Tuesday, August 18, 2026
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जंतर-मंतर पर पुलिस कार्रवाई को लेकर घमासान: राहुल गांधी ने रिजिजू से पूछा—‘बच्चों पर हुई बर्बरता की भी तारीफ करें?’

“छात्र प्रदर्शनों को लेकर सरकार और कांग्रेस आमने-सामने, राहुल का आरोप—शांतिपूर्ण छात्रों पर पैलेट गन और कील लगी लाठियां चलीं; रिजिजू बोले—हजारों की भीड़ को बिना किसी मौत के संभालना दिल्ली पुलिस की बड़ी उपलब्धि”

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शनों को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच राजनीतिक टकराव तेज हो गया है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा दिल्ली पुलिस की कार्रवाई का बचाव किए जाने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मंगलवार को सरकार पर तीखा हमला बोला। राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि क्या उन छात्रों के साथ हुई कथित बर्बरता की भी तारीफ की जानी चाहिए, जिनके घायल होने का दावा किया जा रहा है।

दरअसल, छात्र प्रदर्शनों से निपटने के दिल्ली पुलिस के तरीके को लेकर पूछे गए सवाल पर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने पुलिस की कार्रवाई का बचाव किया। उन्होंने कहा कि हजारों लोगों की मौजूदगी वाले बड़े आंदोलन को बिना किसी मौत और गंभीर चोट के नियंत्रित किया गया। रिजिजू ने प्रदर्शन के दौरान पुलिस के संयम की तारीफ करते हुए कहा कि किसी की हड्डी नहीं टूटी और कोई प्रदर्शनकारी गंभीर चोट के कारण अस्पताल में भर्ती नहीं हुआ।

रिजिजू के इस बयान के बाद राहुल गांधी ने सोशल मीडिया के जरिए केंद्र सरकार पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर पैलेट गन और कील लगी लाठियों का इस्तेमाल हुआ तथा कई छात्र घायल हुए। राहुल ने कहा कि वह खुद घायल छात्रों से मिले हैं और देश ने प्रदर्शन से जुड़े हजारों वीडियो देखे हैं।

रिजिजू बोले—‘इतने बड़े आंदोलन को बिना मौत के संभाला’

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने एक इंटरव्यू में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि आंदोलन का पैमाना बड़ा था और इसमें हजारों लोग शामिल हुए थे। उनके मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान कई ऐसे लोग भी शामिल हो गए थे, जिन्हें उन्होंने अपराधी बताया।

रिजिजू ने यह भी आरोप लगाया कि प्रदर्शन में अलग-अलग राजनीतिक दलों और संगठनों से जुड़े लोग पहुंचे थे और उन्होंने कथित तौर पर दूसरों को हिंसा के लिए उकसाने का काम किया। इसके बावजूद, उनके मुताबिक, पुलिस ने स्थिति को नियंत्रण में रखा और किसी की जान नहीं गई।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि इतने बड़े प्रदर्शन के बावजूद किसी की मौत नहीं हुई और किसी प्रदर्शनकारी को गंभीर चोट नहीं लगी। उन्होंने इसे दिल्ली पुलिस की उपलब्धि बताते हुए कहा कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तब रोका, जब वे संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहे थे।

रिजिजू के बयान का एक बड़ा राजनीतिक हिस्सा कांग्रेस पर हमला था। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस के शासनकाल में भी कई बड़े आंदोलन हुए, जिनमें पुलिस कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई। उन्होंने कहा कि मौजूदा स्थिति की तुलना पुराने दौर से की जानी चाहिए और दिल्ली पुलिस की भूमिका की सराहना होनी चाहिए।

‘पुलिस की तारीफ करनी चाहिए?’—राहुल गांधी का पलटवार

किरण रिजिजू के बयान के बाद राहुल गांधी ने केंद्र सरकार को घेरते हुए पूछा कि यदि प्रदर्शन के दौरान छात्रों को चोट लगी है तो क्या ऐसी कार्रवाई को भी पुलिस की सफलता माना जाएगा।

राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि सरकार के मंत्री दिल्ली पुलिस की तारीफ करने की बात कर रहे हैं, जबकि उनके अनुसार संसद से कुछ दूरी पर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पैलेट गन और कील लगी लाठियों का इस्तेमाल किया गया।

