महाराष्ट्र में विधान परिषद की 9 सीटों (साथ ही एक रिक्त सीट) के लिए 12 मई को मतदान होना है। निर्वाचन कार्यक्रम के मुताबिक नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 30 अप्रैल, scrutiny 2 मई और नाम वापसी की अंतिम तिथि 4 मई तय की गई है। मतदान और मतगणना 12 मई को ही होगी।
लेकिन चुनावी प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना में उम्मीदवारों के नाम को लेकर जबरदस्त अंदरूनी खींचतान सामने आ गई है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक शिंदे ने महाराष्ट्र विधान परिषद की मौजूदा उपसभापति नीलम गोरे और पूर्व विधायक बच्चू कडू को उम्मीदवार बनाने का मन बनाया है, लेकिन इन दोनों नामों पर पार्टी के कई नेता, पदाधिकारी और कार्यकर्ता खुलकर नाराज हैं।
राज्यसभा में नया संदेश, लेकिन परिषद टिकट पर पुरानी नाराजगी
हाल ही में राज्यसभा चुनाव में सभी को चौंकाते हुए शिंदे ने पार्टी की प्रवक्ता प्रो. ज्योति वाघमारे को संसद भेजा था। इस फैसले को संगठन में मेहनत करने वालों को मौका देने के संकेत के तौर पर देखा गया।
इसी वजह से अब शिवसेना के भीतर यह सवाल और तेज हो गया है कि जब नई पीढ़ी और जमीनी कार्यकर्ताओं को आगे लाने की बात हो रही है, तो विधान परिषद के लिए फिर पुराने और बाहरी चेहरों पर भरोसा क्यों?
नीलम गोरे पर सवाल: चार बार मौका, फिर भी संगठन में असंतोष
नीलम गोरे का नाम सामने आते ही पार्टी के भीतर विरोध की आवाजें तेज हो गई हैं। गोरे इससे पहले चार बार विधान परिषद पहुंच चुकी हैं और मौजूदा कार्यकाल में परिषद की उपसभापति भी हैं। शिंदे गुट के कई नेताओं का कहना है कि लगातार 24 साल से विधान परिषद में रहने के बावजूद गोरे संगठन विस्तार, नए कार्यकर्ताओं को जोड़ने और पार्टी की जमीनी मजबूती बढ़ाने में कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं निभा सकीं। ऐसे में अब एक और मौका देना मेहनती शिवसैनिकों के साथ अन्याय माना जा रहा है।
पार्टी के अंदर यह भावना भी है कि इस सीट पर किसी ऐसे चेहरे को मौका मिलना चाहिए जिसने 2022 के बाद शिंदे के साथ खड़े होकर संगठन को मजबूत किया हो।
बच्चू कडू के नाम पर भी असहमति, शिवसेना नेताओं ने रखी विलय की शर्त
विधान परिषद की दूसरी संभावित सीट के लिए शिंदे की पसंद बच्चू कडू बताए जा रहे हैं। शिंदे और बच्चू कडू के बीच हालिया मुलाकात के बाद उनके नाम की चर्चा तेज हुई, लेकिन यहीं से पार्टी के भीतर नया विवाद खड़ा हो गया।
शिवसेना नेताओं का साफ सवाल है—बच्चू कडू का शिवसेना से सीधा राजनीतिक रिश्ता क्या है?
कई नेताओं ने शिंदे से कहा है कि अगर बच्चू कडू को विधान परिषद भेजना ही है, तो पहले उनकी पार्टी ‘प्रहार जनशक्ति संगठन’ का शिवसेना में विलय कराया जाए। नेताओं का तर्क है कि बाहर के सहयोगी को टिकट देने से पहले उन सैकड़ों शिवसैनिकों के बारे में सोचना चाहिए जो वर्षों से पार्टी के लिए काम कर रहे हैं।
संख्या शिंदे के साथ, लेकिन नाराजगी भी कम नहीं
महाराष्ट्र विधानसभा में शिंदे की शिवसेना के पास 57 विधायक हैं। विधान परिषद चुनाव में जीत के लिए करीब 28 वोटों का कोटा पर्याप्त माना जा रहा है। ऐसे में यदि मुकाबला हुआ भी तो शिवसेना की दोनों सीटें लगभग सुरक्षित मानी जा रही हैं।
यही वजह है कि पार्टी के भीतर दावेदारों की लंबी कतार लगी हुई है। मंत्री, पूर्व विधायक, प्रवक्ता, संगठन पदाधिकारी और क्षेत्रीय नेता—सभी टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं। ऐसे में नीलम गोरे और बच्चू कडू जैसे नामों को आगे करने से असंतोष खुलकर सामने आने लगा है।
शिंदे के सामने सिर्फ दो दिन, फैसला करेगा पार्टी का भविष्य संदेश
30 अप्रैल नामांकन की आखिरी तारीख है और एकनाथ शिंदे के पास उम्मीदवारों पर अंतिम मुहर लगाने के लिए अब बेहद कम समय बचा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ विधान परिषद का टिकट वितरण नहीं, बल्कि शिंदे की शिवसेना के भीतर शक्ति संतुलन की परीक्षा भी है। अगर शिंदे पुराने चेहरों पर दांव लगाते हैं तो कार्यकर्ताओं में गलत संदेश जा सकता है,और अगर नए नामों को मौका देते हैं तो यह साफ संकेत होगा कि पार्टी में अब वफादारी और जमीनी काम को प्राथमिकता मिलेगी। अब सबकी नजर इस बात पर है कि शिंदे संगठन की नाराजगी सुनते हैं या अपनी पसंद पर अडिग रहते हैं।














