“AK-47 से चार हवाई फायर, 9 MM पिस्टल से चली दो गोलियां; सरकार ने कहा—पुलिस ने अनुपातहीन बल का इस्तेमाल नहीं किया”
नई दिल्ली। बिहार में छात्र एवं युवा संगठनों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कथित बर्बरता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिकाओं पर राज्य सरकार ने अपना विस्तृत हलफनामा दाखिल किया है। सरकार ने पुलिस पर अनुपातहीन बल प्रयोग के आरोपों से साफ इनकार करते हुए कहा है कि प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बिगड़ने और भीड़ के हिंसक होने के बाद पुलिस ने स्थिति नियंत्रित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए।
हलफनामे में सीवान में पुलिसकर्मी द्वारा AK-47 से फायरिंग की घटना का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है। सरकार के मुताबिक, भीड़ में फंस जाने के बाद एक कांस्टेबल ने अपनी AK-47 से हवा में चार गोलियां चलाई थीं। सरकार का दावा है कि इन गोलियों से किसी प्रदर्शनकारी को चोट नहीं लगी। हालांकि, राज्य सरकार ने यह भी स्वीकार किया है कि कानून-व्यवस्था की सामान्य स्थिति में AK-47 जैसे हथियार का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि AK-47 प्लाटून स्तर का हथियार है और इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से विशेष अभियानों के लिए किया जाता है। घटना के बाद बिहार के डीजीपी ने AK-47 के इस्तेमाल को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए हैं। फायरिंग करने वाले कांस्टेबल को निलंबित कर दिया गया है और उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी शुरू कर दी गई है।
9 MM पिस्टल से दो राउंड फायर, तीन प्रदर्शनकारी घायल
हलफनामे में एक अन्य पुलिसकर्मी की फायरिंग का भी जिक्र है। सरकार के अनुसार, एक ASI ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए अपनी 9 MM पिस्टल से दो राउंड फायर किए। इस दौरान तीन प्रदर्शनकारियों को चोटें आईं।
सरकार का कहना है कि इन तीनों प्रदर्शनकारियों को AK-47 से चली गोली नहीं लगी थी। इतना ही नहीं, वे उस स्थान पर भी मौजूद नहीं थे जहां कांस्टेबल ने AK-47 से फायरिंग की थी। गोली लगने की परिस्थितियों और इस्तेमाल किए गए हथियार की वास्तविक भूमिका स्पष्ट करने के लिए मामले की बैलिस्टिक जांच जारी है।
जांच में गोली किस हथियार से चली, फायरिंग की दूरी कितनी थी और गोली किस कोण से चली, जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं का परीक्षण किया जा रहा है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि जांच पूरी होने के बाद फायरिंग से संबंधित परिस्थितियां और अधिक स्पष्ट हो सकेंगी।
पथराव के बाद बिगड़ी स्थिति, पुलिस ने वाटर कैनन और आंसू गैस का किया इस्तेमाल
राज्य सरकार ने अपने हलफनामे में सीवान की घटना का क्रम भी बताया है। सरकार के मुताबिक, छात्र और युवा संगठनों से जुड़े प्रदर्शनकारी सीवान के गांधी मैदान में एकत्र हुए थे। इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने JP चौक की ओर मार्च शुरू किया।
सरकार का दावा है कि दोपहर के समय प्रदर्शनकारियों की ओर से पुलिस बल पर पथराव शुरू कर दिया गया। इसके बाद मैरवा रोड और गोपालगंज रोड की ओर से आए कुछ उपद्रवी भी पथराव में शामिल हो गए। देखते ही देखते स्थिति हिंसक हो गई और पुलिस को भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त बल का इस्तेमाल करना पड़ा।
हलफनामे के मुताबिक, हिंसक भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने वाटर कैनन और आंसू गैस के गोले इस्तेमाल किए। अलग-अलग विभागों और पुलिस लाइनों में तैनात अधिकारियों तथा जवानों को भी मौके पर बुलाया गया, ताकि कानून-व्यवस्था को नियंत्रित किया जा सके।
पुलिस अधीक्षक समेत 20 पुलिसकर्मी घायल, पूरे प्रदर्शन में 157 पुलिसकर्मियों को चोट
पुलिस पर हुए पथराव में सीवान के पुलिस अधीक्षक समेत 20 पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात राज्य सरकार ने कही है। घायलों में दो SDPO, दो इंस्पेक्टर, दो सब-इंस्पेक्टर और 13 कांस्टेबल शामिल बताए गए हैं।
सरकार के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान पुलिस की दो गाड़ियों और बड़ी संख्या में ट्रैफिक ट्रॉलियों को भी नुकसान पहुंचा। पूरे राज्य में हुए प्रदर्शन से संबंधित घटनाओं को मिलाकर 157 पुलिसकर्मियों और सात सरकारी कर्मचारियों के घायल होने का दावा हलफनामे में किया गया है।
सरकार ने इन घटनाओं को कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बताते हुए कहा है कि पुलिस ने परिस्थितियों के अनुसार भीड़ को नियंत्रित करने के प्रयास किए।
82 लोगों के खिलाफ छह FIR, 17 गिरफ्तार
सीवान की हिंसा से जुड़े मामलों में पुलिस ने कुल 82 लोगों के खिलाफ छह FIR दर्ज की हैं। इनमें से 17 लोगों की गिरफ्तारी की जा चुकी है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इन मामलों की जांच अभी जारी है और जांच के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
