आगरा/किरावली: तहसील किरावली क्षेत्र के ग्राम औलेण्डा में ग्राम सभा की जमीन पर कथित कब्जे और अवैध निर्माण का मामला अब मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंच गया है। गांव निवासी गोपाल पुत्र भागीरथ ने 29 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री को प्रार्थना पत्र भेजकर मौजा औलेण्डा की खसरा संख्या 1471 को ग्राम सभा की संपत्ति बताते हुए उस पर कथित कब्जे और निर्माण की शिकायत की है। शिकायतकर्ता ने प्रशासन से हस्तक्षेप कर भूमि को कब्जामुक्त कराने, कथित निर्माण हटाने और पूरे मामले की राजस्व अभिलेखों के आधार पर जांच कराने की मांग की है।
शिकायतकर्ता के अनुसार, खसरा संख्या 1471 में लगभग तीन बीघा भूमि पर कुछ लोगों द्वारा कथित रूप से कब्जा कर निजी उपयोग किया जा रहा है। प्रार्थना पत्र में राजेन्द्र प्रसाद दीक्षित के पुत्र शंकर, रामनिवास पुत्र बाबूराम और प्रभुदयाल सहित कुछ अन्य लोगों का उल्लेख किया गया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि ग्राम सभा की जमीन को निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल करने के साथ वहां निर्माण कार्य भी कराया गया है।
खसरा 1471 को लेकर गंभीर आरोप, फर्जी रसीद से आवंटन का दावा
मुख्यमंत्री को भेजे गए शिकायती पत्र में गोपाल ने आरोप लगाया है कि खसरा संख्या 1471 की भूमि को लेकर कथित तौर पर फर्जी रसीद के माध्यम से आवंटन का दावा तैयार किया गया। शिकायतकर्ता ने इसे ग्राम सभा की संपत्ति बताते हुए संबंधित दस्तावेजों की जांच की मांग की है।
शिकायत में यह भी आरोप है कि भूमि पर कथित कब्जे के कारण ग्रामीणों के आने-जाने के रास्ते को लेकर समस्या उत्पन्न हो रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि सार्वजनिक उपयोग की भूमि और रास्ते पर कब्जे की स्थिति है तो इससे केवल व्यक्तिगत भूमि विवाद नहीं, बल्कि ग्रामीणों के आवागमन का मुद्दा भी जुड़ जाता है।
हालांकि, प्रार्थना पत्र में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित आरोपित पक्षों का पक्ष भी अभी सामने नहीं आया है। ऐसे में भूमि की वास्तविक स्थिति और किसी भी कथित दस्तावेज की वैधता का निर्धारण राजस्व रिकॉर्ड, मौके की पैमाइश और प्रशासनिक जांच के बाद ही संभव होगा।
खसरा 1482 में निर्माण और धर्मशाला की जगह पर कब्जे का भी आरोप
शिकायत का दायरा केवल खसरा संख्या 1471 तक सीमित नहीं है। प्रार्थना पत्र में खसरा संख्या 1482 का भी उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि राजेन्द्र प्रसाद की ओर से इस भूमि पर भी कथित रूप से निर्माण कराया गया है।
इसके अलावा पत्र में जीवाराम पुत्र कुमेर सैन से कथित रूप से वसीयत कराने के बाद धर्मशाला की जगह पर कमरा लिखवाकर कब्जा करने का आरोप भी लगाया गया है। शिकायतकर्ता ने इन सभी मामलों की अलग-अलग जांच कराने की मांग की है।
इन आरोपों की स्थिति स्पष्ट करने के लिए संबंधित भूमि के राजस्व अभिलेख, पुरानी प्रविष्टियां, नक्शा, आवंटन अथवा पट्टे से जुड़े दस्तावेज और मौके पर मौजूद निर्माण की स्थिति महत्वपूर्ण होगी। प्रशासनिक जांच के दौरान यह भी देखा जा सकता है कि संबंधित भूमि का दर्ज उपयोग क्या है और वर्तमान में मौके पर उसका इस्तेमाल किस प्रकार हो रहा है।
पहले भी शिकायत का दावा, एफआईआर आदेश के बावजूद कार्रवाई पर सवाल
गोपाल ने मुख्यमंत्री को भेजे प्रार्थना पत्र में दावा किया है कि भूमि विवाद को लेकर पहले भी तहसील दिवस में शिकायत की जा चुकी है। इसके अलावा डोरी लाल टक नामक व्यक्ति द्वारा संबंधित संपत्ति के मामले में थाना फतेहपुर सीकरी में रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए प्रार्थना पत्र दिए जाने की बात भी कही गई है।
