“संसद की अहम समितियों की कमान में बदलाव से सियासी हलचल—बीजेपी के कई नेताओं को दोबारा जिम्मेदारी, कांग्रेस और विपक्षी दलों के कुछ चेहरों की भी वापसी; टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद की जगह काकोली घोष दस्तीदार को मिली नई जिम्मेदारी”
नई दिल्ली। संसद की स्थायी समितियां महज औपचारिक संस्थाएं नहीं हैं। संसद के भीतर मंत्रालयों और सरकारी नीतियों की गहराई से पड़ताल करने, योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल उठाने और सरकार के कामकाज की संसदीय निगरानी में इन समितियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में इन समितियों के अध्यक्षों में होने वाला फेरबदल अपने आप में अहम संसदीय घटनाक्रम माना जाता है।
इस साल विभाग-संबंधी संसदीय समितियों के अध्यक्षों में हुए बदलाव ने संसद के गलियारों में नई चर्चा को जन्म दिया है। रेलवे से लेकर रक्षा, वित्त, ग्रामीण विकास, विदेश मामले, गृह और संचार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों की संसदीय समितियों में अध्यक्षों के नाम बदले गए हैं या कई मौजूदा अध्यक्षों को फिर जिम्मेदारी सौंपी गई है।
सबसे प्रमुख बदलाव रेलवे संबंधी संसदीय समिति में हुआ है, जहां बीजेपी सांसद सुधीर गुप्ता को नया अध्यक्ष बनाया गया है। वह सी.एम. रमेश की जगह लेंगे। इसके साथ ही रक्षा संबंधी संसदीय समिति की जिम्मेदारी बीजेपी के वरिष्ठ नेता राधा मोहन सिंह को दी गई है।
दूसरी ओर, विपक्षी दलों के कुछ सांसदों को भी महत्वपूर्ण समितियों की कमान दोबारा मिली है। डीएमके सांसद कनिमोझी करुणानिधि को उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण संबंधी समिति की अध्यक्षता के लिए फिर नियुक्त किया गया है। कांग्रेस सांसद सप्तगिरी उलाका को ग्रामीण विकास और पंचायती राज समिति का अध्यक्ष पद दोबारा मिला है।
यानी तस्वीर केवल एकतरफा बदलाव की नहीं है। सत्ता पक्ष के कई सांसदों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिली हैं, तो विपक्षी दलों के कुछ सांसदों को भी संसदीय समितियों में नेतृत्व की भूमिका जारी रखने का अवसर मिला है।
रेलवे समिति में बदलाव ने खींचा सबसे ज्यादा ध्यान
रेलवे भारतीय अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन से सीधे जुड़ा क्षेत्र है। यात्री सुविधाओं से लेकर रेलवे सुरक्षा, आधारभूत ढांचे, नई परियोजनाओं, माल ढुलाई और बजटीय प्रावधानों तक, रेलवे से जुड़े मुद्दे लगातार संसद में चर्चा का विषय रहते हैं।
ऐसे में रेलवे संबंधी संसदीय समिति की अध्यक्षता महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस समिति की कमान अब बीजेपी के सुधीर गुप्ता को दी गई है। वह सी.एम. रमेश का स्थान लेंगे।
यह बदलाव इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि संसदीय समितियों की अध्यक्षता किसी सांसद को सिर्फ एक पद नहीं देती, बल्कि संबंधित मंत्रालय और विभाग के कामकाज की संसदीय समीक्षा की जिम्मेदारी भी देती है।
रक्षा संबंधी समिति में भी नेतृत्व परिवर्तन हुआ है। बीजेपी के राधा मोहन सिंह को इसकी कमान सौंपी गई है। रक्षा मंत्रालय से जुड़े मामलों में सैन्य आधुनिकीकरण, रक्षा उत्पादन, सीमा सुरक्षा से संबंधित नीतियां और बजटीय आवंटन जैसे विषय संसद की निगरानी के दायरे में आते हैं।
कनिमोझी, उलाका और रूडी पर फिर भरोसा
संसदीय समितियों के फेरबदल में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि कई मौजूदा अध्यक्षों को दोबारा जिम्मेदारी दी गई है।
डीएमके की कनिमोझी करुणानिधि को उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण संबंधी समिति का अध्यक्ष फिर नियुक्त किया गया है। यह मंत्रालय सीधे तौर पर राशन व्यवस्था, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और उपभोक्ता हितों जैसे व्यापक मुद्दों से जुड़ा है।
कांग्रेस के सप्तगिरी उलाका को ग्रामीण विकास और पंचायती राज संबंधी समिति का अध्यक्ष फिर बनाया गया है। ग्रामीण विकास योजनाओं की निगरानी और पंचायतों से जुड़े नीतिगत विषयों के कारण यह समिति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
