“सड़क पर फंसी एंबुलेंस, थम गई नवजात की सांसें!”
आगरा: सरकारी कागजों में सड़कें बनती हैं, फाइलों में उनका रखरखाव होता है और भाषणों में विकास की रफ्तार दिखाई जाती है। लेकिन जब जिंदगी और मौत के बीच सिर्फ कुछ किलोमीटर का फासला हो, तब यही सड़कें अचानक अपनी असली तस्वीर दिखा देती हैं।
आगरा के बाह क्षेत्र के गढ़वार गांव से सामने आई घटना इसी तस्वीर का सबसे दर्दनाक चेहरा है। यहां एक गर्भवती महिला को अस्पताल ले जा रही सरकारी एंबुलेंस खराब सड़क पर करीब दो घंटे तक फंसी रही। एंबुलेंस को आगे बढ़ाने के लिए ग्रामीणों को ट्रैक्टर की मदद लेनी पड़ी। इस बीच प्रसव पीड़ा से जूझ रही महिला और उसका परिवार उस सड़क पर व्यवस्था की परीक्षा देते रहे।
लेकिन परीक्षा सिर्फ व्यवस्था की नहीं थी… एक अजन्मी जिंदगी भी उस रास्ते पर इंतजार कर रही थी।
जब एंबुलेंस अस्पताल पहुंची, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। नवजात बच्ची की मौत हो गई।
अब सवाल यह नहीं है कि सड़क खराब थी या नहीं। सवाल यह है कि अगर सड़क इतनी खराब थी कि एंबुलेंस दो घंटे तक निकल नहीं सकी, तो उसकी हालत सुधारने की जिम्मेदारी किसकी थी?
कागज पर सड़क, जमीन पर गड्ढे
घटना 2 सितंबर की बताई जा रही है। प्रदीप सिंह ने पत्नी को प्रसव पीड़ा शुरू होने पर सरकारी एंबुलेंस बुलाई। उम्मीद थी कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था कम से कम उस वक्त साथ देगी, जब घर में जिंदगी दस्तक देने वाली थी।
एंबुलेंस आई भी।
लेकिन अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता शायद व्यवस्था की प्राथमिकताओं से बाहर था।
खराब सड़क पर एंबुलेंस फंस गई। हालात ऐसे बने कि उसे निकालने के लिए ग्रामीणों को ट्रैक्टर से बांधना पड़ा। सोचिए, जिस वाहन को मरीज को जिंदगी तक पहुंचाने के लिए बनाया गया है, वही वाहन सड़क पर इस कदर बेबस हो जाए कि उसे ट्रैक्टर खींचकर बाहर निकाले।
यह सिर्फ सड़क की कहानी नहीं है। यह उस सिस्टम की कहानी है जहां सड़क बनने से ज्यादा जरूरी शायद सड़क बनने की घोषणा होती है।
क्योंकि अगर सड़क सचमुच सड़क होती, तो एंबुलेंस को ट्रैक्टर की जरूरत क्यों पड़ती?
दो घंटे… सिर्फ दो घंटे नहीं थे
प्रशासन के लिए यह घटना शायद एक शिकायत, एक जांच और एक रिपोर्ट का विषय हो सकती है।
लेकिन उस परिवार के लिए ये दो घंटे जिंदगी भर का जख्म बन गए।
एक पिता अपनी पत्नी को अस्पताल पहुंचाने की जद्दोजहद कर रहा था। परिवार को उम्मीद थी कि कुछ ही देर में घर में नवजात की किलकारी गूंजेगी। मगर रास्ते की बदहाली ने उस उम्मीद को मातम में बदल दिया।
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या किसी मरीज के लिए अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता भी उसकी किस्मत पर छोड़ दिया जाएगा?
अगर सड़क खराब थी तो उसकी मरम्मत कब होनी थी?
अगर सड़क पहले से खराब थी तो संबंधित विभाग को इसकी जानकारी थी या नहीं?
अगर जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
और अगर जानकारी नहीं थी तो निगरानी करने वाले अधिकारी क्या कर रहे थे?
शिकायत के बाद जागा सिस्टम
घटना के बाद पीड़ित पिता प्रदीप कुमार ने अधिकारियों को पत्र लिखकर सड़क के रखरखाव और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की।
बताया गया कि 5 सितंबर को तहसील दिवस में शिकायत पहुंची। SDM विनोद कुमार के अनुसार शिकायत को लोक निर्माण विभाग यानी PWD के पास भेजकर रिपोर्ट मांगी गई है।
यानी अब रिपोर्ट आएगी।
रिपोर्ट बताएगी कि सड़क क्यों खराब थी।
रिपोर्ट बताएगी कि जिम्मेदार कौन है।
रिपोर्ट बताएगी कि लापरवाही हुई या नहीं।
लेकिन एक सवाल रिपोर्ट से बड़ा है—
रिपोर्ट आने तक क्या किसी और एंबुलेंस को इसी सड़क पर नहीं जाना होगा?
