Wednesday, September 2, 2026
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अखिलेश से दोस्ती पड़ गई भारी? राहुल गांधी की OBC पॉलिटिक्स पर लगा ब्रेक, अब दलित वोट बैंक पर कांग्रेस की नजर!

“सपा से गठबंधन की जमीन तैयार होते ही बदली कांग्रेस की रणनीति; अखिलेश के पिछड़ा वोट बैंक को छेड़ने के बजाय मायावती के दलित आधार में सेंध की कोशिश—2024 के लोकसभा फॉर्मूले को 2027 में दोहराने की तैयारी”

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक दलों ने अपने-अपने सामाजिक समीकरण साधने शुरू कर दिए हैं। सबसे दिलचस्प बदलाव कांग्रेस की रणनीति में दिखाई दे रहा है। कुछ समय पहले तक कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार जातीय जनगणना, सामाजिक न्याय और ओबीसी हिस्सेदारी को लेकर मुखर दिखाई दे रहे थे, लेकिन अब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की संभावनाएं मजबूत होते ही कांग्रेस का फोकस दलित राजनीति की ओर जाता नजर आ रहा है।

यही बदलाव अब सियासी गलियारों में एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है—क्या अखिलेश यादव से बढ़ती राजनीतिक दोस्ती ने राहुल गांधी की OBC पॉलिटिक्स पर फिलहाल ब्रेक लगा दिया है? और क्या कांग्रेस अब पिछड़े वर्ग की राजनीति को समाजवादी पार्टी के लिए छोड़कर मायावती के दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है?

दरअसल, कांग्रेस के सामने उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी चुनौती अपना खोया हुआ जनाधार वापस हासिल करने की है। पार्टी लंबे समय से प्रदेश में अपने पुराने सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में उसे यह भी समझना होगा कि समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करते समय उसके पारंपरिक वोट बैंक और सपा के मजबूत सामाजिक आधार के बीच टकराव न हो।

अखिलेश के OBC वोट बैंक को छेड़ने से बच रही कांग्रेस?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत आधार पिछड़ा वर्ग माना जाता है। खासतौर पर यादव और मुस्लिम मतदाताओं के बीच सपा की मजबूत पकड़ रही है। दूसरी ओर, कांग्रेस यदि उसी वोट बैंक को सीधे साधने की कोशिश करती है तो गठबंधन के भीतर ही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पैदा हो सकती है।

यही वजह है कि कांग्रेस की रणनीति अब अलग रास्ता अपनाती दिखाई दे रही है।

राहुल गांधी लगातार दलित अधिकार, संविधान, सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला रहे हैं। इसे केवल सामाजिक मुद्दों की राजनीति नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए नए सामाजिक आधार की तलाश के तौर पर भी देखा जा रहा है।

राजनीतिक समीकरण को अगर सरल भाषा में समझें तो अखिलेश यादव सपा के OBC आधार को मजबूत करें और कांग्रेस दलित तथा अन्य गैर-सपा सामाजिक समूहों में अपनी जमीन तैयार करे, तो गठबंधन के दोनों दलों के लिए यह रणनीति ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकती है।

यानी एक ही वोट बैंक पर दोनों दलों की नजर होने के बजाय अलग-अलग सामाजिक समूहों को साधने की कोशिश।

मायावती का कमजोर होता आधार कांग्रेस के लिए अवसर

कांग्रेस की नजर जिस सबसे बड़े राजनीतिक अवसर पर है, वह बहुजन समाज पार्टी का कमजोर होता चुनावी आधार है।

मायावती लंबे समय तक उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा रही हैं। खासतौर पर जाटव और अन्य अनुसूचित जाति मतदाताओं के बीच बसपा की मजबूत पकड़ रही है। लेकिन पिछले कुछ चुनावों में पार्टी के वोट प्रतिशत और सीटों में लगातार गिरावट देखने को मिली है।

2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा को करीब 22.23 प्रतिशत वोट मिले थे और पार्टी ने 19 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा का वोट प्रतिशत घटकर करीब 12.88 प्रतिशत रह गया और पार्टी केवल एक विधानसभा सीट जीत सकी।

यही गिरावट कांग्रेस के लिए बड़ा राजनीतिक अवसर बन सकती है।

कांग्रेस की रणनीति यह समझने की है कि अगर बसपा के कमजोर हो रहे आधार का एक हिस्सा उसके साथ जुड़ता है और समाजवादी पार्टी अपना परंपरागत OBC-मुस्लिम आधार बनाए रखती है, तो सपा-कांग्रेस गठबंधन 2027 में भाजपा के सामने अधिक मजबूत चुनौती पेश कर सकता है।

