष्कर्षों के बाद सरकार ने सेवा समाप्ति का फैसला लिया।


सवाल सिर्फ जमीन का नहीं, सरकारी तंत्र में लिए गए फैसलों की जवाबदेही का है

नोएडा को उत्तर प्रदेश के सबसे तेजी से विकसित होते शहरी क्षेत्रों में गिना जाता है। एक्सप्रेसवे, औद्योगिक क्षेत्र, ऊंची इमारतें और अरबों रुपये की परियोजनाएं इसकी पहचान बन चुकी हैं। लेकिन इसी चमकदार विकास के पीछे जमीन के इस्तेमाल, अधिग्रहण, आबादी, मुआवजे और लीजबैक से जुड़े विवाद भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं।

हरीश चंद्र से जुड़ा मामला इसी पृष्ठभूमि में बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

मामला वर्ष 2011 का है। उस समय हरीश चंद्र नोएडा विकास प्राधिकरण में सचिव के पद पर तैनात थे। विभागीय जांच के अनुसार ग्राम शहदरा से संबंधित सेक्टर 140-ए, 141, 142 और 143 के आसपास प्राधिकरण द्वारा अर्जित और कब्जे में ली गई जमीन के लीजबैक में गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए।

रिपोर्टों के अनुसार जांच के दायरे में करीब 3,81,527 वर्गमीटर जमीन थी। इस जमीन की बाजार कीमत अलग-अलग आकलनों में लगभग 3,800 करोड़ से 4,000 करोड़ रुपये तक बताई गई।

यानी जिस जमीन का मामला था, उसकी कीमत कोई मामूली रकम नहीं थी। यह ऐसा मामला था जिसमें जमीन का क्षेत्रफल और संभावित बाजार मूल्य दोनों ही प्रशासनिक फैसलों की गंभीरता को रेखांकित करते हैं।


450 वर्गमीटर की सीमा से 15 हजार वर्गमीटर से ज्यादा तक कैसे पहुंचा लीजबैक?

लीजबैक व्यवस्था को लेकर सबसे बड़ा सवाल यहीं खड़ा होता है।

उपलब्ध जांच विवरणों के मुताबिक संबंधित गांव के पात्र किसानों के लिए लीजबैक का प्रावधान था और एक परिवार के नाम अधिकतम 450 वर्गमीटर तक जमीन दिए जाने की व्यवस्था बताई गई है।

लेकिन जांच में ऐसे मामलों का उल्लेख हुआ जहां बाहरी व्यक्तियों और निजी कंपनियों के पक्ष में बड़े भूखंडों का लीजबैक किया गया। प्रकाशित विवरणों के अनुसार कुछ मामलों में भूखंडों का क्षेत्रफल 15,000 वर्गमीटर से अधिक तक पहुंच गया। एक रिपोर्ट में 175 वर्गमीटर से लेकर 15,340 वर्गमीटर तक के भूखंडों का उल्लेख है।

यहीं से पूरा मामला केवल प्रशासनिक चूक का नहीं रह जाता, बल्कि यह सवाल सामने आता है कि नियमों में निर्धारित पात्रता और सीमा के बावजूद इतने बड़े भूखंडों का लीजबैक किस प्रक्रिया के तहत हुआ?

किसने फाइल तैयार की?

किसने जांची?

किस स्तर पर आपत्तियां दर्ज हुईं?

किस आधार पर बाहरी लोगों और कंपनियों को पात्र माना गया?

और सबसे महत्वपूर्ण—जिन अधिकारियों और समितियों के सामने प्रस्ताव गया, उन्हें वास्तविक स्थिति की पूरी जानकारी दी गई थी या नहीं?

