Wednesday, May 27, 2026
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कानपुर मेडिकल लापरवाही मामला: “जब बेटा अकेला था तो सिस्टम खामोश रहा, अफसर पहुंचे तो 36 घंटे में बदल गई रिपोर्ट”

कानपुर में ITBP जवान की मां का हाथ कटने का मामला अब सिर्फ मेडिकल लापरवाही का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करने वाला मामला बन चुका है।जिस परिवार को नौ दिनों तक न्याय के लिए अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़े, उसी मामले में अचानक तब तेजी आ गई जब ITBP के कमांडेंट गौरव प्रसाद करीब 50 सशस्त्र जवानों के साथ पुलिस कमिश्नर कार्यालय पहुंच गए।

अब सवाल सिर्फ अस्पतालों की लापरवाही का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का भी है जो आम आदमी की आवाज सुनने में देर करती है, लेकिन दबाव बनते ही फाइलों की दिशा बदल जाती है।


नौ दिन तक भटकता रहा बेटा, लेकिन सिस्टम नहीं जागा

पीड़ित परिवार का आरोप है कि जवान की मां की हालत लगातार बिगड़ती रही, लेकिन अस्पतालों ने समय पर सही इलाज नहीं दिया। विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह में देरी हुई, जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाली जाती रही और आखिरकार महिला का हाथ काटना पड़ा।

इस दर्दनाक घटना के बाद जवान लगातार अधिकारियों से गुहार लगाता रहा।
CMO कार्यालय, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों तक शिकायत पहुंची, लेकिन शुरुआती स्तर पर मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया।

परिवार को उम्मीद थी कि जांच होगी, दोषियों पर कार्रवाई होगी, लेकिन शुरुआती मेडिकल रिपोर्ट ने उल्टा अस्पतालों और डॉक्टरों को राहत देने का काम किया। यहीं से पूरे मामले पर सवाल उठने शुरू हो गए।


पहली रिपोर्ट पर उठे “डॉक्टरों को बचाने” के आरोप

मामले की पहली मेडिकल रिपोर्ट सामने आते ही पीड़ित परिवार और सामाजिक संगठनों में नाराजगी फैल गई। आरोप लगे कि रिपोर्ट में अस्पतालों की जिम्मेदारी को हल्का दिखाया गया और डॉक्टरों को बचाने की कोशिश की गई।

सबसे बड़ा सवाल यह था कि अगर इलाज में कोई कमी नहीं थी, तो फिर मरीज का हाथ काटने की नौबत आखिर आई कैसे?

लोगों का कहना था कि एक गरीब या आम परिवार की शिकायत शायद इतनी गंभीरता से नहीं सुनी जा रही थी। मामला धीरे-धीरे दबता दिखाई दे रहा था।


फिर अचानक बदल गया पूरा घटनाक्रम

शनिवार को पूरा मामला उस समय नए मोड़ पर पहुंच गया, जब ITBP के कमांडेंट गौरव प्रसाद लगभग 50 सशस्त्र जवानों के साथ पुलिस कमिश्नर कार्यालय पहुंचे।

बताया गया कि उनका उद्देश्य पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की मांग करना था। लेकिन इस घटनाक्रम के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई।

जो सिस्टम नौ दिनों तक धीमी रफ्तार में चल रहा था, वह अचानक सक्रिय हो गया।


महज 36 घंटे में पलट गई मेडिकल रिपोर्ट

कमांडेंट और जवानों के पहुंचने के बाद महज 36 घंटे के भीतर मेडिकल जांच रिपोर्ट बदल दी गई।

डॉक्टरों के नए पैनल ने साफ माना कि अगर समय पर विशेषज्ञ की सलाह और सही उपचार मिलता, तो महिला का हाथ बचाया जा सकता था।

यानी जिस लापरवाही को पहले लगभग नजरअंदाज किया जा रहा था, वही अब आधिकारिक रूप से स्वीकार कर ली गई।

यहीं से लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई कि —
“क्या सच सामने आने के लिए दबाव जरूरी था?”


दोनों बड़े अस्पतालों पर FIR के आदेश

नई रिपोर्ट के बाद प्रशासन ने दोनों अस्पतालों के प्रबंधन के खिलाफ FIR दर्ज करने के आदेश दे दिए।

अब अस्पतालों की इमरजेंसी व्यवस्था, डॉक्टरों की भूमिका, इलाज में हुई देरी और मेडिकल प्रोटोकॉल की जांच की तैयारी हो रही है।

लेकिन लोगों का सवाल है कि अगर यह लापरवाही पहले भी मौजूद थी, तो कार्रवाई करने में नौ दिन क्यों लगे?


“एक तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी” — जनता में गुस्सा

इस पूरे घटनाक्रम के बाद लोगों में भारी नाराजगी है।
जनता का कहना है कि पहले तो इलाज में लापरवाही हुई, फिर शुरुआती रिपोर्ट में सच्चाई दबाने की कोशिश हुई और जब मामला दबाव में आया तो प्रशासनिक कार्रवाई शुरू हुई।

लोग इसे उसी कहावत से जोड़कर देख रहे हैं —
“एक तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी।”

यानी पहले गलती हुई, फिर उसे छिपाने की कोशिश भी हुई।


अब सवाल सिर्फ अस्पतालों पर नहीं, सिस्टम पर भी

यह मामला अब कई बड़े सवाल खड़े कर रहा है —

क्या पहली मेडिकल रिपोर्ट निष्पक्ष थी?

क्या अस्पतालों को बचाने का प्रयास हुआ?

अगर ITBP अधिकारी न पहुंचते तो क्या मामला दब जाता?

क्या आम आदमी को न्याय पाने के लिए हमेशा दबाव बनाना पड़ेगा?

क्या स्वास्थ्य विभाग की जांच प्रक्रिया भरोसेमंद है?


पुलिस कमिश्नर ने ITBP डीजी को लिखा पत्र

इधर, पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने ITBP कमांडेंट के 50 सशस्त्र जवानों के साथ पहुंचने के मामले को भी गंभीरता से लिया है।

उन्होंने ITBP के महानिदेशक को पत्र लिखकर पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी है और जांच की मांग की है।

हालांकि आम लोगों के बीच अब यह चर्चा भी तेज है कि —
“जिस सिस्टम ने पीड़ित की आवाज नहीं सुनी, उसी सिस्टम को जगाने के लिए आखिर इतनी बड़ी मौजूदगी क्यों जरूरी पड़ी?”


अब पूरे प्रदेश की नजर इस मामले पर

कानपुर का यह मामला अब सिर्फ एक परिवार की लड़ाई नहीं रह गया है।
यह स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और न्याय प्रक्रिया की पारदर्शिता की बड़ी परीक्षा बन चुका है।

लोग अब सिर्फ अस्पतालों पर कार्रवाई नहीं, बल्कि पहली रिपोर्ट तैयार करने वालों और मामले को दबाने की कोशिश करने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।

क्योंकि सवाल सिर्फ एक हाथ कटने का नहीं है…
“सवाल यह है कि क्या इस व्यवस्था में आम आदमी की आवाज बिना दबाव के सुनी जाती है या नहीं।”

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
VIKAS TRIPATHI भारत देश की सभी छोटी और बड़ी खबरों को सामने दिखाने के लिए "पर्दाफास न्यूज" चैनल को लेके आए हैं। जिसके लोगो के बीच में करप्शन को कम कर सके। हम देश में समान व्यवहार के साथ काम करेंगे। देश की प्रगति को बढ़ाएंगे।
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