कोलकाता/दक्षिण 24 परगना: पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर हिंसा और टकराव के केंद्र में आ गई है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी पर दक्षिण 24 परगना जिले के सोनारपुर में हुए हमले ने राज्य की कानून-व्यवस्था, राजनीतिक सहिष्णुता और लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना के बाद पुलिस ने पांच लोगों को हिरासत में लिया है, जिनमें वे दो युवक भी शामिल हैं जो कथित तौर पर हमले के वीडियो में दिखाई दिए थे।
पीड़ित कार्यकर्ता से मिलने गए थे अभिषेक, रास्ते में हुआ हमला
शनिवार को अभिषेक बनर्जी चुनाव बाद हिंसा के पीड़ित टीएमसी कार्यकर्ता संजू कर्माकर के परिवार से मिलने सोनारपुर पहुंचे थे। इसी दौरान बड़ी संख्या में मौजूद लोगों ने उनके काफिले को घेर लिया।
प्रत्यक्षदर्शियों और वायरल वीडियो के अनुसार, भीड़ ने अभिषेक बनर्जी पर अंडे, पत्थर और अन्य वस्तुएं फेंकीं। प्रदर्शनकारियों ने “चोर-चोर” के नारे लगाए और कथित तौर पर उनके साथ धक्का-मुक्की भी की। हालात इतने बिगड़ गए कि सुरक्षा कर्मियों को तत्काल हस्तक्षेप कर उन्हें सुरक्षित बाहर निकालना पड़ा।
घटना के दौरान अभिषेक बनर्जी क्रिकेट हेलमेट पहने हुए दिखाई दिए, जिसने संभवतः उन्हें गंभीर चोट से बचा लिया। हालांकि उनके कपड़े फट गए और चश्मा भी टूट गया।
‘मुझे मारने की कोशिश की गई’ – अभिषेक बनर्जी
हमले के बाद अभिषेक बनर्जी ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि यह केवल विरोध प्रदर्शन नहीं बल्कि उनकी जान लेने की कोशिश थी।
उन्होंने कहा कि पूरी घटना कैमरे में रिकॉर्ड हुई है और इसकी जानकारी उच्च न्यायालय तथा राज्यपाल को दी जाएगी। अभिषेक ने आरोप लगाया कि हमले के पीछे भारतीय जनता पार्टी की भूमिका है और यह राजनीतिक रूप से प्रायोजित घटना है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि घटना के समय मौके पर पुलिस मौजूद नहीं थी, जो सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े प्रश्नचिह्न खड़े करता है।
सुरक्षा व्यवस्था पर ममता बनर्जी के सवाल
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख Mamata Banerjee ने भी घटना को गंभीर बताते हुए सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए।
ममता बनर्जी ने पूछा कि यदि अभिषेक की हालत गंभीर नहीं थी तो उन्हें अस्पताल में कई घंटे निगरानी में क्यों रखा गया और विभिन्न मेडिकल जांचों की सलाह क्यों दी गई।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक तत्व अस्पताल प्रशासन और चिकित्सकों पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि उपचार प्रक्रिया प्रभावित हो सके। उनके अनुसार अस्पताल के अधिकारियों को धमकी भरे फोन कॉल भी प्राप्त हुए।
राजनीतिक हिंसा या जनता का गुस्सा? विपक्ष का अलग नजरिया
घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्री दिलीप घोष ने हमले की निंदा तो की, लेकिन साथ ही इसे जनता में बढ़ते असंतोष का परिणाम भी बताया।
उन्होंने कहा कि किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है, लेकिन पिछले कई वर्षों से लोग विभिन्न प्रकार के उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं, जिसके कारण समाज में गुस्सा बढ़ा है।
घोष ने सवाल उठाया कि चुनावी माहौल में इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था और लंबे काफिले के साथ क्षेत्र में जाने का फैसला कितना उचित था। उनके अनुसार जनता लंबे समय से अवसर तलाश रही थी और यह घटना उसी नाराजगी की अभिव्यक्ति हो सकती है।
घटना से उठे पांच बड़े सवाल
1.मौके पर पुलिस क्यों नहीं थी?
यदि एक सांसद और राष्ट्रीय स्तर के नेता की सुरक्षा में चूक हुई है, तो यह प्रशासनिक विफलता का गंभीर मामला माना जा सकता है।
2.क्या पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा सामान्य होती जा रही है?
राज्य में चुनावों के बाद हिंसा की घटनाएं पहले भी सामने आती रही हैं। यह घटना उस बहस को फिर से तेज कर रही है।
3.क्या लोकतांत्रिक विरोध और हिंसक हमले के बीच की रेखा मिट रही है?
राजनीतिक असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन किसी जनप्रतिनिधि पर शारीरिक हमला लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ माना जाता है।
4.क्या राजनीतिक दल इस घटना का चुनावी और सियासी लाभ उठाएंगे?
टीएमसी और बीजेपी दोनों के आरोप-प्रत्यारोप से यह मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं बल्कि बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता दिख रहा है।
5.क्या जांच निष्पक्ष और पारदर्शी होगी?
पांच लोगों की हिरासत के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जांच केवल स्थानीय स्तर तक सीमित रहेगी या कथित राजनीतिक साजिश के आरोपों की भी पड़ताल होगी।
सोनारपुर में अभिषेक बनर्जी पर हुआ हमला केवल एक राजनीतिक नेता पर हमला नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों का आईना भी है। एक ओर टीएमसी इसे लोकतंत्र पर हमला और भाजपा प्रायोजित साजिश बता रही है, वहीं विपक्ष इसे जनता के आक्रोश का परिणाम बता रहा है। सच्चाई जो भी हो, इस घटना ने राज्य की कानून-व्यवस्था, राजनीतिक संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
अब सबकी नजर पुलिस जांच, प्रशासनिक कार्रवाई और आने वाले दिनों में इस मामले के राजनीतिक प्रभाव पर टिकी हुई है।














