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सत्ता की बेचैनी का नया अध्याय: रामलीला मैदान में विपक्ष ने फूंका बिगुल, अब लोकतंत्र के नाम पर भाजपा क्यों निकाल रही है पदयात्राएं?

दिल्ली की एक रैली ने सियासी गलियारों में ऐसा शोर पैदा किया कि सत्ता पक्ष को जवाब देने के लिए मुद्दों की तलाश करनी पड़ रही है। कभी व्यापार का हवाला, कभी 1984 के जख्म, तो कभी लोकतंत्र बचाने का अभियान। सवाल यह है कि देश की सबसे बड़ी सत्ताधारी पार्टी को आखिर विपक्ष की एक रैली से इतनी बेचैनी क्यों हो रही है?

नई दिल्ली। राजनीति में सबसे दिलचस्प क्षण वह नहीं होता, जब विपक्ष सरकार पर हमला करता है, बल्कि वह होता है जब सरकार विपक्ष के हमले से ज्यादा उसकी प्रतिक्रिया को लेकर परेशान दिखाई देने लगती है। दिल्ली के रामलीला मैदान में एक नवंबर को हुई विपक्षी एकजुटता की रैली के बाद देश की राजनीति में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। मंच पर विपक्षी नेताओं के भाषण खत्म हो गए, भीड़ अपने घर लौट गई, लेकिन उसके बाद सत्ता के गलियारों में जो राजनीतिक हलचल शुरू हुई, उसने इस आयोजन के असर को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

करीब 20 राजनीतिक दलों और लोकतंत्र समर्थक नागरिकों की भागीदारी वाली इस रैली का असली संदेश केवल सरकार विरोधी नारों तक सीमित नहीं था। इसके केंद्र में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने, चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता, लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और नागरिक अधिकारों को लेकर उठती चिंताएं थीं। विपक्ष ने इसे लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई का नाम दिया। लेकिन सत्ता पक्ष की ओर से जिस तरह लगातार राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं, उसने इस सवाल को और बड़ा कर दिया कि आखिर इस रैली ने किसकी राजनीतिक नींद उड़ा दी है?

रैली खत्म हुई, लेकिन सत्ता की बेचैनी खत्म नहीं हुई!

रामलीला मैदान में जुटी भीड़ को लेकर राजनीतिक बयानबाजी शुरू से ही दिलचस्प रही। आयोजन से पहले व्यापारियों के संभावित नुकसान का मुद्दा उछाला गया। त्योहारों के मौसम में बाजार प्रभावित होने और कारोबार को नुकसान पहुंचने की आशंकाएं जताई गईं। नुकसान के आंकड़ों को लेकर भी बड़े-बड़े दावे सामने आए।

लेकिन इस पूरे विवाद में एक बुनियादी सवाल कहीं पीछे छूट गया। क्या लोकतंत्र में राजनीतिक विरोध और जनसभाएं अब व्यापारिक गतिविधियों के लिए खतरा मानी जाने लगी हैं? अगर ऐसा है तो फिर जनता की आवाज सुनने के लिए सार्वजनिक स्थानों का इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा?

व्यापार महत्वपूर्ण है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन लोकतंत्र का कारोबार भी कोई छोटा कारोबार नहीं है। बाजार कुछ घंटे प्रभावित हो जाए तो उसकी भरपाई संभव है, मगर यदि नागरिकों के विरोध करने, सवाल पूछने और अपनी असहमति दर्ज कराने के अधिकार ही संकुचित होने लगें तो उसकी कीमत किसी एक दिन के व्यापारिक नुकसान से कहीं अधिक होती है।

विडंबना देखिए कि राजनीतिक विरोध के आयोजनों से व्यापार को होने वाले नुकसान की चिंता जताई जा रही थी, लेकिन उसी दिल्ली में पहले भी विरोध प्रदर्शनों के दौरान बाजारों और कारोबारी गतिविधियों पर प्रशासनिक प्रतिबंधों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में व्यापारियों की चिंता और राजनीतिक विरोध के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की जिम्मेदारी किसकी है, यह सवाल भी अपनी जगह कायम है।