राज्य सरकार ने अपने जवाब में यह भी स्पष्ट करने की कोशिश की है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई करते समय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन किया जा रहा है। सरकार के अनुसार, जिन प्रदर्शनकारियों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, उनके प्रति पुलिस ने कठोर रुख नहीं अपनाया है।
22 से 25 जुलाई के बीच 69 FIR, करीब 500 गिरफ्तार
हलफनामे में बिहार में 22 से 25 जुलाई 2026 के बीच हुई कार्रवाई का व्यापक आंकड़ा भी सामने रखा गया है। सरकार के मुताबिक, इस अवधि में प्रदर्शन से संबंधित घटनाओं को लेकर कुल 69 FIR दर्ज की गईं और करीब 500 लोगों को गिरफ्तार किया गया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद बिना आपराधिक इतिहास वाले 222 छात्र प्रदर्शनकारियों को जमानत पर रिहा किया गया। इसके अलावा 75 किशोरों को किशोर न्याय बोर्ड यानी JJB के माध्यम से छोड़ा गया।
सरकार ने कहा कि 18 वर्ष से कम उम्र के ऐसे सभी बच्चों को, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था, साधारण बॉन्ड पर रिहा कर दिया गया। पुलिस का कहना है कि बिना आपराधिक पृष्ठभूमि वाले छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ फिलहाल कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जा रही है।
वीडियो फुटेज और डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के निर्देश
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया है कि प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं से जुड़े वीडियो फुटेज और अन्य रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के निर्देश अतिरिक्त DGP को दिए गए हैं। इसका उद्देश्य भविष्य की जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान किसी भी महत्वपूर्ण साक्ष्य के नष्ट होने की संभावना को रोकना है।
सरकार ने यह भी कहा है कि प्रदर्शन के दौरान एकत्र की गई प्रदर्शनकारियों की निजी जानकारी और डिजिटल डेटा को फिलहाल सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। पुलिस एवं संबंधित अधिकारियों को इस डेटा को सोशल मीडिया या अन्य सार्वजनिक मंचों पर साझा नहीं करने का निर्देश दिया गया है।
यह कदम खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि प्रदर्शन से जुड़े मामलों में वीडियो फुटेज, मोबाइल रिकॉर्डिंग और डिजिटल सामग्री जांच का अहम हिस्सा बन सकती है।
सरकार का दावा—बल प्रयोग परिस्थितियों के अनुरूप, लेकिन AK-47 पर उठे सवाल
बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे के जरिए पुलिस पर लगे अनुपातहीन बल प्रयोग के आरोपों को खारिज किया है। सरकार का तर्क है कि जब भीड़ ने पथराव शुरू किया और कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी, तब पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए वाटर कैनन, आंसू गैस और अन्य वैधानिक उपायों का इस्तेमाल किया।
लेकिन सीवान में AK-47 से हुई फायरिंग का मामला इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू बन गया है। सरकार ने एक ओर जहां यह कहा है कि फायरिंग हवा में की गई और उससे किसी प्रदर्शनकारी को चोट नहीं लगी, वहीं दूसरी ओर उसने स्वयं माना है कि AK-47 कानून-व्यवस्था की सामान्य स्थिति में इस्तेमाल किया जाने वाला हथियार नहीं है।
कांस्टेबल का निलंबन, विभागीय कार्रवाई और डीजीपी के नए निर्देश यह संकेत देते हैं कि सरकार भी इस घटना को सामान्य पुलिस कार्रवाई के तौर पर नहीं देख रही है। अब बैलिस्टिक जांच और विभागीय कार्रवाई के निष्कर्ष यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि फायरिंग किन परिस्थितियों में हुई और उसमें नियमों का कितना पालन किया गया।
सुप्रीम कोर्ट में अब जांच और साक्ष्यों की रिपोर्ट पर नजर
बिहार सरकार के हलफनामे से साफ है कि राज्य पुलिस और प्रशासन पूरे मामले को कानून-व्यवस्था के दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर रहे हैं, जबकि जनहित याचिकाओं में पुलिस कार्रवाई और कथित बर्बरता पर सवाल उठाए गए हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार का जवाब, पुलिस की कार्रवाई के वीडियो रिकॉर्ड, बैलिस्टिक जांच और गिरफ्तारियों से जुड़े दस्तावेज महत्वपूर्ण साक्ष्य होंगे।
फिलहाल राज्य सरकार ने अदालत को भरोसा दिलाया है कि प्रदर्शन से जुड़े वीडियो और अन्य रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जा रहे हैं तथा प्रदर्शनकारियों का निजी एवं डिजिटल डेटा सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। सीवान की फायरिंग मामले में विभागीय कार्रवाई और बैलिस्टिक जांच जारी है।
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि जांच में AK-47 और 9 MM पिस्टल से हुई फायरिंग को लेकर क्या तथ्य सामने आते हैं और सुप्रीम कोर्ट पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारी तथा प्रदर्शनकारियों के अधिकारों से जुड़े सवालों पर आगे क्या रुख अपनाता है।