इन सवालों का जवाब विभागीय जांच के निष्कर्षों में तलाशा गया।


जांच में ‘तथ्य छिपाने’ और ‘भ्रामक रिपोर्ट’ के गंभीर निष्कर्ष

प्रकाशित शासनादेश संबंधी विवरणों में कहा गया है कि जांच के दौरान यह पाया गया कि कई महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया गया और संबंधित समितियों तथा उच्चाधिकारियों के समक्ष ऐसी रिपोर्ट प्रस्तुत की गई जिसे जांच में भ्रामक माना गया।

जांच विवरण के मुताबिक आबादी के निर्धारण में सैटेलाइट इमेज का इस्तेमाल किया जाना चाहिए था। आरोप यह था कि इस प्रक्रिया का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया गया और सर्वे में ऐसे भू-स्वामियों, निजी कंपनियों तथा गांव से बाहर के लोगों को भी शामिल किया गया, जिनकी पात्रता पर सवाल था।

जांच में यह भी कहा गया कि सर्वे के कुछ कॉलमों में मूल काश्तकारों से संबंधित आवश्यक जानकारी दर्ज नहीं की गई।

यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है।

क्योंकि जमीन संबंधी किसी भी सरकारी निर्णय में रिकॉर्ड ही आधार होता है। यदि रिकॉर्ड में मूल स्थिति स्पष्ट न हो, तो उसके आधार पर लिया गया फैसला किस हद तक विश्वसनीय माना जाएगा—यह अपने आप में गंभीर प्रशासनिक प्रश्न है।


निजी कंपनियों के नाम सामने आने से मामला और गंभीर

मामले में कुछ निजी कंपनियों का नाम भी जांच विवरणों में सामने आया है। प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक एस्टर इलेक्ट्रिक प्राइवेट लिमिटेड, महानंदा इलेक्ट्रॉनिक प्राइवेट लिमिटेड और प्रयास गारमेंट लिमिटेड से जुड़े नामों का उल्लेख जांच में किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार इन कंपनियों से संबंधित जमीन के रिकॉर्ड और सर्वे में तथ्यों को छिपाने के आरोप भी जांच का हिस्सा रहे।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी कंपनी का जांच दस्तावेज में नाम आना अपने आप में उसके विरुद्ध आपराधिक दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। लेकिन सरकारी विभागीय जांच में इनका उल्लेख इस बात को रेखांकित करता है कि लीजबैक प्रक्रिया की जांच केवल व्यक्तिगत लाभार्थियों तक सीमित नहीं थी, बल्कि निजी संस्थाओं तक भी उसके संभावित विस्तार की पड़ताल हुई।


2013 से चल रही थी विभागीय कार्रवाई, अब जाकर आया निर्णायक मोड़

यह मामला अचानक 2026 में सामने नहीं आया।

हरीश चंद्र के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया 2013 में शुरू हुई थी। 27 सितंबर 2013 को अनुशासनिक कार्रवाई की संस्तुति किए जाने और जांच मेरठ मंडलायुक्त को सौंपे जाने का उल्लेख प्रकाशित शासनादेश संबंधी विवरणों में है।

इसके बाद मामला वर्षों तक विभागीय जांच और कानूनी प्रक्रियाओं के बीच चलता रहा।

यही वजह है कि इस कार्रवाई का एक बड़ा पहलू प्रशासनिक व्यवस्था की गति भी है।

यदि किसी वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ इतने गंभीर आरोपों की विभागीय जांच वर्षों तक लंबित रहे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसी जांचों को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए व्यवस्था कितनी प्रभावी है?

क्योंकि कार्रवाई में देरी केवल आरोपी अधिकारी के करियर को प्रभावित नहीं करती। इससे सरकारी रिकॉर्ड, जमीन की स्थिति और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े सवाल भी वर्षों तक अधर में रह सकते हैं।


IAS रितु माहेश्वरी की जांच से खुली कई परतें

मामले की जांच नोएडा प्राधिकरण की तत्कालीन मुख्य कार्यपालक अधिकारी IAS रितु माहेश्वरी को सौंपी गई थी।

जांच पूरी होने के बाद रिपोर्ट शासन को भेजी गई। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार जांच में तत्कालीन सचिव हरीश चंद्र की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए और कई अनियमितताओं का उल्लेख किया गया।