13 करोड़ मतदाताओं का सवाल और चुनावी राजनीति का सबसे संवेदनशील मोर्चा

इस पूरे राजनीतिक विवाद की जड़ में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण और उससे जुड़े आरोप हैं। विपक्ष का दावा है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने की प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं। मूल आलेख में 13 करोड़ 37 लाख नाम हटाए जाने का दावा किया गया है। इस आंकड़े और उससे संबंधित आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि मतदाता सूची का मुद्दा अब सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया से निकलकर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का विषय बन चुका है।

आखिर चुनाव में जनता की सबसे बड़ी ताकत उसका वोट ही है। यदि किसी नागरिक को यह आशंका होने लगे कि उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित नहीं है, तो उसके लिए लोकतंत्र का सबसे बुनियादी अधिकार ही सवालों के घेरे में आ जाता है।

यहां सत्ता पक्ष के सामने भी एक सीधी चुनौती है। यदि चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष है तो आरोपों का जवाब आंकड़ों, दस्तावेजों और स्पष्ट प्रक्रियाओं से दिया जाना चाहिए। विपक्ष के सवालों को केवल राजनीतिक शोर बताकर खारिज कर देना पर्याप्त नहीं होगा।

लोकतंत्र में चुनाव जीतना सरकार बनाने का अधिकार देता है, लेकिन चुनावी प्रक्रिया पर उठने वाले हर सवाल से मुंह मोड़ने का अधिकार नहीं देता।

1984 के जख्मों को याद करने का समय अचानक क्यों आया?

रामलीला मैदान की रैली के बाद भाजपा की राजनीतिक प्रतिक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा 1984 के सिख विरोधी नरसंहार को लेकर सामने आया। यह भारतीय इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे याद करते समय किसी भी राजनीतिक दल को आत्ममंथन से बचने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

हजारों निर्दोष लोगों की हत्या, परिवारों का उजड़ना और न्याय के लिए दशकों तक संघर्ष करना देश के लोकतांत्रिक इतिहास पर गंभीर कलंक है। इस त्रासदी के दोषियों को सजा मिलनी चाहिए और पीड़ितों को न्याय मिलना चाहिए। इस मुद्दे पर किसी भी प्रकार की राजनीतिक सौदेबाजी स्वीकार नहीं की जा सकती।

लेकिन सवाल यह है कि 1984 की त्रासदी की याद राजनीतिक जरूरत के हिसाब से ही क्यों आती है?

जब विपक्षी एकजुटता की रैली के बाद अचानक इस मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाया जाता है, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या पीड़ितों के न्याय की चिंता वास्तव में प्राथमिकता है या फिर इसका इस्तेमाल मौजूदा राजनीतिक मुकाबले में किया जा रहा है?

इतिहास के पन्नों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कुछ नेताओं के विवादास्पद विचारों का उल्लेख भी मिलता है। ऐसे में भाजपा के लिए यह सवाल और कठिन हो जाता है कि वह 1984 की त्रासदी पर नैतिकता का पाठ पढ़ाते समय अपने वैचारिक अतीत से जुड़े सवालों का सामना करने को तैयार है या नहीं।

राजनीति का एक पुराना सिद्धांत है कि दूसरे के दामन पर दाग दिखाने से अपना दामन साफ नहीं हो जाता। 1984 के पीड़ितों के साथ न्याय किसी पार्टी की चुनावी रणनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि देश की सामूहिक नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

लोकतंत्र बचाने निकली सत्ताधारी पार्टी: राजनीति का नया प्रयोग या विपक्ष की चुनौती का जवाब?

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू भाजपा का लोकतंत्र बचाओ और अराजकता हटाओ अभियान है।

जिस पार्टी के पास केंद्र की सत्ता है, जो देश के सबसे बड़े राजनीतिक संगठन के रूप में सरकार चला रही है और जिसके पास प्रशासनिक तंत्र से लेकर राजनीतिक संसाधनों तक व्यापक ताकत है, वही पार्टी अब जनता के बीच जाकर लोकतंत्र पर खतरे और अराजकता के खिलाफ अभियान चलाने की बात कर रही है।

यह राजनीतिक विडंबना कम दिलचस्प नहीं है।

एक नवंबर को दिल्ली में पदयात्रा, फिर हैदराबाद में कार्यक्रम और उसके बाद चंडीगढ़ में सिख सम्मेलन। उत्तर प्रदेश में भी कई बड़े नेताओं के नेतृत्व में पदयात्राओं की रूपरेखा बनाई गई। दूसरे राज्यों में भी इस अभियान को विस्तार देने की तैयारी दिखाई दी।

इस राजनीतिक सक्रियता को केवल सामान्य संगठनात्मक कार्यक्रम मानकर छोड़ देना शायद घटनाक्रम की पूरी तस्वीर नहीं होगी।

आखिर विपक्ष की रैली के जवाब में सत्ता पक्ष को इतनी व्यापक राजनीतिक लामबंदी की जरूरत क्यों महसूस हुई?