राहुल ने दावा किया कि इस कार्रवाई में एक बच्चे की आंख चली गई और एक बच्ची का कान कट गया। उन्होंने कहा कि वह स्वयं उन घायल बच्चों से मिले हैं और प्रदर्शन से संबंधित बड़ी संख्या में वीडियो देश के सामने हैं।

कांग्रेस नेता ने सरकार पर निशाना साधते हुए सवाल किया कि यदि प्रदर्शन के दौरान बच्चों को चोटें आई हैं तो क्या ऐसी कार्रवाई की तारीफ की जानी चाहिए। राहुल गांधी ने इसे सरकार के कथित ‘असत्य और हिंसा’ वाले रवैये से जोड़ते हुए कहा कि पहले बच्चों पर कार्रवाई की जाती है और बाद में यह कहा जाता है कि कुछ हुआ ही नहीं।

सरकार बनाम विपक्ष: अब मुद्दा सिर्फ प्रदर्शन का नहीं

जंतर-मंतर की घटना को लेकर जारी राजनीतिक विवाद अब केवल दिल्ली पुलिस की कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ती राजनीतिक खींचतान का नया मुद्दा बन गया है।

एक तरफ सरकार का पक्ष है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है और बड़े पैमाने पर हुए प्रदर्शन को नियंत्रित करते समय पुलिस ने संयम बरता। दूसरी तरफ कांग्रेस का आरोप है कि शांतिपूर्ण छात्रों के खिलाफ जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल किया गया और घायल प्रदर्शनकारियों की पीड़ा को नजरअंदाज किया जा रहा है।

यही वजह है कि रिजिजू और राहुल गांधी के बयानों में दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आती हैं। रिजिजू जहां इस बात को प्रमुखता दे रहे हैं कि प्रदर्शन के दौरान कोई मौत नहीं हुई और पुलिस ने स्थिति को नियंत्रण से बाहर नहीं जाने दिया, वहीं राहुल गांधी का जोर कथित रूप से घायल हुए छात्रों पर है।

राजनीतिक बहस में दोनों पक्ष अपने-अपने दावों को सामने रख रहे हैं। सरकार पुलिस की कार्रवाई को कानून-व्यवस्था के नजरिए से देख रही है, जबकि विपक्ष इसे छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकार और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार से जोड़ रहा है।

‘छात्रों को अपराधी की नजर से क्यों देखा गया?’

कांग्रेस की ओर से यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि यदि प्रदर्शन में कुछ बाहरी तत्व या हिंसा फैलाने वाले लोग शामिल थे, तो क्या उसका खामियाजा सभी छात्रों को भुगतना चाहिए था?

राहुल गांधी के बयान का केंद्र यही सवाल है। उनका आरोप है कि सरकार को प्रदर्शनकारी छात्रों की बात सुननी चाहिए थी, न कि उनके खिलाफ बल प्रयोग का बचाव करना चाहिए था।

राहुल ने कहा कि वह खुद घायल छात्रों से मिले हैं। इस दावे के जरिए उन्होंने सरकार के उस बयान पर सवाल खड़ा किया जिसमें प्रदर्शन के दौरान किसी गंभीर चोट से इनकार किया गया है।

यही विरोधाभास इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू बन गया है। एक ओर केंद्रीय मंत्री का कहना है कि किसी प्रदर्शनकारी को गंभीर चोट नहीं लगी, जबकि राहुल गांधी गंभीर रूप से घायल छात्रों का हवाला दे रहे हैं। ऐसे में अब बहस इस बात पर केंद्रित हो गई है कि जंतर-मंतर पर वास्तव में क्या हुआ और पुलिस कार्रवाई की वास्तविक स्थिति क्या थी।

रिजिजू ने कांग्रेस के पुराने शासन को बनाया निशाना

किरण रिजिजू ने अपने बयान में केवल दिल्ली पुलिस का बचाव नहीं किया, बल्कि कांग्रेस के पिछले शासनकाल को भी कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के दौर में हुए कई आंदोलनों में पुलिस कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई।

रिजिजू का तर्क है कि वर्तमान प्रदर्शन के आकार को देखते हुए पुलिस की कार्रवाई को उस संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, हजारों लोगों की भीड़ के बावजूद स्थिति को नियंत्रण में रखा गया और किसी की जान नहीं गई।

उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर तब कार्रवाई की, जब वे कथित तौर पर संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहे थे। रिजिजू के मुताबिक, प्रशासन ने प्रदर्शन को रोकने के लिए संयम बरता और स्थिति को गंभीर रूप लेने से रोका।