जांच के निष्कर्षों में केवल जमीन का आवंटन ही मुद्दा नहीं था। बल्कि यह भी देखा गया कि प्रशासनिक समितियों के सामने कौन से तथ्य रखे गए, कौन से तथ्य छूटे और किस आधार पर लीजबैक की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

यही प्रक्रिया किसी भी बड़े जमीन मामले की असली कुंजी होती है।

कागजों पर एक हस्ताक्षर मामूली दिखाई दे सकता है, लेकिन हजारों करोड़ रुपये मूल्य की जमीन के मामले में वही हस्ताक्षर सरकारी संपत्ति के भविष्य को बदल सकता है।


UPPSC की सहमति के बाद बर्खास्तगी का फैसला

इस मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है।

उपलब्ध शासनादेश संबंधी विवरण के अनुसार उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग, प्रयागराज ने 6 जनवरी 2022 को अपनी सहमति उपलब्ध कराई थी। इसके बाद विभागीय प्रक्रिया आगे बढ़ी।

इसके साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के 3 सितंबर 2026 के आदेश में सामने आए तथ्यों को भी अंतिम कार्रवाई के आधारों में शामिल किया गया।

इसके बाद शासन ने हरीश चंद्र को सरकारी सेवा से बर्खास्त करने का फैसला किया।

इसलिए इस कार्रवाई को केवल किसी एक अधिकारी के खिलाफ तत्काल लिया गया प्रशासनिक फैसला मानना पूरी तस्वीर नहीं होगी। यह वर्षों से चली आ रही विभागीय जांच, आयोग की सहमति और न्यायिक प्रक्रिया के बाद सामने आया अंतिम प्रशासनिक कदम है।


IAS प्रमोशन की राह भी जांच के कारण अटकी रही

हरीश चंद्र 1997 बैच के वरिष्ठ PCS अधिकारी थे। उनके खिलाफ लंबित जांच का असर उनके करियर पर भी पड़ा।

उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक जांच लंबित होने के कारण उनके IAS कैडर में प्रमोशन की प्रक्रिया वर्षों तक प्रभावित रही। उनके कई जूनियर अधिकारी आगे बढ़कर IAS कैडर में शामिल हो चुके थे, जबकि उनके मामले में जांच के कारण निर्णय अटका रहा।

अब बर्खास्तगी के साथ उनके प्रशासनिक करियर का यह अध्याय समाप्त हो गया है।

लेकिन बड़ा सवाल अब भी जमीन पर है।

जिस जमीन के लीजबैक को लेकर इतने गंभीर निष्कर्ष सामने आए, उस जमीन की मौजूदा स्थिति क्या है?

क्या सभी लीजबैक की समीक्षा होगी?

क्या नियमों के विपरीत हुए आवंटनों को रद्द करने की प्रक्रिया चलेगी?

क्या सरकारी संपत्ति की संभावित क्षति की भरपाई के लिए कोई अलग कार्रवाई होगी?

और क्या इस पूरी प्रक्रिया में अन्य जिम्मेदार अधिकारियों या लाभार्थियों की भूमिका की भी समीक्षा की जाएगी?

इन सवालों का जवाब आने वाले समय में इस मामले की अगली दिशा तय करेगा।


बर्खास्तगी के बाद असली परीक्षा—क्या जमीन भी वापस आएगी?

किसी अधिकारी को सेवा से बर्खास्त करना प्रशासनिक कार्रवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन यदि विवाद सरकारी जमीन के लीजबैक से जुड़ा है, तो जनता के लिए असली सवाल केवल यह नहीं कि अधिकारी पर क्या कार्रवाई हुई।

असली सवाल यह है कि सरकारी जमीन का क्या हुआ?

यदि जांच में नियमविरुद्ध लीजबैक की बात सामने आई है तो उन भूखंडों की वर्तमान कानूनी स्थिति क्या है?

क्या रिकॉर्ड की दोबारा जांच होगी?

