“TMC के नाम-सिंबल विवाद पर राहुल गांधी ने BJP और चुनाव आयोग पर लगाए गंभीर आरोप, बीजेपी ने कांग्रेस के इतिहास का हवाला देकर साधा निशाना”
नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश के बाद देश की सियासत में एक बार फिर आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चुनाव आयोग के फैसले को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि पहले ‘वोट चोरी’, फिर ‘सरकार चोरी’ और अब ‘पार्टी चोरी’ का दौर चल रहा है। राहुल गांधी ने दावा किया कि शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) और अब तृणमूल कांग्रेस के मामलों में उन्हें एक जैसा पैटर्न दिखाई देता है।
राहुल गांधी के इन आरोपों पर बीजेपी ने पलटवार किया है। बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस नेता के आरोपों को कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास से जोड़ते हुए कहा कि जिन दलों का उदाहरण देकर राहुल गांधी बीजेपी पर हमला कर रहे हैं, उनके इतिहास को कांग्रेस से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
त्रिवेदी ने कहा कि ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी, जबकि शरद पवार ने भी कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाई थी। बीजेपी नेता ने सवाल उठाया कि ऐसे में राहुल गांधी द्वारा ‘पार्टी चोरी’ का आरोप लगाने से पहले कांग्रेस के अपने इतिहास पर भी नजर डालनी चाहिए।
‘जिन पार्टियों का नाम लिया, वे कांग्रेस से ही अलग हुईं’
सुधांशु त्रिवेदी ने अपने बयान में कहा कि राहुल गांधी जिन राजनीतिक दलों का नाम लेकर बीजेपी पर निशाना साध रहे हैं, उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत कांग्रेस से अलगाव के बाद हुई थी।
उन्होंने शरद पवार का उदाहरण देते हुए कहा कि पवार कांग्रेस से अलग हुए और बाद में उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाई। इसी तरह ममता बनर्जी ने भी कांग्रेस छोड़कर पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई और तृणमूल कांग्रेस का गठन किया।
त्रिवेदी ने इसी आधार पर राहुल गांधी पर पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस नेता को पहले अपनी पार्टी का इतिहास देखना चाहिए। उनके मुताबिक, कांग्रेस से अलग होकर बने दलों को आज बीजेपी के खिलाफ उदाहरण के तौर पर पेश करना कांग्रेस के अपने राजनीतिक अतीत की ओर भी सवाल खड़े करता है।
हालांकि, यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि राहुल गांधी का मौजूदा आरोप चुनाव आयोग के उस अंतरिम आदेश को लेकर है, जिसके तहत पश्चिम बंगाल के आगामी उपचुनावों के लिए प्रतिद्वंद्वी TMC गुटों को फिलहाल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और उसके ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने से रोक दिया गया है। आयोग ने दोनों गुटों को नए नाम और चुनाव चिह्न सुझाने को कहा है और स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था मौजूदा उपचुनावों तक अंतरिम रूप से लागू है।
‘विदेशी मूल’ से लेकर राहुल गांधी तक—त्रिवेदी ने उठाया पुराना राजनीतिक मुद्दा
बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी ने अपने पलटवार को सिर्फ TMC तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने कांग्रेस के पुराने राजनीतिक घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए राहुल गांधी पर निशाना साधा।
