अयोध्या: राम मंदिर के पहले CEO के रूप में पूर्व एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति के साथ ही अयोध्या की धार्मिक व्यवस्था में एक बड़ा प्रशासनिक बदलाव देखने को मिला है। चढ़ावा चोरी के आरोपों को लेकर देशभर में चल रहे विवाद और मंदिर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों के बीच जितेंद्र मिश्रा ने अयोध्या पहुंचकर अपने कार्यकाल की औपचारिक शुरुआत की। एयरपोर्ट पर उनका अंगवस्त्र पहनाकर स्वागत किया गया। इसके बाद वे श्री राम जन्मभूमि परिसर पहुंचे और ट्रस्ट की पहली बैठक में शामिल हुए।
जितेंद्र मिश्रा का अयोध्या दौरा ऐसे समय हुआ है, जब उनकी नियुक्ति को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। विपक्ष के कुछ नेताओं ने सवाल उठाया है कि आखिर एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी को राम मंदिर जैसे धार्मिक संस्थान की प्रशासनिक जिम्मेदारी क्यों सौंपी गई? दूसरी ओर बीजेपी और विश्व हिंदू परिषद की ओर से इसे क्षमता, दक्षता और प्रशासनिक अनुभव पर आधारित फैसला बताया जा रहा है।
नियुक्ति पर विपक्ष के सवाल, बीजेपी का पलटवार
कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति को लेकर सवाल उठाते हुए पूछा कि कहीं ऑपरेशन सिंदूर के अंदर कोई सच तो नहीं छिपा है? उनके इस बयान पर बीजेपी नेता प्रदीप भंडारी ने पलटवार किया और इसे कांग्रेस की सेना के प्रति कथित नफरत बताया।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी नियुक्ति पर तंज कसते हुए सवाल किया कि क्या मंदिर ट्रस्ट को साधु-संतों में ईमानदार और योग्य लोग नहीं दिखे? इसके जवाब में बीजेपी सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि ट्रस्ट ने उपयोगिता और दक्षता को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया है।
यानी विवाद का केंद्र सिर्फ CEO की नियुक्ति नहीं, बल्कि यह भी है कि राम मंदिर जैसे धार्मिक और आस्था से जुड़े संस्थान को किस तरह के प्रशासनिक ढांचे के तहत चलाया जाना चाहिए।
भूपेश बघेल और संजय राउत के बयान से बढ़ा विवाद
कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी नियुक्ति पर कटाक्ष करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी को अब बीजेपी, RSS और VHP के लोगों पर विश्वास नहीं रहा। बीजेपी की ओर से सुधांशु त्रिवेदी ने इसका जवाब देते हुए पलटवार किया और कहा कि सरयू को रक्तरंजित करने वाले लोग अब सवाल उठा रहे हैं।
वहीं शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत ने CEO की नियुक्ति को मंदिर के व्यावसायीकरण से जोड़ दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब पहली बार राम मंदिर ट्रस्ट को CEO मिला है तो क्या इसका मतलब मंदिर का बिजनेस मॉडल बनना है? उनके मुताबिक बिजनेस में CEO, मैनेजिंग डायरेक्टर और डायरेक्टर होते हैं।
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी नियुक्तियों को लेकर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि पहले जिन लोगों की नियुक्तियां हुईं, वे किसने की थीं? सरकार ने की थीं। उनका आरोप था कि सरकार किसी को भी लाकर नियुक्त कर सकती है और इससे जनता की आस्था का मजाक बनता है।
‘राम धन’ की सुरक्षा सबसे बड़ा सवाल
राजनीतिक बहस के बीच सबसे संवेदनशील सवाल मंदिर में आने वाले चढ़ावे और ‘राम धन’ की सुरक्षा को लेकर है। चढ़ावा चोरी के आरोपों ने पहले ही ट्रस्ट की व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में यह पूछा जा रहा है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, इसकी क्या गारंटी होगी?
यही वजह है कि जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति को सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव के तौर पर नहीं देखा जा रहा। उनके सामने मंदिर की व्यवस्थाओं को पारदर्शी बनाने, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और चढ़ावे की गिनती तथा प्रबंधन की पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित करने की बड़ी जिम्मेदारी होगी।
विश्व हिंदू परिषद ने हालांकि नियुक्ति में किसी राजनीतिक एजेंडे की संभावना से इनकार किया है। VHP नेता सुरेंद्र जैन के मुताबिक ट्रस्ट ने जितेंद्र मिश्रा को CEO बनाकर उनकी क्षमता और योग्यता पर विश्वास जताया है। उन्होंने कहा कि इसके पीछे किसी दूसरे एजेंडे को देखने की जरूरत नहीं है।
पहली बैठक में सिर्फ परिचय और व्यवस्था की जानकारी
राजनीतिक विवादों से अलग अयोध्या पहुंचे नए CEO जितेंद्र मिश्रा ने अपने कार्यकाल के पहले दिन श्री राम जन्मभूमि कार्यालय में करीब एक घंटे तक बैठक की। इस बैठक में ट्रस्ट के कई पदाधिकारी और ट्रस्टी मौजूद रहे।