क्या किसी और गर्भवती महिला को इसी रास्ते से अस्पताल नहीं पहुंचना होगा?
या फिर व्यवस्था का इंतजार भी उसी सड़क की तरह लंबा चलता रहेगा?
विकास के दावों के बीच सड़क का सच
सड़कें सिर्फ आने-जाने का रास्ता नहीं होतीं। गांव की सड़क अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता है, स्कूल तक पहुंचने का रास्ता है, रोजगार तक पहुंचने का रास्ता है और कई बार जिंदगी और मौत के बीच की आखिरी कड़ी भी।
जब वही कड़ी टूट जाए तो जिम्मेदारी सिर्फ मौसम, बारिश या मिट्टी पर डालकर मामला खत्म नहीं किया जा सकता।
आगरा की यह घटना इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इसमें सवाल सिर्फ एक सड़क का नहीं, सरकारी प्राथमिकताओं का है।
एक तरफ विकास की तस्वीरें चमकती हैं, दूसरी तरफ गांवों में एंबुलेंस गड्ढों में फंसती है।
एक तरफ योजनाओं के उद्घाटन होते हैं, दूसरी तरफ मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए ट्रैक्टर बुलाना पड़ता है।
तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है—
आखिर विकास सड़क पर है या सिर्फ कागज पर?
अखिलेश यादव का हमला और सियासी सवाल
घटना को लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने ‘एक्स’ पर न्यूज क्लिप साझा करते हुए कहा, “इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है-भाजपा के भ्रष्टाचार के कारण अब तो वे लोग भी मारे जा रहे हैं जिनका अभी जन्म भी नहीं हुआ था।”
जाहिर है, घटना ने राजनीतिक बहस को भी जन्म दे दिया है।
सवाल यह है कि क्या इस दर्दनाक घटना को सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित कर दिया जाएगा?
सत्ता पक्ष इसे जांच का विषय बताएगा, विपक्ष इसे भ्रष्टाचार और बदहाल व्यवस्था का उदाहरण बताएगा। लेकिन उस परिवार के लिए इन दोनों से ज्यादा जरूरी एक सीधा जवाब है—
जिस सड़क ने एंबुलेंस को रोका, उस सड़क की जिम्मेदारी किसकी थी?
पर्दे के पीछे की असली कहानी
पर्दे के सामने कहानी बहुत छोटी है—
सड़क खराब थी।
एंबुलेंस फंसी।
ट्रैक्टर से निकाली गई।
अस्पताल पहुंचने में देर हुई।
नवजात की मौत हो गई।
शिकायत हुई।
जांच शुरू हो गई।
लेकिन पर्दे के पीछे कहानी इससे कहीं बड़ी है।
वह कहानी पूछती है कि सड़क की हालत खराब होने का पता जिम्मेदार विभाग को कब चला?
अगर पहले से पता था, तो मरम्मत क्यों नहीं हुई?
अगर पता नहीं था, तो निरीक्षण व्यवस्था कहां थी?
अगर बजट था, तो सड़क की हालत ऐसी क्यों थी?
और अगर बजट नहीं था, तो ग्रामीणों को सालों से विकास के नाम पर आखिर क्या मिलता रहा?
इन सवालों के जवाब सिर्फ एक जांच रिपोर्ट में नहीं, बल्कि उस सड़क की हालत में दिखाई देने चाहिए।
क्योंकि एक मासूम की मौत के बाद सिर्फ यह कहना कि “जांच कराई जा रही है” काफी नहीं है।
जरूरत इस बात की है कि जांच यह भी बताए कि अगली एंबुलेंस उसी सड़क पर फंसने से पहले क्या बदलेगा।
वरना फाइल बंद हो जाएगी, रिपोर्ट रख दी जाएगी और सड़क शायद फिर उसी तरह पड़ी रहेगी।
और किसी अगली रात… किसी दूसरे घर में भी किलकारी का इंतजार होगा।
लेकिन इस बार सवाल सिर्फ इतना नहीं होगा कि बच्चा अस्पताल पहुंचा या नहीं। सवाल यह होगा कि उसे अस्पताल तक पहुंचाने वाली सड़क जिंदा थी या नहीं।