क्या यह विपक्ष की एकजुटता को तोड़ने की रणनीति है? क्या भाजपा जनता के बीच विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे सवालों का अपना नैरेटिव स्थापित करना चाहती है? या फिर आने वाले राजनीतिक मुकाबलों से पहले लोकतंत्र और राष्ट्रवाद की बहस पर अपना नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश हो रही है?

राजनीति में कोई भी अभियान केवल उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके समय और परिस्थितियों से भी पहचाना जाता है।

पुलिस की वर्दी में असंतोष: जब व्यवस्था के पहरेदार ही सवाल उठाने लगें

इस राजनीतिक शोर के बीच दिल्ली पुलिस के भीतर सामने आया असंतोष भी कम गंभीर नहीं है।

एक एसीपी के नेतृत्व में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों के पुलिस कमिश्नर कार्यालय में प्रदर्शन करने की घटना ने प्रशासनिक व्यवस्था पर कई सवाल खड़े किए। यह घटना इसलिए असामान्य है क्योंकि पुलिस बल से अनुशासन और कानून के पालन की अपेक्षा की जाती है। जब उसी बल के कर्मचारी सार्वजनिक रूप से अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करने लगें तो उसके पीछे की परिस्थितियों की गंभीर जांच जरूरी हो जाती है।

लेकिन यहां एक और पहलू ध्यान देने योग्य है।

पुलिसकर्मियों का असंतोष किस बात को लेकर था? क्या यह सेवा शर्तों, वेतन या कार्यस्थल पर सुविधाओं का मामला था? या फिर किसी कार्रवाई के बाद जवाबदेही से बचने और प्रशासनिक हस्तक्षेप का विरोध करने की मांग उठ रही थी?

मूल आलेख में इस विवाद को एक तबादले और कथित रूप से वकीलों को धमकाने के लिए रिवॉल्वर लहराने की घटना से जोड़कर देखा गया है। इस संबंध में संबंधित पक्षों और आधिकारिक जांच का पक्ष सामने आना जरूरी है।

कानून के रखवालों के लिए कानून से ऊपर होने की कोई जगह नहीं हो सकती। पुलिस को काम करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसे जवाबदेही से मुक्त कर दिया जाए।

किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई गलत है तो उसके खिलाफ उचित मंच पर आवाज उठनी चाहिए। लेकिन यदि वर्दी को ही किसी भी कार्रवाई से बचने का कवच बना दिया जाए तो फिर आम नागरिक न्याय की उम्मीद किससे करेगा?

लोकतंत्र में पुलिस की ताकत उसकी वर्दी से नहीं, कानून के प्रति उसकी जवाबदेही से तय होती है।

जनता के अधिकार बनाम बाजार का मुनाफा: न्यायपालिका के सामने भी बड़ा सवाल

इस पूरे घटनाक्रम में एक और बहस ने ध्यान खींचा है। त्योहारों के दौरान हवाई किरायों में भारी बढ़ोतरी से जुड़े मामले में अदालत में हुई सुनवाई के दौरान कथित तौर पर यह टिप्पणी सामने आई कि यदि हवाई यात्रा महंगी लगती है तो यात्रा न करें।

इस टिप्पणी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

आज हवाई यात्रा केवल विलासिता का साधन नहीं रह गई है। नौकरी, कारोबार, शिक्षा, चिकित्सा और पारिवारिक जरूरतों के कारण बड़ी संख्या में लोग इसका इस्तेमाल करते हैं। त्योहारों के समय जब किराए कई गुना बढ़ने की शिकायतें सामने आती हैं, तब यह पूछना गलत नहीं कि आम नागरिकों के हितों की रक्षा कौन करेगा?