पहली बैठक का मुख्य उद्देश्य परिचय और व्यवस्था को समझना रहा। जितेंद्र मिश्रा को ट्रस्ट की मौजूदा कार्यप्रणाली, प्रशासनिक व्यवस्था और अलग-अलग विभागों की जिम्मेदारियों की जानकारी दी गई। आने वाले दिनों में उनके कार्यक्षेत्र और जिम्मेदारियों का विस्तृत निर्धारण किया जाएगा।
बैठक के बाद स्पष्ट संकेत मिले कि नए CEO तत्काल बड़े फैसले लेने के बजाय पहले मंदिर की पूरी व्यवस्था को समझने पर जोर दे रहे हैं।
45 दिन तक व्यवस्था को समझेंगे जितेंद्र मिश्रा
जितेंद्र मिश्रा के सामने अयोध्या की जटिल व्यवस्थाओं को समझना पहली प्राथमिकता है। मंदिर में रोजाना बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। दर्शन व्यवस्था, सुरक्षा, दान और चढ़ावे की प्रक्रिया, मंदिर परिसर का संचालन, प्रशासनिक समन्वय और श्रद्धालुओं की सुविधा—इन सभी क्षेत्रों को समझे बिना कोई बड़ा प्रशासनिक बदलाव संभव नहीं है।
इसी वजह से जितेंद्र मिश्रा शुरुआती दौर में ट्रस्ट के साथ बैठकें करेंगे और विभिन्न व्यवस्थाओं का निरीक्षण करेंगे। बताया गया है कि करीब 45 दिनों तक वे ट्रस्ट के कामकाज और मंदिर की व्यवस्थाओं को समझने के बाद पूरी तरह CEO की जिम्मेदारी संभालेंगे।
चंपत राय से मिले गोविंद देव गिरि
इसी प्रशासनिक बदलाव के बीच ट्रस्ट के नए महासचिव गोविंद देव गिरि ने पूर्व महासचिव चंपत राय से मुलाकात की। इस बैठक में पूर्व ट्रस्टी अनिल मिश्रा और ट्रस्ट के विशेष आमंत्रित सदस्य दिनेश चंद्र भी मौजूद रहे।
प्रशासनिक बदलाव के बाद हुई यह बैठक करीब एक घंटे तक बंद कमरे में चली। बैठक को ट्रस्ट की आगे की कार्यप्रणाली और जिम्मेदारियों के हस्तांतरण के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
उधर, रामलला के दर्शन करने के बाद CEO जितेंद्र मिश्रा ने राम जन्मभूमि परिसर का भी गहन निरीक्षण किया। उन्होंने ग्रीन हाउस में दर्शन व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था और दान काउंटर पर चढ़ावे की गिनती से जुड़ी प्रक्रिया की जानकारी ली।
सैन्य अनुशासन बनाम धार्मिक परंपरा की बड़ी परीक्षा
जितेंद्र मिश्रा का सबसे बड़ा परीक्षण यही होगा कि वे सैन्य और प्रशासनिक अनुशासन को मंदिर की धार्मिक परंपराओं और मर्यादाओं के साथ किस तरह संतुलित करते हैं। सेना में लंबे अनुभव से उन्हें अनुशासन, सुरक्षा, संकट प्रबंधन और संस्थागत कार्यप्रणाली की समझ मिली है। लेकिन राम मंदिर का प्रशासन केवल सुरक्षा या प्रबंधन तक सीमित नहीं है।
यहां धार्मिक परंपराएं, संत समाज, श्रद्धालुओं की भावनाएं, स्थानीय प्रशासन और मंदिर ट्रस्ट—सभी को साथ लेकर चलना होगा। ऐसे में उनके सामने चुनौती एक ऐसी व्यवस्था तैयार करने की होगी, जिसमें आधुनिक प्रशासनिक दक्षता के साथ धार्मिक मर्यादा भी पूरी तरह कायम रहे।
जितेंद्र मिश्रा बोले—पहले समझूंगा, फिर टेकओवर करूंगा
अयोध्या में अपने पहले दौरे पर जितेंद्र मिश्रा ने कहा कि वे ट्रस्ट की पहली बैठक में शामिल हुए, जो मुख्य रूप से परिचय की बैठक थी। उन्होंने बताया कि इस दौरान एक-दूसरे के काम और जिम्मेदारियों को समझने का अवसर मिला।
उन्होंने कहा कि अगले तीन से चार दिनों तक, जितना ट्रस्ट चाहेगा, वे उसके साथ बैठकें करेंगे और अपने काम को समझेंगे। सभी व्यवस्थाओं और जिम्मेदारियों को समझने के बाद ही वे CEO के तौर पर पूरी तरह टेकओवर करेंगे।
चुनौतियां बड़ी, उम्मीदें उससे भी बड़ी
राम मंदिर के नए CEO के सामने सबसे पहली चुनौती चढ़ावा चोरी के आरोपों के बाद ट्रस्ट की साख को मजबूत करने की होगी। इसके साथ ही लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ का प्रबंधन, सुरक्षा व्यवस्था, दान और चढ़ावे में पारदर्शिता, स्थानीय संस्थाओं तथा संत समाज के साथ बेहतर समन्वय और मंदिर की व्यवस्थाओं को अनुशासित बनाना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल हो सकता है।
राजनीति फिलहाल उनकी नियुक्ति के इर्द-गिर्द घूम रही है, लेकिन असली परीक्षा आने वाले दिनों में प्रशासनिक स्तर पर होगी। जितेंद्र मिश्रा को यह साबित करना होगा कि उनकी नियुक्ति केवल एक प्रयोग नहीं, बल्कि राम मंदिर की बढ़ती व्यवस्थाओं को आधुनिक, सुरक्षित, पारदर्शी और प्रभावी बनाने की दिशा में उठाया गया कदम है।
अयोध्या में अब नजर इस बात पर रहेगी कि पूर्व एयर मार्शल का अनुभव राम मंदिर की व्यवस्था में किस तरह दिखाई देता है। सियासत के सवाल अपनी जगह हैं, लेकिन CEO के रूप में जितेंद्र मिश्रा की असली परीक्षा मंदिर की व्यवस्था, चढ़ावे की पारदर्शिता, सुरक्षा और श्रद्धालुओं के भरोसे के मोर्चे पर होगी।