शिकायतकर्ता के अनुसार, इस मामले में जिलाधिकारी की ओर से एफआईआर दर्ज करने के आदेश भी दिए गए थे। इसके बावजूद आरोप है कि संबंधित भूमि को पूरी तरह कब्जामुक्त नहीं कराया गया और कथित निर्माण की स्थिति बनी हुई है।
यदि शिकायतकर्ता द्वारा किए गए ये दावे अभिलेखों से सही पाए जाते हैं, तो यह सवाल भी महत्वपूर्ण होगा कि पूर्व में दिए गए प्रशासनिक निर्देशों पर किस स्तर तक कार्रवाई हुई और भूमि की स्थिति को लेकर मौके पर क्या जांच की गई।
रास्ता बंद होने से ग्रामीणों को परेशानी का आरोप
खसरा संख्या 1471 को लेकर शिकायत में ग्रामीणों के आवागमन का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि कथित कब्जे के चलते रास्ते के उपयोग में बाधा पैदा हो रही है।
ग्रामीण क्षेत्र में रास्ते और सार्वजनिक भूमि से जुड़े विवाद सीधे तौर पर आम लोगों के दैनिक आवागमन को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाने की स्थिति में प्रशासन के सामने केवल कब्जे की जांच ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक रास्ते की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने की जिम्मेदारी भी होगी।
पैमाइश और राजस्व रिकॉर्ड से खुलेगा जमीन का सच
मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि खसरा संख्या 1471 की राजस्व अभिलेखों में वास्तविक स्थिति क्या है। क्या यह भूमि वर्तमान रिकॉर्ड में ग्राम सभा की संपत्ति के रूप में दर्ज है, क्या इसके संबंध में किसी व्यक्ति के नाम वैध आवंटन या पट्टा दर्ज है, मौके पर कितना क्षेत्रफल कब्जे में है और निर्माण किस भूमि पर हुआ है—इन सवालों के जवाब प्रशासनिक जांच से ही सामने आ सकते हैं।
इसी तरह कथित रसीद और आवंटन से जुड़े दस्तावेजों की भी जांच जरूरी होगी। यदि किसी दस्तावेज के आधार पर निजी अधिकार का दावा किया गया है तो उसकी वैधता, जारी करने वाले सक्षम अधिकारी और संबंधित राजस्व रिकॉर्ड में उसकी प्रविष्टि की जांच महत्वपूर्ण होगी।
मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग, प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी निगाहें
शिकायतकर्ता गोपाल ने मुख्यमंत्री से मामले में हस्तक्षेप करते हुए कथित अवैध निर्माण हटवाने और ग्राम सभा की भूमि को सुरक्षित कराने की मांग की है। अब निगाहें स्थानीय प्रशासन और राजस्व विभाग की कार्रवाई पर टिकी हैं।
मामले में निष्पक्ष जांच के लिए खसरा संख्या 1471 और 1482 की मौके पर पैमाइश, राजस्व अभिलेखों का परीक्षण, कथित आवंटन और रसीद की जांच तथा निर्माण की स्थिति का सत्यापन अहम होगा।
फिलहाल मामला मुख्यमंत्री को दिए गए एक शिकायती पत्र और उसमें लगाए गए आरोपों के आधार पर सामने आया है। कथित कब्जे, फर्जी रसीद, अवैध निर्माण और पूर्व में एफआईआर के आदेश संबंधी दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। संबंधित पक्षों का पक्ष और प्रशासनिक जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
ग्राम सभा की संपत्ति सार्वजनिक हित से जुड़ी होती है। ऐसे में यदि शिकायत में लगाए गए आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो भूमि को कब्जामुक्त कराने के साथ जिम्मेदारी तय करना भी प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण होगा। वहीं, यदि दस्तावेजों और राजस्व रिकॉर्ड में स्थिति अलग पाई जाती है तो वह तथ्य भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना चाहिए। अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री कार्यालय और जिला प्रशासन इस शिकायत पर क्या कदम उठाते हैं और क्या राजस्व विभाग की पैमाइश से खसरा संख्या 1471 और 1482 की जमीन का पूरा सच सामने आता है।