2024 का फॉर्मूला 2027 में दोहराने की कोशिश

2024 के लोकसभा चुनाव ने विपक्षी गठबंधन को उत्तर प्रदेश में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश दिया था। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर भाजपा को कड़ी चुनौती दी और विपक्षी गठबंधन के पक्ष में दलित मतदाताओं के एक हिस्से का समर्थन भी देखने को मिला।

संविधान और लोकतंत्र की सुरक्षा का मुद्दा विपक्षी प्रचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बना था। कांग्रेस अब इसी राजनीतिक माहौल को 2027 के विधानसभा चुनाव में दोहराने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।

राहुल गांधी की रणनीति में संविधान और सामाजिक न्याय का मुद्दा लगातार प्रमुख रहा है। दलित समाज के बीच इन्हीं मुद्दों के जरिए कांग्रेस यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि भाजपा के मुकाबले वह सामाजिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों की ज्यादा मजबूत आवाज बन सकती है।

लेकिन विधानसभा चुनाव का गणित लोकसभा से अलग होता है। इसलिए कांग्रेस के सामने चुनौती केवल वोट प्रतिशत बढ़ाने की नहीं, बल्कि उन वोटरों को स्थायी राजनीतिक समर्थन में बदलने की भी होगी।

राजेंद्र पाल गौतम को यूपी की जिम्मेदारी क्यों?

कांग्रेस ने दलित राजनीति को मजबूत करने की अपनी रणनीति में राजेंद्र पाल गौतम को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है। वह स्वयं दलित नेता हैं और दिल्ली की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं।

उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाना कांग्रेस की रणनीति का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।

कांग्रेस की कोशिश है कि दलित समाज के बीच पार्टी का संगठन मजबूत हो और केवल चुनावी समय में दिखाई देने के बजाय लगातार जमीनी स्तर पर काम किया जाए।

यही वजह है कि पार्टी दलित नेतृत्व को आगे बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक संवाद का दायरा भी बढ़ा रही है।

दलित-मुस्लिम समीकरण पर भी नजर

राहुल गांधी की पहल के बाद कांग्रेस के अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ और अल्पसंख्यक विभाग की ओर से दलित-मुस्लिम संवाद और सम्मेलनों की शुरुआत भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

राजेंद्र पाल गौतम और इमरान प्रतापगढ़ी जैसे नेताओं की सक्रियता को कांग्रेस के उस प्रयास से जोड़कर देखा जा रहा है जिसमें पार्टी दलित और मुस्लिम समुदायों के बीच राजनीतिक संवाद बढ़ाना चाहती है।

हालांकि यह रणनीति आसान नहीं होगी। उत्तर प्रदेश में दलित और मुस्लिम वोट बैंक को एक साथ साधने की कोशिश का अपना लंबा राजनीतिक इतिहास है। कांग्रेस को यह भी ध्यान रखना होगा कि केवल सम्मेलन और राजनीतिक बयानबाजी से सामाजिक गठजोड़ तैयार नहीं होता। इसके लिए बूथ स्तर तक संगठन, स्थानीय नेतृत्व और लगातार राजनीतिक मौजूदगी जरूरी होगी।

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती—दलित वोट वापस लाना

कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति कोई नई रणनीति नहीं है। पार्टी का एक समय राज्य के दलित और वंचित वर्गों के बीच मजबूत आधार था। लेकिन मंडल-कमंडल की राजनीति, क्षेत्रीय दलों के उभार और भाजपा के विस्तार के साथ कांग्रेस का यह आधार लगातार कमजोर होता गया।

बसपा के उभार ने दलित राजनीति का बड़ा हिस्सा कांग्रेस से दूर कर दिया। अब जब बसपा कमजोर दिखाई दे रही है, कांग्रेस को लगता है कि उसके लिए पुराने सामाजिक आधार को वापस हासिल करने का अवसर पैदा हुआ है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या बसपा का वोट सीधे कांग्रेस की ओर जाएगा?

यह मान लेना राजनीतिक रूप से जल्दबाजी होगी। मायावती का अपना कैडर और सामाजिक प्रभाव अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। दलित मतदाता भी एकरूप नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों और जातीय समूहों में उसके राजनीतिक झुकाव अलग हो सकते हैं।

इसलिए कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ मायावती के कमजोर होते वोट प्रतिशत का लाभ उठाना नहीं, बल्कि दलित मतदाताओं के बीच अपना भरोसा कायम करना है।

अखिलेश के साथ गठबंधन कांग्रेस की रणनीति को कितना बदल देगा?

सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन यदि 2027 के विधानसभा चुनाव तक कायम रहता है तो दोनों दलों को सीटों के बंटवारे से ज्यादा महत्वपूर्ण सामाजिक समीकरणों का तालमेल बैठाना होगा।

अखिलेश यादव जहां अपने मजबूत OBC आधार को और मजबूत करने की कोशिश करेंगे, वहीं कांग्रेस दलित, शहरी, सामान्य वर्ग के कुछ हिस्सों और अपने पुराने समर्थक समूहों में विस्तार की कोशिश कर सकती है।

यही कारण है कि राहुल गांधी के लिए इस समय अखिलेश यादव के वोट बैंक से सीधे मुकाबला करना राजनीतिक रूप से समझदारी भरा कदम नहीं होगा।

गठबंधन में दोनों दलों का एक-दूसरे के वोट बैंक को काटने के बजाय नए वोट जोड़ना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा।

यही कांग्रेस की वर्तमान रणनीति का मूल आधार दिखाई देता है।

क्या राहुल गांधी ने OBC पॉलिटिक्स छोड़ दी है?

फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी कि राहुल गांधी ने OBC राजनीति को पूरी तरह किनारे कर दिया है। जातीय जनगणना, आरक्षण और सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे कांग्रेस के राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बने हुए हैं।

लेकिन उत्तर प्रदेश की चुनावी रणनीति में फिलहाल प्राथमिकता जरूर बदली हुई दिखाई देती है।

जहां OBC राजनीति में कांग्रेस को समाजवादी पार्टी से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ सकती है, वहीं दलित राजनीति में उसे भाजपा और बसपा दोनों के बीच अपना स्थान तलाशना होगा।

इसलिए कांग्रेस शायद दो मोर्चों पर अलग-अलग रणनीति अपना रही है—राष्ट्रीय स्तर पर OBC और सामाजिक न्याय का मुद्दा जारी रखना और उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक को अपने पक्ष में मजबूत करने की कोशिश करना।

2027 में असली परीक्षा

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण बेहद जटिल हैं। किसी एक समुदाय को साध लेना चुनाव जीतने की गारंटी नहीं है। भाजपा का अपना मजबूत संगठन और सामाजिक गठजोड़ है। समाजवादी पार्टी के पास मजबूत क्षेत्रीय नेटवर्क और OBC-मुस्लिम आधार है। बसपा के पास अभी भी दलित राजनीति की ऐतिहासिक विरासत है।

ऐसे में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह 2024 की सफलता को 2027 के विधानसभा चुनाव में दोहरा पाएगी?

राहुल गांधी के सामने फिलहाल रणनीति साफ दिखाई देती है—अखिलेश यादव के मजबूत OBC आधार से टकराव से बचना, मायावती के कमजोर होते दलित वोट बैंक में जगह बनाना और संविधान-सामाजिक न्याय के मुद्दे के जरिए दलित-मुस्लिम समेत व्यापक सामाजिक गठजोड़ तैयार करना।

अगर कांग्रेस इसमें सफल होती है तो उत्तर प्रदेश में उसकी राजनीतिक हैसियत बदल सकती है। लेकिन अगर दलित वोट बैंक का बड़ा हिस्सा बसपा से पूरी तरह नहीं टूटता और कांग्रेस का संगठन जमीनी स्तर पर मजबूत नहीं हो पाया, तो यह रणनीति केवल राजनीतिक प्रयोग बनकर रह सकती है।

फिलहाल इतना जरूर है कि यूपी की सत्ता की लड़ाई में राहुल गांधी ने अपनी चाल बदल दी है। OBC की बड़ी राष्ट्रीय बहस के बीच उत्तर प्रदेश में उनकी नजर अब उस दलित वोट बैंक पर है, जिसके खिसकने ने मायावती को कमजोर किया और जिसके लौटने से कांग्रेस को नई राजनीतिक ताकत मिल सकती है।

2027 में फैसला सिर्फ वोट का नहीं होगा—यह तय करेगा कि राहुल गांधी की यह नई सामाजिक रणनीति कांग्रेस की वापसी का रास्ता बनती है या फिर यूपी की सियासत में एक और अधूरा प्रयोग साबित होती है।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
VIKAS TRIPATHI भारत देश की सभी छोटी और बड़ी खबरों को सामने दिखाने के लिए "पर्दाफास न्यूज" चैनल को लेके आए हैं। जिसके लोगो के बीच में करप्शन को कम कर सके। हम देश में समान व्यवहार के साथ काम करेंगे। देश की प्रगति को बढ़ाएंगे।
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