बीजेपी के राजीव प्रताप रूडी को जल संसाधन संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष पद पर फिर नियुक्त किया गया है। जल संसाधन देश के सामने मौजूद दीर्घकालिक चुनौतियों में से एक है। ऐसे में इस समिति की भूमिका राज्यों के बीच जल विवादों, सिंचाई, जल संरक्षण और संबंधित केंद्रीय योजनाओं की समीक्षा के संदर्भ में अहम रहती है।
वहीं भर्तृहरि महताब को वित्त संबंधी संसदीय समिति का अध्यक्ष बनाया गया है। वित्त संबंधी समिति संसद की सबसे महत्वपूर्ण समितियों में गिनी जाती है, क्योंकि इसका काम देश की आर्थिक नीतियों और वित्तीय मामलों से जुड़े व्यापक मुद्दों की संसदीय समीक्षा से जुड़ा है।
कई पुराने चेहरों पर फिर जताया गया भरोसा
फेरबदल के बावजूद कई समितियों में नेतृत्व करने वाले चेहरों को बनाए रखा गया है।
शिवसेना के श्रीरंग बारणे को ऊर्जा संबंधी संसदीय समिति का अध्यक्ष फिर नियुक्त किया गया है। बीजेपी के राधा मोहन दास अग्रवाल को गृह मामलों संबंधी संसदीय समिति की जिम्मेदारी दोबारा मिली है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी समिति की अध्यक्षता मेधा विश्राम कुलकर्णी के पास बनी रहेगी। वहीं बीजेपी के निशिकांत दुबे को संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय समिति का अध्यक्ष फिर नियुक्त किया गया है।
इन नियुक्तियों से यह साफ होता है कि समिति अध्यक्षों के फेरबदल में पूरी तरह से नए चेहरों को आगे करने के बजाय अनुभव और निरंतरता को भी जगह दी गई है।
विदेश मामलों की समिति की कमान फिर शशि थरूर के हाथ
कांग्रेस सांसद शशि थरूर को विदेश मामलों की स्थायी समिति का अध्यक्ष फिर नियुक्त किया गया है।
विदेश मामलों की समिति की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय संबंधों, कूटनीतिक प्राथमिकताओं और विदेश मंत्रालय से संबंधित विभिन्न विषयों पर संसदीय दृष्टिकोण रखने का अवसर इस समिति को मिलता है।
शशि थरूर की दोबारा नियुक्ति के साथ इस समिति में नेतृत्व की निरंतरता बनी रहेगी।
इसी तरह पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस सांसद चरणजीत सिंह चन्नी कृषि समिति के अध्यक्ष पद पर बने रहेंगे। कृषि क्षेत्र किसानों की आय, फसल नीति, कृषि बाजार, न्यूनतम समर्थन मूल्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों से सीधे जुड़ा होने के कारण संसदीय निगरानी के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
जेडीयू के राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा को परिवहन संबंधी संसदीय समिति का अध्यक्ष फिर बनाया गया है।
वहीं बीजेपी के अनुराग ठाकुर कोयला, खदानें और इस्पात संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष पद पर बने रहेंगे।
कीर्ति आजाद की जगह काकोली घोष दस्तीदार—टीएमसी में बदलाव पर निगाहें
सबसे अधिक राजनीतिक चर्चा तृणमूल कांग्रेस से जुड़े बदलाव को लेकर है।
टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद को रसायन और उर्वरक संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष पद से हटाया गया है। उनकी जगह टीएमसी की सांसद काकोली घोष दस्तीदार को समिति का नया अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
यही वह बदलाव है जिसने संसदीय समितियों के फेरबदल को राजनीतिक चर्चा का बड़ा विषय बना दिया है।
हालांकि किसी सांसद को समिति अध्यक्ष पद से हटाए जाने के कारणों को लेकर अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं सामने आ सकती हैं, लेकिन नियुक्ति की प्रक्रिया और उसके औपचारिक कारणों को अलग-अलग रखना जरूरी है। किसी पद पर बदलाव अपने आप में किसी सांसद के खिलाफ कार्रवाई या किसी राजनीतिक विवाद की पुष्टि नहीं करता।
कीर्ति आजाद और काकोली घोष दस्तीदार दोनों टीएमसी से जुड़े सांसद हैं। ऐसे में इस बदलाव को सीधे तौर पर दल बदल या विपक्ष-सत्ता समीकरण के चश्मे से देखना तथ्यात्मक रूप से पर्याप्त नहीं होगा। असल सवाल यह है कि समिति के कामकाज और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्तर पर इस बदलाव का क्या प्रभाव पड़ता है।
संसदीय समितियां क्यों हैं इतनी महत्वपूर्ण?