त्रिवेदी के मुताबिक, शरद पवार ने 1990 के दशक में कांग्रेस से अलग होने के बाद अपनी अलग राजनीतिक राह बनाई थी। उन्होंने पवार के अलग होने के पीछे विदेशी मूल का मुद्दा उठाए जाने का भी जिक्र किया।
इसके बाद त्रिवेदी ने राहुल गांधी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जिस राजनीतिक परिवार और पार्टी के इतिहास से राहुल गांधी जुड़े हुए हैं, उन्हें अपने संगठन के अतीत और उसमें हुए विभाजनों की जानकारी होनी चाहिए।
बीजेपी नेता ने इसी संदर्भ में 1997 में ममता बनर्जी के कांग्रेस से अलग होने और बाद में तृणमूल कांग्रेस के गठन का उल्लेख किया। उनका कहना था कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन तैयार की और बाद में राज्य की राजनीति में कांग्रेस के सामने एक बड़ी ताकत के रूप में उभरीं।
1969 का कांग्रेस विभाजन भी चर्चा में
सुधांशु त्रिवेदी ने राहुल गांधी के परिवार और कांग्रेस के इतिहास का जिक्र करते हुए 1969 में कांग्रेस के विभाजन की घटना का भी हवाला दिया।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस के इतिहास में भी ऐसे कई अवसर रहे हैं, जब पार्टी के भीतर गंभीर मतभेद हुए और संगठनात्मक स्तर पर बड़े विभाजन सामने आए। त्रिवेदी ने 1969 की राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए इंदिरा गांधी की भूमिका को राहुल गांधी के सामने उदाहरण के तौर पर रखा।
बीजेपी नेता का तर्क था कि भारतीय राजनीति में दलों के भीतर मतभेद, विभाजन और नए राजनीतिक संगठनों का निर्माण कोई नई घटना नहीं है। ऐसे में किसी एक दल के मामले को पूरी राजनीतिक प्रक्रिया से अलग करके देखना उचित नहीं होगा।
उन्होंने राहुल गांधी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यदि उन्हें अपनी पार्टी का इतिहास याद नहीं है तो उन्हें अपने परिवार के राजनीतिक इतिहास को देख लेना चाहिए।
‘अपने लिखा हुआ पढ़ते नहीं हैं…’
बीजेपी नेता ने राहुल गांधी की राजनीतिक शैली पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कई नेता अपने लिखे हुए भाषण या बयान को पढ़ते नहीं हैं और उनके अनुसार राहुल गांधी इस मामले में ‘अग्रणी’ हैं।
त्रिवेदी ने कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और संगठन से जुड़े पुराने घटनाक्रमों का जिक्र करते हुए कहा कि पार्टी के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं, जिनसे पता चलता है कि कांग्रेस में भी नेतृत्व और संगठन को लेकर मतभेद रहे हैं।
उन्होंने हाल के कांग्रेस अध्यक्ष पद से जुड़े घटनाक्रम का भी उल्लेख किया और कहा कि कुछ समय पहले अशोक गहलोत के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की चर्चा थी, लेकिन अंततः ऐसा नहीं हुआ।
बीजेपी नेता ने इस उदाहरण के जरिए कांग्रेस की आंतरिक राजनीति पर सवाल उठाने की कोशिश की।
चौधरी चरण सिंह का भी किया जिक्र
सुधांशु त्रिवेदी ने अपने बयान में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से जुड़े राजनीतिक घटनाक्रम का भी उल्लेख किया।
उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने चौधरी चरण सिंह को समर्थन दिया और बाद में संसद सत्र शुरू होने से पहले समर्थन वापस ले लिया। त्रिवेदी ने इसे कांग्रेस की राजनीतिक कार्यशैली के उदाहरण के तौर पर पेश किया।
बीजेपी नेता का आरोप था कि कांग्रेस का इतिहास भी राजनीतिक सहयोग, समर्थन वापसी और सत्ता समीकरणों में बदलाव से भरा रहा है। इसलिए राहुल गांधी द्वारा बीजेपी पर राजनीतिक दलों को कमजोर करने के आरोप लगाने से पहले कांग्रेस के अतीत को भी देखना चाहिए।