न्यायपालिका का सम्मान लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। लेकिन न्यायिक टिप्पणियों पर सार्वजनिक विमर्श भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी मामले में पहले चिंता जताना और बाद में उसी विषय पर अलग तरह की टिप्पणी करना जनता के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा कर सकता है।

यदि बाजार की ताकत के सामने आम नागरिक को केवल विकल्प छोड़ देने की सलाह मिलेगी, तो फिर उपभोक्ता अधिकारों और समानता के सिद्धांतों की व्यावहारिक उपयोगिता पर बहस होना लाजिमी है।

असली लड़ाई मंचों की नहीं, राजनीतिक नैरेटिव की है

रामलीला मैदान के घटनाक्रम को केवल एक रैली और उसके जवाब में हुई पदयात्राओं के रूप में देखना राजनीतिक तस्वीर को छोटा कर देना होगा।

यह दरअसल नैरेटिव की लड़ाई है।

विपक्ष जनता के बीच यह संदेश देना चाहता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों पर खतरे बढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ भाजपा यह स्थापित करने की कोशिश में है कि विपक्ष राजनीतिक अस्थिरता और अराजकता का माहौल बना रहा है।

दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक तर्क जनता के सामने रख रहे हैं। लेकिन इस मुकाबले में सबसे अहम भूमिका उस जनता की है, जिसे केवल नारों से नहीं, तथ्यों और जवाबदेही से मतलब होना चाहिए।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि विपक्षी एकजुटता की असली परीक्षा केवल एक मंच पर नेताओं के साथ खड़े होने से नहीं होगी। चुनावी राजनीति में सीटों का बंटवारा, नेतृत्व का सवाल, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं और आपसी अविश्वास जैसी चुनौतियां भी सामने आएंगी।

वहीं भाजपा के लिए भी यह आसान नहीं होगा कि वह हर आलोचना को अराजकता और हर असहमति को राजनीतिक साजिश बताकर जनता के सवालों से बच निकले।

क्योंकि लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी ताकत उसका बहुमत नहीं, बल्कि जनता का भरोसा होता है।

अब जनता पूछेगी हिसाब, केवल भाषणों से नहीं चलेगा काम

एक नवंबर की रैली ने विपक्ष को एक राजनीतिक मंच जरूर दिया, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि उसने कई ऐसे सवालों को फिर से सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है, जिन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

मतदाता सूची की पारदर्शिता, विरोध प्रदर्शन का अधिकार, पुलिस की जवाबदेही, न्यायपालिका की टिप्पणियां और राजनीतिक इतिहास का चयनात्मक इस्तेमाल—ये सभी मुद्दे एक-दूसरे से अलग दिखाई दे सकते हैं, लेकिन इनके केंद्र में एक ही सवाल है: क्या आम नागरिक की आवाज सत्ता और व्यवस्था तक उसी मजबूती से पहुंच रही है, जिस मजबूती से सत्ता की आवाज जनता तक पहुंचती है?

सत्ताधारी दल को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार चलाने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है सवालों को सुनना, असहमति को जगह देना और संस्थाओं को किसी भी राजनीतिक दल से ऊपर रखना।

विपक्ष को भी यह साबित करना होगा कि वह केवल सत्ता विरोधी नारों तक सीमित नहीं है, बल्कि जनता के सामने कोई विश्वसनीय राजनीतिक विकल्प रखने की क्षमता भी रखता है।

फिलहाल दिल्ली की राजनीति में एक दिलचस्प दृश्य है। विपक्ष अपनी रैली को जनसमर्थन का संकेत बता रहा है, तो भाजपा पदयात्राओं और अभियानों के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटी है।

लेकिन इस पूरी लड़ाई में एक तीसरा पक्ष भी है, जो किसी मंच पर दिखाई नहीं देता। वह है आम मतदाता।

वह मतदाता जो चुनाव के दिन अपनी उंगली पर स्याही लगवाता है, लेकिन चुनाव के बाद पांच साल तक महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और अपने अधिकारों का हिसाब मांगता है।

उसे इस बात से बहुत फर्क नहीं पड़ता कि किस पार्टी ने कितनी पदयात्राएं निकालीं और किसने कितने बड़े मंच से भाषण दिया। उसे फर्क पड़ता है कि उसके सवालों का जवाब मिला या नहीं।

क्योंकि राजनीति में शोर कितना भी बड़ा क्यों न हो, अंततः फैसला जनता की अदालत में ही होता है। और इस अदालत में न सत्ता का स्थायी कब्जा है, न विपक्ष की स्थायी दावेदारी। यहां हर पांच साल में हिसाब बदलता है, बशर्ते जनता का वोट और उसका अधिकार सुरक्षित रहे।

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