संसद की बहस अक्सर सदन के भीतर दिखाई देती है, लेकिन कानूनों, नीतियों और सरकारी कामकाज की विस्तृत पड़ताल का बड़ा हिस्सा संसदीय समितियों के माध्यम से होता है।
विभाग-संबंधी स्थायी समितियां संबंधित मंत्रालयों की मांगों, नीतियों, योजनाओं और उनके क्रियान्वयन से जुड़े विषयों की जांच करती हैं। समितियां विशेषज्ञों और संबंधित पक्षों से जानकारी ले सकती हैं और अपने विचार तथा सिफारिशें रिपोर्ट के माध्यम से संसद के सामने रखती हैं।
इसलिए किसी समिति की अध्यक्षता केवल राजनीतिक पद नहीं है। यह संसदीय निगरानी की जिम्मेदारी भी है।
यही कारण है कि रेलवे, रक्षा, गृह, वित्त, विदेश मामले, ग्रामीण विकास, ऊर्जा, जल संसाधन और संचार जैसे क्षेत्रों की समितियों में अध्यक्षों का बदलाव व्यापक महत्व रखता है।
बदलाव के पीछे क्या संदेश?
इस फेरबदल से एक बात स्पष्ट है—संसदीय समितियों के नेतृत्व में सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के सांसदों को अलग-अलग स्तर पर जिम्मेदारियां मिली हैं।
बीजेपी के कई सांसदों को महत्वपूर्ण समितियों की कमान मिली या उनकी मौजूदा जिम्मेदारियां बरकरार रखी गईं। दूसरी ओर कांग्रेस, डीएमके, शिवसेना और जेडीयू के सांसद भी कई महत्वपूर्ण समितियों में अध्यक्ष पद पर बने हुए हैं।
इस लिहाज से इसे केवल सत्ता पक्ष बनाम विपक्ष के बदलाव के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता।
असल महत्व अब समिति अध्यक्षों के कामकाज में दिखाई देगा। महत्वपूर्ण मंत्रालयों की योजनाओं पर कितनी गंभीर समीक्षा होती है, समितियां किन मुद्दों को प्राथमिकता देती हैं, विशेषज्ञों और हितधारकों की राय कितनी व्यापकता से ली जाती है और उनकी सिफारिशों पर सरकार की प्रतिक्रिया क्या रहती है—यही वे बिंदु होंगे जिनसे इन नियुक्तियों का वास्तविक संसदीय प्रभाव समझा जा सकेगा।
संसद के भीतर बदली जिम्मेदारियां, अब नजर कामकाज पर
संसदीय समितियों के अध्यक्षों का यह फेरबदल ऐसे समय में हुआ है जब संसद के भीतर सरकार की नीतियों और विपक्ष के सवालों के बीच लगातार राजनीतिक बहस चलती रहती है।
रेलवे से लेकर रक्षा और वित्त तक, कई समितियों के अध्यक्ष बदले गए हैं। कुछ चेहरों को दोबारा जिम्मेदारी दी गई है, जबकि टीएमसी के मामले में कीर्ति आजाद की जगह काकोली घोष दस्तीदार को नई जिम्मेदारी मिली है।
अब इन नियुक्तियों की असली परीक्षा समिति कक्षों में होगी—रिपोर्टों में होगी, सवालों में होगी और उन सिफारिशों में होगी जो सरकार के सामने रखी जाएंगी।
संसद में कुर्सियां बदल गई हैं; अब निगाह इस बात पर होगी कि इन कुर्सियों से उठने वाले सवाल कितने प्रभावी होते हैं और सरकार उन सवालों का जवाब किस तरह देती है।
पर्दाफाश न्यूज़ की नजर अब सिर्फ नियुक्तियों पर नहीं, बल्कि इन समितियों के आगे के कामकाज और उनकी रिपोर्टों पर भी रहेगी।















