“ED की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने दिया अतिरिक्त समय; राउज एवेन्यू कोर्ट द्वारा चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार किए जाने के आदेश को चुनौती, PMLA की कानूनी व्याख्या पर टिकी पूरे मामले की दिशा”
नई दिल्ली: देश की राजनीति और न्यायिक हलकों में लंबे समय से चर्चा का विषय बने नेशनल हेराल्ड मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट से कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी तथा अन्य आरोपितों को बड़ी राहत मिली। हाईकोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की उस याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए कांग्रेस नेताओं को तीन सप्ताह का अतिरिक्त समय प्रदान किया, जिसमें राउज एवेन्यू कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है जिसने ED की चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया था।
अब इस बहुचर्चित मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर को होगी। माना जा रहा है कि यह सुनवाई केवल इस केस के लिए ही नहीं, बल्कि मनी लॉन्ड्रिंग कानून (PMLA) की कानूनी व्याख्या के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
क्या है पूरा मामला?
नेशनल हेराल्ड केस की जड़ें उस विवाद से जुड़ी हैं जिसमें आरोप लगाया गया कि कांग्रेस से जुड़ी कंपनी यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) की संपत्तियों पर नियंत्रण हासिल किया गया। इसी मामले में वित्तीय अनियमितताओं और कथित मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जांच ED कर रही है।
प्रवर्तन निदेशालय ने जांच पूरी करने के बाद विशेष अदालत में शिकायत (चार्जशीट) दाखिल की थी, लेकिन राउज एवेन्यू कोर्ट ने दिसंबर 2025 में उस पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया। अदालत का कहना था कि बिना किसी ‘शेड्यूल्ड ऑफेंस’ में दर्ज FIR के, PMLA के तहत शिकायत पर सीधे संज्ञान लेना कानूनन उचित नहीं है।
यही आदेश अब ED ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
हाईकोर्ट में क्या हुआ?
सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अन्य आरोपितों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत से जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा।
अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए तीन सप्ताह का समय दे दिया।
दूसरी ओर, ED की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कड़ा विरोध दर्ज कराया। उन्होंने कहा कि प्रतिवादियों को पहले ही लगभग दो महीने का समय दिया जा चुका है, इसके बावजूद जवाब दाखिल नहीं किया गया।
उन्होंने अदालत से कहा कि यह मामला पूरी तरह कानून की व्याख्या से जुड़ा है और ट्रायल कोर्ट का आदेश विधि सम्मत नहीं माना जा सकता।
ED का सबसे बड़ा तर्क क्या है?
प्रवर्तन निदेशालय का कहना है कि ट्रायल कोर्ट ने PMLA की व्याख्या गलत तरीके से की।
ED का दावा है कि यदि किसी मामले में अपराध से अर्जित संपत्ति (Proceeds of Crime) के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हों, तो केवल इस आधार पर शिकायत खारिज नहीं की जा सकती कि मूल अपराध में FIR दर्ज नहीं हुई।
जांच एजेंसी का कहना है कि ट्रायल कोर्ट ने तकनीकी आधार पर चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार कर कानून की गलत व्याख्या की है।
इसी कारण उसने हाईकोर्ट से ट्रायल कोर्ट का आदेश निरस्त करने की मांग की है।
ट्रायल कोर्ट ने क्यों खारिज किया था संज्ञान?
16 दिसंबर 2025 को विशेष अदालत ने ED की शिकायत पर संज्ञान लेने से इनकार करते हुए कहा था कि—
- PMLA के तहत कार्रवाई का आधार बनने वाले मूल अपराध (Scheduled Offence) में FIR दर्ज नहीं हुई।
- केवल शिकायत के आधार पर आगे बढ़ना कानून की मंशा के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
- मामले की शुरुआत भले ही शिकायतकर्ता सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका से हुई हो, लेकिन CBI ने बाद में कोई FIR दर्ज नहीं की।
- ऐसे में ED की शिकायत पर सीधे संज्ञान लेना उचित नहीं है।
यही आदेश अब हाईकोर्ट में चुनौती के दायरे में है।
22 दिसंबर 2025 को जारी हुआ था नोटिस
दिल्ली हाईकोर्ट ने इससे पहले 22 दिसंबर 2025 को सोनिया गांधी, राहुल गांधी तथा अन्य आरोपितों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
इसके बाद कई बार सुनवाई टली और जवाब दाखिल करने के लिए समय बढ़ाया गया। सोमवार को भी अदालत ने अंतिम रूप से तीन सप्ताह का अतिरिक्त समय देते हुए अगली सुनवाई की तारीख 10 सितंबर निर्धारित कर दी।
PMLA की व्याख्या पर टिकी कानूनी बहस
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल राजनीतिक नहीं बल्कि कानूनी भी है।
दरअसल, अदालत को यह तय करना होगा कि—
- क्या PMLA के तहत शिकायत दायर करने के लिए मूल अपराध में FIR अनिवार्य है?
- क्या ED स्वतंत्र रूप से शिकायत दाखिल कर सकती है?
- क्या ट्रायल कोर्ट ने कानून की सही व्याख्या की?
इन सवालों के जवाब भविष्य में मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े कई मामलों की दिशा तय कर सकते हैं।
राजनीतिक हलकों में भी बढ़ी हलचल
नेशनल हेराल्ड मामला लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख मुद्दा बना हुआ है।
कांग्रेस लगातार आरोप लगाती रही है कि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है।
वहीं, भाजपा का कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है और किसी भी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता।
इसी वजह से इस मामले की हर सुनवाई राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद अहम मानी जाती है।
10 सितंबर की सुनवाई क्यों होगी निर्णायक?
अब तीन सप्ताह के भीतर सभी प्रतिवादियों को अपना जवाब दाखिल करना होगा।
इसके बाद 10 सितंबर को हाईकोर्ट यह तय करेगा कि—
- ट्रायल कोर्ट का आदेश सही था या नहीं,
- ED की दलीलें प्रथम दृष्टया कितनी मजबूत हैं,
- और क्या मामले में आगे चार्जशीट पर संज्ञान लेने का रास्ता खुल सकता है।
यदि हाईकोर्ट ED की दलीलों से सहमत होता है, तो मामला दोबारा ट्रायल कोर्ट में आगे बढ़ सकता है। वहीं यदि ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा जाता है, तो जांच एजेंसी के लिए यह बड़ा कानूनी झटका माना जाएगा।
फिलहाल राहत, लेकिन कानूनी लड़ाई जारी
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अन्य आरोपितों को तीन सप्ताह का अतिरिक्त समय दिए जाने से कांग्रेस नेताओं को फिलहाल राहत जरूर मिली है, लेकिन मामले का अंतिम फैसला अभी दूर है। अब सबकी निगाहें 10 सितंबर की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां केवल इस हाई-प्रोफाइल मामले की दिशा ही नहीं, बल्कि PMLA के तहत जांच और अभियोजन की प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों पर भी अदालत की राय सामने आ सकती है। यही कारण है कि इस सुनवाई को देश के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक अपराध मामलों में से एक माना जा रहा है।