क्या जिन लोगों को नियमों के विपरीत लाभ मिला, उनसे संबंधित कार्रवाई होगी?

क्या जमीन वापस प्राधिकरण के नियंत्रण में आएगी?

और यदि सरकारी संपत्ति को नुकसान हुआ है तो उसकी भरपाई किससे और कैसे होगी?

इन प्रश्नों पर स्पष्ट सरकारी कार्रवाई इस पूरे मामले की वास्तविक प्रशासनिक परिणति को निर्धारित करेगी।


नोएडा की जमीन पर अब निगाहें और भी तेज

नोएडा में जमीन सिर्फ जमीन नहीं है। यह अरबों रुपये की आर्थिक गतिविधि, विकास योजनाओं और हजारों लोगों के भविष्य से जुड़ी संपत्ति है।

इसीलिए किसी भी सरकारी जमीन के आवंटन, अधिग्रहण या लीजबैक में पारदर्शिता और नियमों का पालन केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही का मूल आधार है।

हरीश चंद्र की बर्खास्तगी ने एक बार फिर यही सवाल सामने ला दिया है कि जमीन से जुड़े फैसलों में जिम्मेदारी किस स्तर तक तय की जाती है।

सरकार ने कार्रवाई कर दी।

विभागीय जांच ने निष्कर्ष दे दिए।

आयोग की सहमति सामने आ गई।

न्यायिक प्रक्रिया का संदर्भ भी शासनादेश में शामिल है।

अब नजर इस पर होगी कि क्या यह कार्रवाई केवल एक अधिकारी की सेवा समाप्ति तक सीमित रहती है या उन सभी जमीनों और लाभार्थियों तक भी पहुंचती है, जिनका उल्लेख जांच में हुआ है।


पर्दाफाश न्यूज़ का सवाल

अगर नियम सिर्फ पात्र स्थानीय किसानों के लिए थे, तो बाहरी लोगों और निजी कंपनियों तक बड़े भूखंडों का लीजबैक कैसे पहुंचा?

अगर रिकॉर्ड में तथ्य छिपाने और भ्रामक रिपोर्ट के निष्कर्ष सामने आए, तो उस पूरी प्रशासनिक श्रृंखला की जवाबदेही कहां तक तय होगी?

और अगर जमीन की कीमत हजारों करोड़ रुपये आंकी गई, तो सरकारी संपत्ति की संभावित क्षति की भरपाई का अगला कदम क्या होगा?

यह सवाल किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की जवाबदेही तय करने के लिए हैं जिसके जरिए सार्वजनिक संपत्ति से जुड़े फैसले लिए जाते हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार की कार्रवाई ने एक संदेश जरूर दिया है कि लंबे समय से लंबित विभागीय मामलों में भी अंतिम निर्णय संभव है। लेकिन इस कार्रवाई की पूरी सार्थकता तभी सामने आएगी जब संबंधित जमीन, लीजबैक रिकॉर्ड, लाभार्थियों और सरकारी संपत्ति की स्थिति पर भी पारदर्शी जानकारी सामने आए।

नोएडा के हजारों करोड़ रुपये के इस लीजबैक विवाद में एक अधिकारी की बर्खास्तगी कहानी का अंत नहीं, बल्कि उन सवालों की नई शुरुआत है जिनका जवाब जमीन के रिकॉर्ड में छिपा है।

पर्दाफाश न्यूज़ अब सवाल पूछता रहेगा—सरकारी जमीन आखिर किसके लिए थी, किसे मिली और किस प्रक्रिया के तहत मिली?

- Advertisement -
Your Dream Technologies
VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
VIKAS TRIPATHI भारत देश की सभी छोटी और बड़ी खबरों को सामने दिखाने के लिए "पर्दाफास न्यूज" चैनल को लेके आए हैं। जिसके लोगो के बीच में करप्शन को कम कर सके। हम देश में समान व्यवहार के साथ काम करेंगे। देश की प्रगति को बढ़ाएंगे।
RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments

Call Now Button