इन आरोपों पर कांग्रेस की ओर से इस बयान के संदर्भ में कोई विस्तृत प्रतिवाद इस रिपोर्ट में शामिल नहीं है। इसलिए बीजेपी के इन दावों को उसी रूप में देखा जाना चाहिए—यानी बीजेपी नेता द्वारा कांग्रेस के खिलाफ लगाए गए राजनीतिक आरोप के तौर पर।
राजस्थान का जिक्र कर कांग्रेस पर हमला
सुधांशु त्रिवेदी ने राजस्थान की राजनीति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए 2009 और 2018 के राजस्थान के राजनीतिक घटनाक्रमों का जिक्र किया और कहा कि कांग्रेस ने राजनीतिक परिस्थितियों में अपने सहयोगियों के साथ ऐसा व्यवहार किया, जिस पर सवाल उठे।
उन्होंने अपने बयान में ‘आधा दर्जन हाथी निगलने’ जैसे राजनीतिक मुहावरे का इस्तेमाल करते हुए कांग्रेस पर तीखा हमला बोला।
त्रिवेदी का पूरा तर्क यही रहा कि आज बीजेपी पर राजनीतिक दलों को कमजोर करने का आरोप लगाने वाली कांग्रेस को अपने लंबे राजनीतिक इतिहास में हुए गठबंधन, टूट, समर्थन और पार्टी विभाजन की घटनाओं को भी सामने रखना चाहिए।
TMC विवाद से गरमाई राष्ट्रीय राजनीति
दरअसल, मौजूदा विवाद की शुरुआत तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश से हुई है। आयोग के मुताबिक, दो प्रतिद्वंद्वी गुट TMC का प्रतिनिधित्व करने का दावा कर रहे हैं। इसी विवाद के बीच आयोग ने मौजूदा पश्चिम बंगाल उपचुनावों के लिए दोनों गुटों को पार्टी के नाम और आरक्षित चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोकते हुए नए नाम और प्रतीक सुझाने को कहा है।
राहुल गांधी ने इस फैसले को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ते हुए बीजेपी और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि पहले शिवसेना, फिर NCP और अब TMC के मामलों में उन्हें एक जैसा पैटर्न नजर आता है। उनके मुताबिक, अगर किसी राजनीतिक पार्टी को ही ‘चुराया’ जा सकता है, तो करोड़ों लोगों के वोटों को लेकर सवाल उठना भी स्वाभाविक है।
आरोपों से आगे—अब इतिहास बनाम वर्तमान का सवाल
पूरे विवाद ने एक बार फिर भारतीय राजनीति में पार्टी विभाजन, चुनाव चिह्न और राजनीतिक विरासत को बहस के केंद्र में ला दिया है। एक तरफ राहुल गांधी मौजूदा चुनाव आयोग के फैसले को विपक्षी दलों के खिलाफ कार्रवाई के व्यापक पैटर्न से जोड़ रहे हैं। दूसरी तरफ बीजेपी इस आरोप का जवाब कांग्रेस के अपने इतिहास और उससे अलग होकर अस्तित्व में आए राजनीतिक दलों के उदाहरणों के जरिए दे रही है।
सुधांशु त्रिवेदी का पलटवार मूलतः इसी राजनीतिक इतिहास को सामने रखने की कोशिश है। उनका कहना है कि TMC और NCP जैसी पार्टियों की उत्पत्ति को कांग्रेस से उनके अलगाव के संदर्भ में देखा जाना चाहिए और कांग्रेस को बीजेपी पर आरोप लगाने से पहले अपने अतीत पर भी विचार करना चाहिए।
इस बीच, TMC के नाम और चुनाव चिह्न से जुड़ा चुनाव आयोग का अंतरिम फैसला विवाद के केंद्र में बना हुआ है। आगामी उपचुनावों के मद्देनजर दोनों गुटों को नए नाम और चुनाव चिह्न का विकल्प देना इस पूरे विवाद को और महत्वपूर्ण बनाता है।
यानी TMC के चुनाव चिह्न से शुरू हुई बहस अब केवल एक पार्टी के नाम और प्रतीक तक सीमित नहीं रह गई है। यह कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास, बीजेपी के आरोपों और राहुल गांधी के ‘पार्टी चोरी’ वाले बयान के बीच एक बड़े राजनीतिक टकराव में बदल गई है। आने वाले दिनों में इस विवाद में चुनाव आयोग के आगे के फैसले और संबंधित राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं अहम रहेंगी।