सरकार के इस तर्क का उद्देश्य साफ तौर पर यह बताना है कि कानून-व्यवस्था के सामने चुनौती बड़ी थी, लेकिन पुलिस ने उसे नियंत्रित किया। हालांकि, विपक्ष सरकार के इस तर्क से सहमत नहीं है।

राहुल ने पीएम मोदी और अमित शाह को भी घेरा

राहुल गांधी ने अपने बयान में केवल किरेन रिजिजू को ही निशाने पर नहीं लिया, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की भूमिका पर भी सवाल उठाए।

उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार विरोध प्रदर्शनों को लेकर संवेदनशील रवैया नहीं अपना रही है। राहुल का कहना है कि छात्रों की शिकायतों और उनके प्रदर्शन को समझने के बजाय सरकार उन पर हुई कार्रवाई को सही ठहराने में लगी है।

कांग्रेस नेता ने सरकार पर यह आरोप भी लगाया कि पहले छात्रों पर बल प्रयोग किया गया और बाद में ऐसी किसी कार्रवाई से इनकार किया गया। उन्होंने इसे ‘असत्य और हिंसा’ की राजनीति से जोड़ते हुए केंद्र सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाया।

राहुल गांधी का यह हमला ऐसे समय में सामने आया है, जब छात्रों से जुड़े मुद्दे पहले से ही राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। ऐसे में जंतर-मंतर का प्रदर्शन और उस पर पुलिस की कार्रवाई विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का एक और मुद्दा बन गया है।

‘बर्बरता की तारीफ नहीं, जवाबदेही जरूरी’

राहुल गांधी के बयान का सबसे तीखा हिस्सा यही सवाल है कि यदि प्रदर्शन के दौरान छात्रों को चोट लगी है तो पुलिस की कार्रवाई की प्रशंसा क्यों की जाए।

उनका कहना है कि लोकतंत्र में छात्रों और युवाओं को अपनी आवाज उठाने का अधिकार है। यदि किसी प्रदर्शन में कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा होती है तो प्रशासन को स्थिति नियंत्रित करनी चाहिए, लेकिन कार्रवाई के दौरान चोटों और कथित अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों की भी जांच होनी चाहिए।

दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाने पड़ते हैं। खासकर तब, जब प्रदर्शनकारी किसी संवेदनशील क्षेत्र या संसद की ओर बढ़ने की कोशिश करें।

यही दो दृष्टिकोण अब इस विवाद को राजनीतिक रूप दे रहे हैं।

जंतर-मंतर से संसद तक पहुंची सियासी गर्मी

जंतर-मंतर पर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब संसद और देश की राजनीति में बहस का विषय बन चुका है। केंद्रीय मंत्री का पुलिस के पक्ष में बयान और राहुल गांधी का उसके जवाब में हमला बताता है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में और गरमा सकता है।

एक तरफ सरकार पुलिस की कार्रवाई को कानून-व्यवस्था के लिहाज से सही ठहरा रही है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस इसे छात्रों के खिलाफ कथित दमन के रूप में पेश कर रही है। राहुल गांधी ने घायल छात्रों का हवाला देकर सरकार से सवाल पूछा है कि क्या लोकतांत्रिक विरोध को नियंत्रित करने के नाम पर बल प्रयोग को सही ठहराया जा सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान वास्तव में कितनी ताकत का इस्तेमाल हुआ, कितने लोग घायल हुए और पुलिस की कार्रवाई किन परिस्थितियों में हुई। सरकार और विपक्ष के दावों के बीच इन सवालों के तथ्यात्मक जवाब ही इस विवाद की वास्तविक तस्वीर साफ कर सकते हैं।

फिलहाल, एक बात स्पष्ट है—छात्र प्रदर्शन को लेकर सरकार और विपक्ष आमने-सामने हैं और जंतर-मंतर की पुलिस कार्रवाई अब एक बड़े राजनीतिक विवाद में बदल चुकी है। राहुल गांधी इसे छात्रों के साथ कथित बर्बरता बता रहे हैं, जबकि किरेन रिजिजू इसे बड़े आंदोलन को बिना मौत के नियंत्रित करने वाली पुलिस की कार्रवाई के रूप में पेश कर रहे हैं।

आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है। लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष छात्रों की सुरक्षा, विरोध के लोकतांत्रिक अधिकार और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन का सवाल है—जिसका जवाब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि घटना की निष्पक्ष और तथ्यात्मक जांच से ही मिल सकता है।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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